
दल्ली राजहरा
सोमवार 02 मार्च 2026
भोजराम साहू 9893 765541
दल्ली राजहरा के बाजार में तरह-तरह के पिचकारी और कई रंगों के गुलाल कई जंगली जानवर कार्टून आदि के मुखौटा से बाजार सज गया है l रंग गुलाल और मुखौटा की खरीदारी तो हो रही है लेकिन अपेक्षाकृत कमी देखी जा रही है दोपहर लगभग दो-तीन बजे तक तो खरीदार की संख्या में कमी देखी गई जो शाम तक धीरे-धीरे बाजारों में खरीदार घूमते दिखे वही कल रविवार होने के कारण बाजारों में भीड़ नजर आ रही थी । आज होलिका दहन के बाद रंग उत्सव में एक दिन की गैप होने के कारण खरीदारों को समय भी मिल गया है ।

केंद्र सरकार और राज्य सरकार के स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों का इस समय परीक्षा होने के कारण बच्चे भी खुलकर इस त्यौहार का आनंद नहीं ले पा रहे हैं । एक समय था जब परीक्षा 1 अप्रैल से चालू होता था और अप्रैल के ही अंत तक समाप्त हो जाता था तब तक स्कूली छात्र छात्राएं होली का आनंद ले पाते थे।अब होली त्यौहार के समय ही परीक्षा चलते रहने के कारण बच्चे इस त्यौहार का भरपूर आनंद नहीं ले पा रहे हैं ।

दल्ली राजहरा में राजनांदगांव के पास से आए हुए नगाड़ा व्यापारी भी मायूस नजर आए l वह सह परिवार नगाड़ा बेचने के लिए दल्ली राजहरा पहुंचे हैं l उन्होंने बताया कि उनके पास 150 रुपया जोड़ी डमरू पिटवा ₹ 250 रुपए जोड़ी तथा ₹2500 से ₹3000 तक नगाड़ा की जोड़ी उपलब्ध है l पिछले वर्ष जो डमरू ₹150 में बिकता था और नगाड़े की कीमत लगभग ₹3000 की थी वह आज भी उसी कीमत पर डेढ़ सौ से ₹3000 तक कीमत में बिक रहा है l लेकिन पिछले दो-तीन वर्षों से कीमत में बढ़ोतरी हुई है l नगाड़ा के महंगाई पर उन्होंने बताया कि नगाड़ा में उपयोग होने वाले मिट्टी के बर्तन की कीमत कुम्हारो के द्वारा बढ़ा दी गई है तथा पशुओं की खाल की कीमत भी पिछले वर्ष के मुकाबले में इस वर्ष बढ़ा है l इसलिए नगाड़ा की कीमत में वृद्धि की गई है l
नगाड़ा विक्रेता ने बताया की स्थिति अभी खराब है नगाड़ा खरीदने वाले लोग अभी नहीं आ रहे हैं शाम को आने की संभावना है l कल ग्रहण के कारण रंग उत्सव का त्यौहार 4 मार्च को होगा जिसके कारण खरीदारों की संख्या भी बाजारों में काम नजर आ रही है । बाजार में पारंपरिक नगाड़े के साथ साथ प्लास्टिक के पन्नी वाले बाजे आने से बिक्री में कमी आई है l

ऐसा लग रहा है कि आधुनिकता के दौड़ में अब पारंपरिक त्योहार समाप्ति की ओर है । एक समय था जब होली के 15 दिन पहले से ही शाम होते ही चारों तरफ नगाड़ा की आवाज से गूंज उठता था l बड़े बुजुर्ग के साथ बच्चे भी नगाड़ा के पास बैठकर फाग गीत गाया करते थे l बड़े बुजुर्ग बच्चों को डंडा नाच सिखाया करते थे तथा रंग त्यौहार के दिन गांव के सभी महिला पुरुष बच्चे एक जगह एकत्र होते और चारों तरफ पुरुष वर्ग नगाड़े के थाप पर गोलाकार घूम घूम कर डंडा नाच का प्रदर्शन करते थे । उस समय त्यौहार का आनंद ही कुछ और होता था ।
गांव से शहर आकर फाग गाने वालों की टोली और नगाड़े की धूम पर नाचने वाले लोग इस साल नजर नहीं आए l होली की पौराणिक त्यौहार में बदलाव आ गया है l लोग नगाड़ा के बजाय डीजे की के धुन पर नाच कर त्योहार मनाना पसंद कर रहे हैं l






