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छत्तीसगढ़ का दीपावली कई परंपरा और संस्कृति को संजोकर मनाया जाने वाला है उत्सव ..!l

दल्ली राजहरा बुधवार 22 अक्टूबर 2025 भोजराम साहू 9893765541

छत्तीसगढ़ के गांव और शहरों के चौक चौराहा में गौरी गौरा विवाह उत्सव के रूप में मनाया जा रहा है । इस उत्सव में भगवान शिव और मां पार्वती का विवाह संपन्न होता है l गौरी गौरा विवाह उत्सव के परंपरा विशेष रूप से गोड़ जनजाति से जुड़ी हुई है ।

 

लेकिन अब सभी समाजों के लोग एक साथ मिलकर इसे मानते आ रहे हैं । एक किद्वंती के अनुसार कहा जाता है कि प्राचीन काल में एक गोड़ दंपति माता पार्वती की कठोर तपस्या की ।और उनसे मनोकामना पूर्ति का वरदान प्राप्त किया । जिसके बाद गोड़ समुदाय विशेष रूप से दीपावली के द्वादश से गौरी गौरा मनाते आ रहे है ।

छत्तीसगढ़ का 5 दिन के चलने वाली गौरी गौरा उत्सव महापर्व आज विसर्जन के साथ समाप्त हुआ l यह पर्व हमारे छत्तीसगढ़ की केवल एक धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ की संस्कृति समृद्धि लोक परंपरा सामाजिक समरसता और प्रकृति के प्रति श्रद्धा का जीवंत उदाहरण है । यह पर्व दर्शाता है कि किस प्रकार छत्तीसगढ़ समाज पौराणिक आख्यानों को अपनी स्थानीय परंपराओं और जीवन शैली में समाहित कर उसे सजीव बनाए रखे है l

 दीपावली के समय देवाधिदेव महादेव और मां पार्वती के विवाह का महोत्सव छत्तीसगढ़ की गौरव संस्कृति की पहचान है l जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पूरी निष्ठा और पवित्रता के साथ मनाया जा रहा है l

गौरी गौरव विवाह उत्सव की शुरुआत कार्तिक मास के द्वादश से की जाती है l दीपावली के पूर्व अपने घरों के साथ-साथ गौरा चौरा को साफ सफाई की जाती है lइस दिन छत्तीसगढ़ी परंपरा के अनुसार गौरा चावरा को भगवान शिव और मां पार्वती का प्रतीक मान कर महिलाओं के द्वारा गौरा गौरी के संबंध में गौरा जागने की गीत “गौरा जागे मोर गौरी जागे” गाकर उन्हें जगाया जाता है l चार से पांच दिन चलने वाला उत्सव पूरे गांव के साथ मोहल्ले के सभी जाति धर्म के लोग एकत्र होकर बड़े उत्सव के साथ मनाते हैं l महालक्ष्मी पूजा की रात्रि को कुंवारी मिट्टी से गौरी गौरा का निर्माण किया जाता है तथा उसी दिन रात्रि को गौरा चावरा के पास लाकर पूजा अर्चना का विवाह संपन्न होता है । कई घरों से भी लोगों के द्वारा मिट्टी का कलश लाया जाता है तथा कतार बद्ध होकर तालाबों एवं नदियों में विसर्जन की परंपरा है l 

इन्हीं परंपराओं के बीच सोटा अर्थात कोड़ा मारने की भी परंपरा है l सोटा कुस /घास का बना हुआ उंगली की मोटाई का एक रस्सी होता है जिसे देव चढ़ने या किसी भी व्यक्ति के द्वारा कलाइयों पर मरवाया जाता है । इसे भगवान का प्रसाद माना जाता है कहा जाता है कि इससे शारीरिक दुख दूर होता है तथा मनोकामना की पूर्ति होती है l

 कई बार किसी शारीरिक या मानसिक रूप से दुखी व्यक्ति के द्वारा या निसंतान महिलाओं के द्वारा गौरा गौरी विसर्जन के समय पड़ने  वाले  रास्ते पर लेटा जाता है l सभी के द्वारा उसे पार किया जाता है l पुराने मान्यता है कि इस तरह लेटने से मन्नतें पूरा होती है तथा महिलाएं की अगले साल होने गोद भर जाती है l छत्तीसगढ़ के यहां परंपरा है जो भगवान शिव और मां पार्वती की विवाह के साथ लोकजीवन शैली और परंपरा के साथ लोकगीत को पीढ़ी दर पीढ़ी संजोय रखे हैं l

गौरव विसर्जन के बाद शाम को गांव में गोवर्धन पूजा का कार्यक्रम संपन्न होता है । जहां पर सभी गांववासी एक जगह गौठान या सहाडा देवता कहा जाता है वहां पर एकत्रित होते हैं । जहां पर गोवर्धन पूजा संपन्न होता है और गोबर का तिलक लगाकर एक दूसरे को बधाई देते हैं । शाम को यादव समाज के द्वारा घरों घर जाकर गाय बछड़े एवं बैल को सोहाई बांधा जाता है । जो भी एक परंपरा का हिस्सा है जहां यादव समाज के द्वारा छत्तीसगढ़ का प्रसिद्ध राउत नाचा के साथ नित्य किया जाता है l 
गोवर्धन पूजा अगले दिन शाम को कई गांव में गोठान का पूजा अर्चना कर मातर का कार्यक्रम मनाया जाता है ।यह कार्यक्रम दीपावली उत्सव का अंतिम दिन होता है इसके बाद से ही गांव में मेला मंडई का कार्यक्रम प्रारंभ होता है l

Bhojram Sahu

प्रधान संपादक "हमारा दल्ली राजहरा: एक निष्पक्ष समाचार चैनल"

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