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श्रीमद् भागवत ज्ञान यज्ञ सप्ताह की कथा सुदामा चरित्र में यजमान जीवन यादव ने किया बचपन के मित्रों का “साल और श्रीफल से सम्मान” ।

दल्ली राजहरा

बुधवार 11 फरवरी 2026

भोजराम साहू 9893 765541

 

दल्ली राजहरा में यादव परिवार के द्वारा, नौदिवसीय श्रीमद् भागवत ज्ञान यज्ञ सप्ताह का आयोजन वार्ड क्रमांक 24 चंदेनी भाटा में राधा कृष्ण मंदिर के पास किया जा रहा है। श्रीमद् भागवत ज्ञान यज्ञ सप्ताह के भागवताचार्य पंडित अखिलेश्वरानंद महाराज संतोषी नगर (लखोली ) राजनांदगांव।

यह आयोजन परिजन के स्मृति स्व. भवानी राम यादव (पिताजी) एवं स्व. नितेश यादव (छोटे भाई ) की पुण्य स्मृति में वार्षिक श्रद्धा मोक्ष के तहत 04 फरवरी 2026 से 13 फरवरी 2026 तक दोपहर 1:00 बजे से किया जा रहा है 

कथा में कल सुदामा चरित्र की कथा बताया जिसमें भागवताचार्य अखिलेश्वर आनंद महाराज ने बताया कि मनुष्यों के बीच रिश्ता दो तरह से बनता है एक जन्म देने वाली मां पिता से संबंधित खून का रिश्ता होता है और दूसरा जो होता है जो हम अपने विचारों के मिलने से बनाते हैं वह है मित्रता का रिश्ता । दोनों रिश्तो में मजबूती और प्रगाढ़ता तभी आती है जब आप त्याग और एक दूसरे के प्रति विश्वास बनाए रखें ।

थोड़ा सी भी आपके मन की लालच रिश्ते में दरार ला देती है रिश्ता विश्वास और बलिदान का प्रतीक है जब दोनों मित्र और परिवार के बीच आ जाए तो कभी कितना भी विपत्ति आ जाए आपकी रिश्ता नहीं टूटेगा।उन्होंने कथा में कर्मयोगी भगवान वासुदेव श्री कृष्णा और बचपन की सखा सुदामा की कथा बताया जिसमें उन्होंने बताया कि मित्र हो तो सुदामा और श्री कृष्ण की जैसी क्योंकि सुदामा ने अपने मित्र कृष्ण के लिए दरिद्रता सही । उन्हें मालूम था कि बूढी मां के चना खाने से उनका श्राप लगेगा और वह दरिद्र हो जाएंगे इसलिए उन्होंने कर्मयोगी श्री कृष्ण को बचाने के लिए श्रापित पूरे चना खा गया और दरिद्रता स्वीकार किया ।

श्रीमद् भागवत कथा में उन्होंने बताया कि । सुदामा गरीब क्यो बना क्या कारण है …? सुदामा बलराम और श्री कृष्ण महर्षि गुरु सांदीपनी के आश्रम रह कर शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। सुदामा और श्री कृष्ण परम मित्र थे। सुदामा अपने मित्र के हिस्से का आने वाली विपत्ति को स्वीकार कर अपने आप को गरीब बनाया। 

एक समय गुरुकुल के पास गांव में एक बुढ़िया माँ रहती थी । वह भिक्षा मांगकर अपने शालीग्राम का पूजा कर उसे भोग लगाती थी। एक बार उन्हें को भिक्षा नही मिला । बुढियां मां शालीग्राम से से बोली प्रभू कल भिक्षा माँगकर लाऊँगी और आपको भोग लगाऊँगी । दूसरे दिन बुढिया माँ भिक्षा माँगने गई भिक्षा मांगते शाम हो गई वह थकी हारी अपने कुटिया में आयी और शालीग्राम से कहा प्रभु आज एक थक गयी हूँ कल प्रातः भोग लगाऊँगी यह कहकर वह चने की पोटली को वहाँ खूंटी में टांग दी और सो गई। उसी रात दो चोर आये और उसी कुटीया में घुस गये और पोटली चोरी करके भाग गये ।

जिस गुरुकुल मे श्री कृष्ण और सुदामा शिक्षा ग्रहण कर रहे थे वहाँ भी वही चोर पहुँचा चोरी के नियत से । जिसे किसी ने देख लिया और चिल्लाया चोर चोर यह देखकर वह चोर भागने लगा उसी दौरान चने की पोटली वहाँ गिर गयी और वह पोटली गुरुकुल मे रख लिये । प्रात : दूसरे दिन कृष्ण सुदामा लकड़ी लाने के लिए जंगल गए तब गुरु माता ने श्री कृष्णा और सुदामा को वह चने की पोटली भूख लगने पर खाने के लिए दे दिए ।

 इधर वह बुढ़िया माँ जब सबेरे उठी और देखी मेरे चने की पोटली वहाँ पर नहीं है। वह दूखी मन से अपने आप बुदबुदाई कि जो मेरे गरीब का चना खायेगा वह दीन हीन गरीब हो जाएगा , यह मेरा श्राप है ..!

 सुदामा को यह सब ज्ञान हो गया था। वही चने की पोटली गुरुमाता श्री कृष्ण के हाथ में दिया था कि रास्ते मे खा लेना । तत्पश्चात् सुदामा ने वह चना अपने हाथ में ले लिया वह चना श्रापित था यह जानकर सुदामा ने यह सोचा कि मेरे मित्र कृष्ण इस चने को खाएंगे तो वह गरीब हो जायेंगे। यह चना मैं अकेले खाऊँगा और गरीब हो जाऊँगा और श्री कृष्ण जग के पालनहार है वह मुझे संभाल लेंगे । यह सोचकर वह पूरा चना खा लिया इस कारण सुदामा गरीब हुए।

 गुरुकुल से निकलने के बाद कृष्ण द्वारिका चले गये और सुदामा अपने नगर चले गए। कुछ समय बाद सुदामा का विवाह सुशीला नामक कन्या से हुआ। सुदामा का समय के अनुसार चार संतान उत्पन्न हुए। सुदामा हर समय हरिकिर्तन जप करता। श्रापित चने का असर दिखना शुरू किया और सुदामा गरीब होते चला गया । वह हर समय हरी का नाम जपा करता । सुदामा भीख न माँगकर गली में कृष्ण कृष्ण करके जपा करता और जो मिले उसे अपने घर लाकर सुखी से रहता था। कभी सुदामा भूखा रहता कभी खाना नसीब नहीं होता था। बच्चे भी भूखे रहते थे।

एक दिन सुशिला अपने पति से बोली के स्वामी आपका कन्हैय्या से बहुत अच्छी मित्रता है। जाओ वहाँ से मांगकर कुछ ले आओ जिससे हमारे परिवार का कुछ दिन गुजारा चले। सुदामा बोले में खाली हाथ कैसे जाऊ मेरे पास तो कुछ भी नहीं है। सुशीला बोली चिन्ता न करो स्वामी मैं पड़ोस से कुछ माँग कर ले आती हूँ। सुशीला पडोस में गयी और दो मुट्ठी चावल माँगकर लायी जिसे सुदामा अपनी फटी धोती में बाँधकर द्वारिका की ओर चले गये और रास्ते मे कृष्ण कृष्ण करते चले गये जब वह वहाँ पहुंचे तो लोग उन्हें देखकर मजाक उड़ाते ।

सुदामा उन्हें कहते श्री कृष्ण मेरे मित्र है। यह खबर जब कृष्ण को मिला तो वह नंगे पैर दौड़ते आये , सुदामा को सीने से लगा लिया और महल ले गये। भगवान अपने आंसुओं से सुदामा का पैर धोए। इधर भगवान श्री कृष्ण की आंखों में मित्र को देखकर आंसू था क्योंकि उन्होंने श्री कृष्ण के हिस्से का दुख स्वयं भोग लिया। तो उधर मित्र सुदामा की आंखों में बड़े दिनों बाद भगवान श्री कृष्ण को देखकर आंसू निकल रहे थे। भगवान और भक्त की यह अदभुत मिलन था । दोनों एक दूसरे को देखकर रो रहे थे दोनों के आंखों से अविरल आंसू की धारा बह रहे थे।

 

भगवान श्री कृष्णा अंतर्यामी थे उन्होंने सुदामा से कहा की भाभी ने जो मेरे लिए उपहार भिजवाई है वह कहां है मुझे दीजिए । सुदामा संकोच ग्रस्त हो गए इतने बड़े महाराज उसके लिए मैं क्या लाया हूं मुट्ठी भर चावल उन्हें दु तो दु कैसे । भगवान श्री कृष्ण ने अपने मित्र सुदामा से पोटली छीन लिए और उसमे से दो मुट्ठी चावल खा गये । जैसे ही तीसरी मुठी चावल हाथ मे लिये तो रुक्मिणी ने उनका हाथ पकड़ लिया और बोली के हमारे लिये भी कुछ छोड़ो । श्री कृष्ण दो मुट्ठी चावल में सुदामा का काया बदल दिये। 

सुदामा वहाँ से अपने नगर की ओर चले गये । सुदामा ने देखा उसकी झोपड़ी राजमहल में बदल गया था।वासुदेव श्री कृष्ण कभी किसी को नाराज नहीं करते। जो उन्हे सच्चे मन से पुकारता है वह दौड़ कर चले आते हैं।

 भक्ति ही सब कुछ है, भक्ति मे भागवत प्राप्ति है। हम भगवान के अंश है वह सदैव हमारे साथ रहते है। भक्ति करो जितना हो सके उतना भक्ति करो। भक्ति में ही शक्ति प्राप्ति होगी और वैकुण्ठ नहीं मोक्ष धाम मिलेगा जिससे दोबारा इस मृत्यु लोक में नहीं आना नहीं पड़ेगा ।

 भागवताचार्य ने बताया कि वर्तमान युग में मित्रता की मायने बदल गई है एक समय था जब लोगों के विचार मिलते थे और मित्र बनते थे मित्रता की बातें मरते दम तक निभाते थे जैसे स्थानीय छत्तीसगढ़ में लोग भोजली, जावरा ,महाप्रसाद जैसे नाम से मित्र बनाते थे। आज लोग मोबाइल के माध्यम से मित्र बना रहे हैं और ऐसे मित्र हैं जिनका जीवन में कभी देखे नहीं है । चाहे हमारे युवा वर्ग बेटे बिटिया हो या बड़े बुजुर्ग जिससे समाज और परिवार को बहुत नुकसान हो रहा है । लोग अपनी दिशा भटक रहे हैं और यहां तक की इन मित्रता के चक्कर में आत्महत्या तक कर रहे हैं ।

कई बेटियां इन मोबाइल के मित्रों के माध्यम से अपने आप को बर्बाद कर रही है तो युवा वर्ग और बेटे इन मित्रों के माध्यम से लाखों करोड़ों मेहनत की कमाई को भी नुकसान कर रहे हैं कई बार यह मोबाइल के मित्र भावनात्मक रूप से लोगों को लूटने में लगे हैं मित्रता के मायने बदल गए हैं गुड मॉर्निंग और गुड नाइट तक ही मित्रता सीमित हो चुकी है किसी मित्र के परिवार में विपत्ति आती है तो या खुशी का समय हो तो मोबाइल के माध्यम से संदेश भेज देते हैं । 

 

 मित्रता का सही मतलब वह है जब आप अपने मित्र के सुख और दुख में काम आओ मित्र की विपत्ति आ जाए तो उपस्थित होकर उनकी विपत्ति दूर करो । हमारे इतिहास और धर्म ग्रंथ ऐसे मित्रों मित्रों के कथा और कहानियों से भरे हैं उनसे प्रेरणा ले ।

उन्होंने आज कथा सुदामा और भगवान श्री कृष्ण की कथा में आज यजमान बने जीवन यादव ने अपने साथ बचपन में समय बिताए गए मित्र गणों को सादर इस भागवत कथा में आमंत्रित किया था और उन्हें साल और श्रीफल देकर सम्मानित किया ।

नगर पालिका अध्यक्ष तोरणलाल साहू  राघवेंद्र शर्मा  पवन गंगबेर सहित कई मित्रों को सम्मान किया ।

हमारा दल्ली राजहरा _ एक निष्पक्ष समाचार चैनल” को  श्रीमद् भागवतज्ञान यज्ञ सप्ताह का बेहतरीन कवरेज के लिए भगवताचार्य पंडित अखिलानंद मिश्रा ने साल एवं श्रीफल से सम्मानित किया ।

Bhojram Sahu

प्रधान संपादक "हमारा दल्ली राजहरा: एक निष्पक्ष समाचार चैनल"

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