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“भगवान भक्त की परीक्षा लेने के लिए उन्हें अपनी कसौटी में कसता है।:–भागवताचार्य कृष्णकांत शास्त्री जी”

दल्ली राजहरा

रविवार 21 दिसम्बर 2025

भोज राम साहू 9893765541

ग्राम कुसुमकसा में पूर्व जनपद सदस्य संजय बैस एवं समस्त बैस परिवार के द्वारा आयोजित श्रीमद भागवत ज्ञान यज्ञ का आयोजन अपने पूज्य पिता जी स्व. जयपाल बैस के प्रथम पुण्यतिथि में किया गया है । यह आयोजन 16 दिसम्बर से 24 दिसम्बर तक किया जाएगा। श्रीमद् भागवत ज्ञान यज्ञ सप्ताह के भागवताचार्य हैं पंडित कृष्णकांत शास्त्री ( कवर्धा वाले ) कथा के पांचवे दिन कथा में शास्त्री जी ने भगवान विष्णु के वामन अवतार की कथा बतलाया उन्हें बताया कि राक्षसों के राजा बलि एक शक्तिशाली और दानवीर राजा थे ।जिन्होंने अपने पराक्रम और बल से तीनों लोकों पर अपना राज्य बना लिया था । राजा बलि एक शक्तिशाली अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे । अश्वमेध यज्ञ के आयोजन से देवतागण डर गए उन्हें लगा कि अब राजा बलि इंद्रासन पर अपना कब्जा ना जमा ले।
इसलिए वे सभी डर कर भगवान विष्णु के पास गए और राजा बलि के यज्ञ को भंग करने का निवेदन करने लगे। राजा बलि को दानवीर कहा जाता है क्या वास्तव में दानवीर है यह जानने के लिए उन्होंने भगवान विष्णु को उनकी परीक्षा लेने के लिए भी उकसाया । भगवान विष्णु ने वमन देवता के रूप में राजा बलि की परीक्षा लेने और उनके यज्ञ भंग करने के लिए यज्ञ स्थल पर पहुंचे । बलि की यज्ञ स्थल पर गए ।
राजा बलि ने वामन देवता के आकर्षक रूप और तेज को देखकर मोहित हो गया उन्होंने कहा इस यज्ञ में सचमुच भगवान उपस्थित हो गए हैं उन्हें देखकर बहुत खुश हुए राजा बलि ने कहा भगवान आप मांगो क्या मांगते हो राक्षसों के गुरु शुक्राचार्य ने राजा बलि को सावधान करते हुए कहा राजन यह कोई साधारण भिक्षुक नहीं है यह साक्षात् नारायण है जो वामन देवता के रूप में आ खड़ा हुआ है ।
 शास्त्री जी ने कहा कि यदि आपका बेटा दानी हो और जग का पालनहार स्वयं याचक बनकर आए और आपके सामने झोली फैला कर दक्षिणा मांगे तो आप क्या करोगे इससे गहराई से समझना राजा बलि ने वामन देव को सर्वस्व दान कर कोई गलत नहीं किया ।

वामन देव ने कहा राजन मुझे कुछ नहीं चाहिए बस तीन पग जमीन मुझे दे दीजिए मैं इसी में संतुष्ट हो जाऊंगा । राजा बलि ने वामन देव के छोटा स्वरूप को देखकर कहा वामन देव आपको जितनी जगह चाहिए वहां का जमीन नाप लीजिए । यह सुनते ही वामन देव बने भगवान विष्णु ने अपना विशाल रूप बना लिया । उनके रूप को देखकर राजा बलि को अपनी गलती का एहसास हुआ लेकिन वचन में बंधे राजा बलि ने वामन देव के सामने चुप रहे वामन देव ने एक पैर जमीन पर तो दूसरे पैर आकाश में रख दिया । जैसे ही आकाश में वामन देव के पैर पड़े भगवान ब्रह्मा ने अपने गंगा से भगवान विष्णु के पैर धोए । वामन देव ने राजा बलि से कहा राजन अब तो जमीन से लेकर आकाश तक मैंने दो पग में नाप लिया अब तीसरा पग कहां रखूं । राजा बलि वचन में बंधे थे उन्होंने कहा वामन देव आप तीसरा पग मेरा सिर पर रख दीजिए । भगवान विष्णु ने जैसा ही तीसरा पग राजा बलि के सिर पर रखा तो तालियों के गड़गड़ाहट से स्वर्ग के साथ धरती भी गूंज उठा । 

आप कल्पना करिए यदि आप जब पुण्य का काम करते हैं तो आपके घरों के आसपास लोग खुशी से ताली बजाते हैं और जब राजा बलि ने पुण्य के काम किया तो आसमान से देवता गन भी ताली बजाने लगे । उनपर पुष्प की वर्षा होने लगी यह थी राजा बलि की प्रताप की कथा ।

 कथा यहीं पर समाप्त नहीं होती है राजा बलि की दानशीलता देखकर नारायण ने राजा बलि को भगवान विष्णु ने पाताल का राजा बना दिया और कहा मांगो तुम क्या मांगते हो राजा बलि ने कहा भगवान आपने मुझे राज पाठ तो दे दिया लेकिन मेरी इच्छा यही है कि आप मेरी द्वारपाल बने । वचन से बंधे भगवान विष्णु भी राजा बलि द्वारपाल बनना स्वीकार किया जब कई दिनों तक भगवान विष्णु को विष्णु लोक में नहीं देखा तब मां लक्ष्मी ने नारद से पूछा नारद नारायण कहां है । नारद ने बताया कि नारायण , राजा बलि के द्वारपाल बन पाताल में खड़े हैं । तब मां लक्ष्मी ने पाताल में भगवान विष्णु से मिलने गए और उनके सेवा में लग गए । कुछ दिनों रक्षाबंधन का त्योहार आया उस समय मां लक्ष्मी राजा बलि के पास जाकर रो रही थी उन्होंने रोने का कारण पूछा तब मां लक्ष्मी ने कहा राजन रक्षाबंधन के त्यौहार है मेरी कोई भाई नहीं है इसलिए मैं रो रही हूं ।

राजा बलि ने कहा इसमें रोने की क्या बात है मुझे ही अपना भाई बना लीजिए और मुझे राखी बांध दीजिए । मां लक्ष्मी ने अपने आंचल से कपड़ा फाड़ कर राजा बलि के हाथों में बांध दिया और उन्हें भाई बना लिया । राजा बलि ने बहन पाकर तो खुश हुआ लेकिन राखी के बदले में मां लक्ष्मी ने राजा बलि से द्वारपाल को मांग लिया । भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी ने सुख समृद्धि का आशीर्वाद देकर वापस विष्णु लोक लौटे ।

दूसरी कथा में उन्होंने राजा हरिश्चंद्र की दानवीरता और वचन में बंधे रहने की कथा बताई । उन्होंने कहा कि भगवान ,भक्त को अपनी कसौटी में कसता है वह देखता है की भक्त कितना खरा उतरता है । भक्त कितना दुःख सहकर भी मुझ पर से अपना आसक्त नहीं हटाता ।

तीसरी कथा में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम की तथा चौथी कथा में वासुदेव श्री कृष्ण की जन्म के संबंध में कथा बताया । शास्त्री जी ने बताया कि भगवान विष्णु के अवतार श्री राम और श्री कृष्णा के संबंध में बताया कि भगवान राम ने मर्यादा और पिता की वचन का पालन करने के लिए वनवास का पालन किया वह हमेशा मर्यादा में रहे इसलिए राम से मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम बने । कृष्णा ने मां के वात्सल्य गोपियों और ग्वाल बालों के साथ लीला मित्र सुदामा के साथ मित्र धर्म का पालन किया । भक्ति द्रोपती की पुकार पर उनकी रक्षा की उन्होंने महाभारत में यह बताया कि धर्म की रक्षा के लिए वचन और मर्यादा भी तोड़ा जा सकता है उन्होंने कर्म को प्रधानता दी । इसलिए भगवान श्री कृष्णा कर्मयोगी कहलाए ।विश्व प्रसिद्ध गीता ज्ञान दिया उन्होंने कहा कि कर्म से बड़ा कोई नहीं है आप कर्म करते जाइए फल की चिंता मत करिए लेकिन इतना ध्यान रखिए जैसा बोवोगे वैसा ही आपको फल मिलेगा । 

 कथा के बीच में उन्होंने मानव की सोच विचार के संबंध में एक व्याख्यान दिया एक मनुष्य जाकर मधुमक्खी से कहता है अरे मधुमक्खी यदि तुम में डंक नहीं होता तो तुम कितने अच्छे होते सागर से कहता है सागर यदि तुम्हारा पानी खारा नहीं रहता तो तुम कितने अच्छे रहते गुलाब से आकर कहता है गुलाब यदि तुम्हारे बीच काटा नहीं रहता तो तुम कितने अच्छे रहते । चंदन से आकर कहता है चंदन तुम्हारे खुशबू तो बहुत अच्छा है लेकिन यदि तुम्हारे बीच यदि सर्प नहीं रहते तो तुम कितने शीतल और अच्छे रहते । सभी ने मिलकर मनुष्य से कहा अरे मनुष्य यदि तुम में कमी निकालने की फितरत नहीं रहती तो तुम कितने सुंदर होते । इसलिए कहा गया है कभी किसी की कमी मत निकालिए लेकिन इंसान की फितरत है उनकी कमी निकालना । आप उनके गुण देखिए कमी नहीं भगवान हम सबको बनाया है आप उनसे अच्छा कर्म करिए सभी के गुण देखिए और  उनका सम्मान करिए ।

Bhojram Sahu

प्रधान संपादक "हमारा दल्ली राजहरा: एक निष्पक्ष समाचार चैनल"

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