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“किसी भी व्यक्ति की परिस्थितियों को समझे जाने बिना उसका उपहास नहीं करना चाहिए ।” : वेद आचार्य गजानंद द्विवेदी

दल्ली राजहरा मंगलवार 4 नवंबर 2025 भोज राम साहू 98 9376 5541

दल्ली राजहरा में मानसी यादव के द्वारा स्वर्गीय श्रीमती सरोज यादव की स्मृति में 28 अक्टूबर से 5 नवंबर तक न्यू बस स्टेशन स्थित ब्राह्मण समाज में चल रहे श्रीमद् भागवत ज्ञान सप्ताह में वेदाचार्य गजानंद द्विवेदी बेरला (बेमेतरा ) ने कथा के सातवें दिन राजा परीक्षित मोक्ष की कथा बताया किसी भी व्यक्ति की परिस्थितियों को समझे जाने बिना उसके उपहास नहीं करनी चाहिए । उपहास करने के कारण कर्मयोगी भगवान श्री कृष्ण के प्रपौत्र महा प्रतापी राजा परीक्षित को मृत्यु का सामना करना पड़ा ।उन्होंने कथा में बताया कि सभी व्यक्ति की भावनाओं का सम्मान करें । आप किसी भी बड़े पद में हो तो इस बात का हमेशा ध्यान रखें कि आप अपनी पद और प्रतिष्ठा का घमंड ना करें ।क्योंकि यह सब चलाएमान है । आज आपके पास है तो वह कल किसी और के पास था और परसों किसी और के पास होगा । सबसे प्रेम व्यवहार बना कर रखें ।

वेदाचार्य ने आज श्रीमद् भागवत कथा के अंतिम कथा में राजा परीक्षित मोक्ष और देवताओं की देवलोक गमन की कथा बताया । उन्होंने कहा कि सुखदेव जी महाराज कहते हैं की राजा परीक्षित एक बार शिकार करने के लिए जंगल गए वे जंगल में भटक गए । उन्हें प्यास लगी पानी की तलाश में और इधर-उधर भटक रहे थे । अचानक देखा कि सामने एक कुटिया बनी हुई है जिसमें एक ऋषि ध्यान में बैठे थे । राजा परीक्षित ने ध्यान मग्न महर्षि शामिक से पीने के लिए पानी मांगा । लेकिन ध्यान मग्न महर्षि ने राजा की बातों पर ध्यान नहीं दिया । राजघमंड में चूर राजा परीक्षित को लगा कि ऋषि मुनि उनका अपमान कर रहे हैं । तब उन्होंने पास ही में मरा हुआ एक सर्प पड़ा था । उसको लेकर ऋषि के गले में डाल दिया । ऋषि सिंगी को जब राजा परीक्षित के द्वारा अपने पिताजी महर्षि शमिक के साथ किए गए अपमान का पता चला तो उन्हें बहुत क्रोध आया और उन्होंने श्राप दिया कि जिस तरह महाराज ने मेरे पिता का अपमान किया है उसी तरह सांपों के राजा तक्षक नाग उन्हें डसेगा और उसकी 7 दिन के अंदर मृत्यु हो जाएगी ।

जब राजा परीक्षित को ऋषि के द्वारा दिया गया श्राप का पता चला तो वे श्राप से मुक्त होने के लिए भगवान का स्मरण करने लगे । उन्हें पश्चात आप हुआ और राज पाठ अपने पुत्र जन्मजय को सौंप दिया मुक्ति के मार्ग के लिए राजा परीक्षित ने सुखदेव जी से कहा कि मुझे ऐसा कथा बताइए जिसमें मेरा अंत काल सुधर जाए तब सुखदेव जी महाराज ने श्रीमद् भाग भागवत कथा की कथा बताया।
राजा परीक्षित ने कथा समाप्ति के बाद जैसे ही फल को खाया सांपों के राजा तक्षक नाग जो फल के अंदर सूक्ष्म कीड़ा का रूप ले लिया था ।अपना विशाल रूप लेकर राजा परीक्षित को डस ले और उनकी आत्मा भगवान में लीन हो गई ।

यह तो हुई श्रीमद् भागवत कथा की बात । राजा परीक्षित को श्राप लगा कि उन्हें तक्षक नाग के डसने से मृत्यु होगी । लेकिन भगवान में लीन रहने और उन पर कथा को आत्मसात करने से उन्हें परमधाम को प्राप्त हुआ ।





