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” राम कथा हमारे जीवन में उतारने की कथा है ,यह हमारे जीवन के लिए दर्शन शास्त्र है ।” :—- पंडित सुरेंद्र प्रसाद शर्मा

दल्ली राजहरा

शुक्रवार 20 फरवरी 2026

भोजराम साहू 9893 765541

श्रीमद् भागवत महापुराण ज्ञान यज्ञ सप्ताह का आयोजन वार्ड क्रमांक 27 रेल्वे स्टेशन रोड शीतला माता मंदिर प्रांगण दल्ली राजहरा में 16 फरवरी 2026 से 26 फरवरी 2026 तक मां शीतला महिला समिति के द्वारा आयोजित किया जा रहा है l श्रीमद भागवत महापुराण कथा के पारायण कर्ता है पंडित सुरेश प्रसाद शर्मा महराज पांडे टोला ( छुरिया)  पंडित जी ने कथा के चौथे दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की कथा बताया ।

कथा के प्रारंभ महाराज जी ने रामचरितमानस  के संबंध बताया की महाराज दशरथ के घर जब श्री राम को जन्म हुआ तब वचन में बंधे महाराज दशरथ से राम को मांगने आया । महाराज दशरथ ने कहा जटायू हमारे रीत है की प्राण जाए पर वचन न जाए । पर मैं आज आज राम को देने में असमर्थ हूं मैं तुम्हारा यह वचन तोड़ता हूं । जटायु ने कहा महाराज भले आप राम को मुझे ना सौंपे क्योंकि मैं पक्षी हूं मैं इसका पालन पोषण नहीं कर सकता हूं । जब मेरी अंतिम समय आए तो मैं उनकी गोद में प्राण अंत हो और मेरा अंतिम संस्कार राम ही करें । बस यही वचन दीजिए ।

 समय ही ऐसा आया कि जब माता सीता को बचाते हुए जटायु घायल हो जाते हैं और वह भगवान राम को यह बताते हुए अपने प्राण त्यागता है की लंका के राजा रावण ने सीता को हर कर ले गया है और राम के गोद में ही जटायु प्राण त्याग देता है । भगवान राम उनका अंतिम संस्कार करता है । पक्षी होकर जटायु को सौभाग्य मिलता है जबकि महाराज दशरथ को भगवान राम का पिता बनने का ही सौभाग्य प्राप्त हुआ । लेकिन जब अंतिम समय आता है तो उनके चार बेटा रहने के बावजूद एक भी बेटा उनके पास नहीं रह पाता ।
  रामचरितमानस में इतने आदर्श हैं कि उनके एक चरित्र को हम हमारे जीवन में उतार ले तो हमारा जीवन महान हो जाएगा । राम कथा जीवन में उतारने की कथा है यह हमारे जीवन का दर्पण है दर्शन शास्त्र है । इसमें इतने ज्ञान भरा है कि सभी ग्रंथ का सार है । रामचरितमानस इसलिए आज के समय में अति आवश्यक है क्योंकि मर्यादा पुरुषोत्तम राम की कथा है मर्यादा रामचरितमानस हमें सिखाती है ।
रावण ने कहा राम मैं तुमसे हर चीज में बड़ा हूं ,बल में ,शरीर में, तुम पत्थर और ईट के बनाए घर में रहते हो और मैं सोने के घर में रहता हूं । मैं जब चलता हूं तो धरती कांपती है । काल को मैं अपने दरवाजे पर उल्टा लटका दिया हूं । मैं क्या नहीं कर सकता लेकिन लोग तुम्हारी पूजा करते हैं और मैं हर साल मारा जाता हूं । ऐसा क्या नहीं है मेरे पास जिसके कारण मेरी पूजा नहीं होती । राम ने सिर्फ एक शब्द कहा सिर्फ तुम्हारे में एक ही चीज की कमी है वह है चरित्र की और मैं मर्यादा पुरुषोत्तम हूं।

 कथा में शास्त्री जी ने भगवान विष्णु के वामन अवतार की कथा बतलाया उन्हें बताया कि राक्षसों के राजा बलि एक शक्तिशाली और दानवीर राजा थे । जिन्होंने अपने पराक्रम और बल से तीनों लोकों पर अपना राज्य बना लिया था । राजा बलि अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे । अश्वमेध यज्ञ के आयोजन से देवतागण डर गए उन्हें लगा कि अब राजा बलि इंद्रासन पर अपना कब्जा ना जमा ले। इसलिए वे सभी डर कर भगवान विष्णु के पास गए और राजा बलि के यज्ञ को भंग करने का निवेदन करने लगे। राजा बलि को दानवीर कहा जाता है क्या वास्तव में दानवीर है यह जानने के लिए उन्होंने भगवान विष्णु को दान लेने के लिए भी उकसाया ।

भगवान विष्णु ने राजा बलि की यज्ञ भंग करने वामन देवता का रूप धारण कर राजा बलि की यज्ञ स्थल पर गए ।राजा बलि ने वामन देवता के आकर्षक रूप और तेज को देखकर मोहित हो गया इधर गुरु शुक्राचार्य ने भगवान विष्णु के रूप को देखकर समझ गए जरूर कुछ ना कुछ गड़बड़ करने के लिए यह वामन रूप लेकर आए हुए हैं उन्होंने राजा बलि को समझाया की विष्णु से बच के रहना यह वामन वामन रूप लेकर आए हैं जब राजा बलि को मालूम हुआ तो उन्होंने कहा इस यज्ञ में सचमुच भगवान उपस्थित हो गए हैं उन्हें देखकर बहुत खुश हुए । यज्ञ पूर्ण हुआ और जब संकल्प लेने की बात आई तब कमंडल से जल लेकर वामन देव राजा बलि को संकल्प दिलवा रहे थे तो गुरु शुक्राचार्य का कमंडल के टोटी में मेंढक बनकर घुस गए वामन देव ने कुस को अंदर डालकर गुरु शुक्राचार्य के आंख फोड़ दी तब गुरु शुक्राचार्य ने अपने फटी हुई आंख को दिखाकर राजा बलि को संकल्प रोकने का आह्वान किया राजा बलि ने कहा भगवान आप मांगो क्या मांगते हो ।

अंतिम बार फिर गुरु शुक्राचार्य ने राजा बलि को सावधान करते हुए कहा राजन यह कोई साधारण भिक्षुक नहीं है यह साक्षात् नारायण है जो वामन देवता के रूप में आया हुआ है । 

राजा बलि ने कहा गुरुदेव आज आपके कारण मेरे सामने भगवान याचक बनकर खड़ा हुआ है यदि मैं अपने आप को भी दान कर दूं तो मुझे रत्ती भर भी रंज नहीं होगा तब जब दान की बारी आई वामन देव ने कहा राजन मुझे कुछ नहीं चाहिए बस तीन पग जमीन मुझे दे दीजिए मैं इसी में संतुष्ट हो जाऊंगा । राजा बलि ने वामन देव के छोटा स्वरूप को देखकर कहा वामन देव आपको जितनी जगह चाहिए वहां का जमीन नाप लीजिए । यह सुनते ही वामन देव बने भगवान विष्णु ने अपना विशाल रूप बना लिया । वचन में बंधे राजा बलि ने वामन देव के सामने चुप रहे वामन देव ने एक पैर जमीन पर तो दूसरे पैर आकाश में रख दिया । वामन देव ने राजा बलि से कहा राजन अब तो जमीन से लेकर आकाश तक मैंने दो पग में नाप लिया अब तीसरा पग कहां रखूं । राजा बलि वचन में बंधे थे उन्होंने कहा वामन देव आप तीसरा पग मेरा सिर पर रख दीजिए । भगवान विष्णु ने जैसा ही तीसरा पग राजा बलि के सिर पर रखा तो तालियों के गड़गड़ाहट से स्वर्ग के साथ धरती भी गूंज उठा । 

राजा बलि की दानशीलता देखकर नारायण ने राजा बलि से राजा बलि मांगो क्या मांगते हो राजा बलि ने कहा भगवान मुझे कुछ नहीं चाहिए बस आप मिल गए मेरे लिए यही सर्वस्व है तब भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल का राजा बना दिया साथ ही अजर अमर रहने का वरदान दिया और उन्हें कहा कि आप तक अपने 99 यज्ञ किए हैं तुम्हें 100 यज्ञ का फल मिलेगा और कुछ मांगो तुम क्या मांगते हो राजा बलि ने कहा भगवान आपने मुझे राज पाठ तो दे दिया लेकिन मेरी इच्छा यही है कि आप मेरी द्वारपाल बने । वचन से बंधे भगवान विष्णु भी राजा बलि द्वारपाल बनना स्वीकार किया जब कई दिनों तक भगवान विष्णु को विष्णु लोक में नहीं देखा तब मां लक्ष्मी ने नारद से पूछा नारद नारायण कहां है । नारद ने बताया कि नारायण , राजा बलि के द्वारपाल बन पाताल में खड़े हैं ।

तब मां लक्ष्मी ने पाताल में भगवान विष्णु से मिलने गए कुछ दिनों रक्षाबंधन का त्योहार आया उस समय मां लक्ष्मी ने राजा बलि से कहा राजन रक्षाबंधन के त्यौहार है मेरी कोई भाई नहीं है। राजा बलि ने कहा मुझे ही अपना भाई बना लीजिए और मुझे राखी बांध दीजिए । मां लक्ष्मी ने राजा बलि के हाथों में राखी बांध दिया और उन्हें भाई बना लिया । राजा बलि ने बहन पाकर तो खुश हुआ लेकिन राखी के बदले में मां लक्ष्मी ने राजा बलि से द्वारपाल को मांग लिया । भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी ने सुख समृद्धि का आशीर्वाद देकर वापस विष्णु लोक लौटे ।

तीसरी कथा में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम की तथा चौथी कथा में वासुदेव श्री कृष्ण की जन्म के संबंध में कथा बताया ।  भगवताचार्य पंडित शर्मा जी ने बताया कि भगवान विष्णु के अवतार श्री राम और  श्री कृष्णा के  जन्म संबंध में  भी कथा बताया । श्री कृष्ण का जन्म किन विषम परिस्थिति में हुआ । महाराज कंस  अपनी चचेरी बहन देवकी से अत्यंत प्रेम करते थे लेकिन जब उन्हें पता चला कि उनके गर्भ  के आठवें संतान ही उन्हें मृत्यु का कारक बनेगा तभी देवकी और  वासुदेव  को कारागार में डाल दिया । अंत में भगवान श्री कृष्ण ने  कंस  को मारकर वासुदेव और देवकी को मुक्त कराया ।

Bhojram Sahu

प्रधान संपादक "हमारा दल्ली राजहरा: एक निष्पक्ष समाचार चैनल"

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