दल्ली राजहरा
रविवार 10 मई 2026
भोजराम साहू 9893 765541
हमारा दल्ली राजहरा एक निष्पक्ष समाचार चैनल का संडे मेगा स्टोरी मदर्स डे स्पेशल “नाम नहीं, काम” – 100 साल से भारत माता की सेवा में निस्वार्थ खड़े वो सपूत, जिन्हें RSS कहते हैं ।

 आज मदर्स डे है। हर बेटा अपनी मां के चरणों में सिर झुकाता है, हर बेटी मां के आंचल में सुकून ढूंढती है। लेकिन कुछ बेटे ऐसे भी हैं जिन्होंने “भारत माता” को ही मां मान लिया है। ना नाम चाहिए, ना वेतन, ना प्रसिद्धि। बस एक ही उद्देश्य है – भारत माता की सेवा।

जब देश में बाढ़ आती है, जंगल में आग लगती है, कोरोना जैसी महामारी दस्तक देती है, या सीमा पर युद्ध के बादल मंडराते हैं, तब सबसे पहले वही खड़े होते हैं। भगवा गमछा कंधे पर, हाथ में राहत सामग्री, चेहरे पर मुस्कान। आज “हमारा दल्ली राजहरा” निष्पक्ष समाचार चैनल ऐसे ही अनाम सपूतों की कहानी लाया है। 100 साल पुरानी तपस्या की कहानी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों की कहानी।

संघ की हर शाखा की शुरुआत और समापन एक ही प्रार्थना से होता है। शांत स्वर में, भगवा ध्वज के सामने, एक स्वर में गाई जाती है –
नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे,
त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोऽहम्।
महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे,
पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते।”
इसका अर्थ है – हे वात्सल्यमयी मातृभूमि! मैं तुझे सदा नमन करता हूं। हे हिन्दूभूमि! तूने मुझे सुख से बढ़ाया है। हे महामंगलमयी, पुण्यभूमि! मैं तेरे लिए अपना यह शरीर समर्पित करता हूं। तुझे बार-बार नमन। 

यह प्रार्थना 1940 में द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर “गुरुजी” ने रची थी। 19 फरवरी 1906 को नागपुर के रामटेक में जन्मे गुरुजी ने नागपुर से बी.एससी और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से एम.एससी जूलॉजी की थी। कुछ समय तक वे मद्रास में लेक्चर भी रहे, लेकिन 1931 में डॉ. हेडगेवार से मिलकर संघ के प्रचारक बन गए। 21 जून 1940 को डॉ. हेडगेवार के निधन के बाद गुरुजी ने 33 साल तक 1940 से 1973 तक संघ का नेतृत्व किया।

गुरुजी सादा जीवन, कठोर अनुशासन और मौन व्रत के लिए जाने जाते थे। उन्होंने 12 साल तक मौन रखा था। उनके नेतृत्व में संघ सीमित दायरे से निकलकर देशभर में फैल गया। गुरुजी कहते थे कि संघ बड़ा होने के लिए नहीं बना, भारत बड़ा हो इसलिए बना है। 5 जून 1973 को नागपुर में उनका निधन हुआ, लेकिन उनके संस्कार आज भी लाखों स्वयंसेवकों का मार्गदर्शन करते हैं।

 

इस बीज को बोया था डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने। 1 अप्रैल 1889 को नागपुर के एक मध्यवर्गीय पुरोहित परिवार में जन्मे हेडगेवार बचपन से ही स्वतंत्रता की आग में तपे थे। तीसरी कक्षा में रानी विक्टोरिया के राज्यारोहण पर मिलने वाली मिठाई उन्होंने कूड़े में फेंक दी थी। कहा था कि गुलाम बनाने वालों का उत्सव हमारे लिए शोक का दिन है।

1902 में प्लेग में माता-पिता दोनों चल बसे। गरीबी ऐसी थी कि दीपक में तेल नहीं होता था, तो सड़क की लाइट के नीचे बैठकर पढ़ते थे। मेडिकल पढ़ने कोलकाता गए, लेकिन मकसद डॉक्टर बनना नहीं था। मकसद था क्रांतिकारियों से जुड़ना। अनुशीलन समिति में शामिल होकर पिस्तौल चलाना, बम बनाना, गुप्त संदेश भेजना सीखा। अंग्रेजों ने गिरफ्तार किया और 6 महीने जेल में रखा।

1916 में LMS डॉक्टर की डिग्री लेकर नागपुर लौटे तो लोगों ने सोचा क्लिनिक खोलेंगे। उन्होंने कहा कि मैं शरीर का नहीं, राष्ट्र का डॉक्टर बनूंगा। 1925 की विजयादशमी को नागपुर के मोहिते के बाड़े में 5-6 किशोरों को बुलाकर रोज 1 घंटे की शाखा शुरू की। 17 अप्रैल 1926 को इसका नाम रखा गया राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। लोगों ने कहा कि आप गुरु बन जाओ, तो उन्होंने मना कर दिया और भगवा ध्वज सामने रखकर कहा कि यही हमारा गुरु है।

व्यक्ति मरेगा, ध्वज अमर है। 1930 से 1940 तक साइकिल पर पूरे देश घूमकर गांव-गांव शाखा खोली। संघ में ब्राह्मण का बेटा और दलित का बेटा एक साथ दंड चलाते थे, एक थाली में खाते थे। टीबी हो गई, खून की उल्टियां होती थीं, पर कहते थे कि राष्ट्र का शरीर बीमार है, मेरा शरीर ठीक होकर क्या करेगा। 21 जून 1940 को 51 साल की उम्र में प्राण त्याग दिए और संघ की जिम्मेदारी गुरुजी गोलवलकर को सौंप गए।

गुरुजी के नेतृत्व में संघ ने विचार और संगठन दोनों को मजबूत किया। उनकी पुस्तकें “We, or Our Nationhood Defined” और “Bunch of Thoughts” संघ के विचार का आधार बनीं। संघ ने न सत्ता मांगी, न पैसा। सिर्फ एक बात कही कि भारत माता की जय बोलो, और उसके लिए जियो। 1947 के बंटवारे में पंजाब-दिल्ली खून से लथपथ थी। संघ ने 3000 राहत शिविर लगाए, महिला सुरक्षा दल बनाया। 3000 स्वयंसेवकों ने बलिदान दिया।

 

सरदार पटेल ने कहा था कि संघ न होता तो आधा दिल्ली कट जाता। 1962 के चीन युद्ध में स्वयंसेवकों ने दिल्ली की ट्रैफिक संभाली, रक्तदान किया। 26 जनवरी 1963 की परेड में नेहरू ने खुद 3000 स्वयंसेवकों को बुलाया और पूर्ण गणवेश में स्वयंसेवक राजपथ पर चले। 2001 के भुज भूकंप में 5000 स्वयंसेवक 45 दिन सेवा करते रहे। 2013 की केदारनाथ बाढ़ में 10,000 शव निकाले और 2 लाख यात्रियों को सुरक्षित निकाला। 2020-21 की कोरोना महामारी में 5.5 लाख स्वयंसेवक मैदान में उतरे, 7 करोड़ भोजन पैकेट बांटे, 20,000 श्मशान सेवाएं कीं।

सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत कहते हैं कि संघ किसी के विरोध में नहीं बना। इसका उद्देश्य है कि भारत विश्वगुरु बने।
राष्ट्रीय का मतलब है भारत माता के लिए समर्पित, किसी दल या सत्ता के लिए नहीं। स्वयंसेवक का मतलब है अपनी मर्जी से, बिना वेतन, बिना स्वार्थ के काम करने वाला।

संघ का मतलब है संगठन, क्योंकि अकेला व्यक्ति कुछ नहीं कर सकता, संगठित समाज सब कुछ कर सकता है। डॉ. मोहन भागवत कहते हैं कि बिना डॉक्टर हेडगेवार को जाने संघ को समझना संभव ही नहीं है। संघ के बारे में कई गलतफहमी हैं। संघ किसी को समाप्त करने के लिए नहीं बना। संघ बना है ताकि भारत परम वैभव पर पहुंचे।

डॉ. हेडगेवार ने 5 लोगों से जो बीज बोया था, आज वह वटवृक्ष बन चुका है। आज देशभर में 70,000 दैनिक शाखाएं चलती हैं, 60 लाख सक्रिय स्वयंसेवक हर दिन 1 घंटा राष्ट्र निर्माण में देते हैं। 1.5 लाख सेवा प्रकल्प चल रहे हैं और 40 से ज्यादा अनुषांगिक संगठन काम कर रहे हैं।

संघ का द्वार सबके लिए खुला है। शर्त सिर्फ एक है कि भारत माता को अपनी माता मानो। संघ कहता है कि मजहब अपना-अपना, देश सबका। मुसलमान अगर भारत माता को अपनी माता माने, तो वह हमारा भाई है। डॉ. मोहन भागवत कहते हैं कि हिंदू राष्ट्र का मतलब है कि मुस्लिम भी सुरक्षित रहें। अगर मुस्लिम डर में है तो वह हिंदू राष्ट्र नहीं। DNA सबका एक है – 40,000 साल पुराना।

आज मदर्स डे पर जब हम अपनी मां को गले लगाएं, तो एक पल उन अनाम सपूतों को भी याद करें जो चुपचाप जाकर सेवा कर आते हैं। जिन्हें सम्मान की भी आवश्यकता नहीं। उनका मंत्र है कि नाम नहीं, काम बोलना चाहिए।
आज 100 साल बाद भी वही मंत्र गूंज रहा है – नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे। 100 साल में संघ ने कोई सत्ता नहीं मांगी, कोई पैसा नहीं लिया। सिर्फ एक बात मांगी कि भारत माता की जय बोलो, और उसके लिए जियो।

शताब्दी वर्ष पर देश संघ से नहीं, संघ देश से कहता है – तेरा वैभव अमर रहे मां, हम दिन चार रहें न रहें। भारत माता की जय। वंदे मातरम्।
एक विचार राष्ट प्रेम में
यह भारत भूमि किसी धरती का टुकड़ा नहीं है,
यह एक जीता जागता राष्ट्र पुरुष है । 
यह वंदन की धरती है 
अभिनंदन की धरती है । 
यह अर्पण की भूमि है 
यह तर्पण की भूमि है 
इसकी नदी नदी 
हमारे लिए गंगा है 
 इसके कंकड़ कंकड़ 
हमारे लिए शंकर है 
 हम जिएंगे तो इस भारत के लिए 
और मरेंगे तो इस भारत के लिए 
और मरने के बाद भी गंगा जी में हमारी
अस्तियों को कोई कान लगाकर सुनेगा ।
 तो एक ही आवाज आएगी भारत माता की जय

 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री स्व अटल बिहारी वाजपेई जी का भाषण है राष्ट्र प्रेम के संबंध में जिसे उन्होंने अपने भाषण में कई बारअभिव्यक्त किया है ।

 

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Bhojram Sahu

By Bhojram Sahu

प्रधान संपादक "हमारा दल्ली राजहरा: एक निष्पक्ष समाचार चैनल"

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