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किसी दूसरे की संपत्ति धन ऐश्वर्य वैभव को देखकर मन में बैर का भाव नहीं रखना चाहिए । : पंडित गजानंद द्विवेदी

दल्ली राजहरा गुरुवार 30 अक्टूबर 2025 भोज राम साहू 98937 65541
माताजी स्व. श्रीमती सरोज यादव के स्मृति में 28 अक्टूबर से 5 नवंबर तक वार्ड नंबर 24 न्यू बस स्टेशन स्थित ब्राह्मण समाज भवन में चल रहे श्रीमद् भागवत ज्ञान यज्ञ सप्ताह में पंडित गजानंद द्विवेदी ने अपने कथा में बताया कि किसी दूसरे की संपत्ति धन ऐश्वर्य वैभव को देखकर मन में कभी बैर की भावना नहीं रखनी चाहिए । भगवान ने जो आपके भाग्य में लिखा है वही आपको प्राप्त होगा इसके लिए आप निरंतर भगवान को साक्षी मानकर पूरी लगन और ईमानदारी के साथ मेहनत करें l

कथा में आज तीसरे दिन शिव पार्वती शिव_ सती की कथा बताया गया l कथा के मध्य में उन्होंने बताया कि एक गांव में एक व्यक्ति रहता था उन्हें कहीं से एक मनोकामना पूर्ण करने वाला शंख प्राप्त हुआ । शंख में यह गुण था कि यदि आप उनसे कुछ भी मांगो तो आपसे दोगुना पड़ोसी को मिलता था l वह व्यक्ति प्रतिदिन उनसे अपने इच्छा अनुसार मांगता लेकिन पड़ोसियों को उनसे दुगुना मिल जाता । इससे उनकी पत्नी हमेशा नाराज रहती थी । एक दिन किसी कारणवश उसे कहीं जाना पड़ा । उन्होंने अपनी पत्नी को सख्त हिदायत दी कि किसी भी कीमत पर शंख को अलमारी से बाहर मत निकालना । कुछ दिन बाद वापस आया तो देखा कि पूरे गांव में सभी का घर डबल मंजिल का हो गया था । उसे समझने में देर नहीं लगा । जो घर सिंगल था समझ गया वही मेरा है l उन्होंने घर पहुंच कर पत्नी से शंख को मंगवाया और उनसे प्रार्थना कर कहा हे शंख देवता मेरी एक आंख फूट जाए उस व्यक्ति की एक आंख तो फूट गई लेकिन इसके विपरीत जो शंख का गुण था उसके परिणाम स्वरूप पूरे गांव वाले अंधे हो गए । अब व्यक्ति की पत्नी और वह दोनों खुश हो गए ।

एक दिन कहीं वह अकेला जा रहा था अचानक सामने पत्थर आ जाने पर गिर गया अब उसकी दूसरी आंख फूट गई अब वह व्यक्ति अंधा हो गया ।उन्होंने किसी तरह घर पहुंचा और अपनी पत्नी से कहा तुरंत शंख देवता को बाहर निकालो । उन्होंने शंख देवता को प्रणाम कर कहा हे शंख देवता मेरे दोनों आंख ठीक हो जाए । तब शंख देव ने कहा यह विधि के विधान के विपरीत है l भगवान ने मानव को दो आख दिए हैं मैं नहीं चाहता कि सभी के चार-चार आंख हो जाए तब उन्होंने कहा ठीक है मेरी एक आंख ठीक हो जाए । उस व्यक्ति की एक आंख तो ठीक हो गई लेकिन पूरे गांव वाले के दोनों आंखें ठीक हो गई ।इसीलिए कहा गया है आपके पास जो कुछ भी है उसी में संतुष्ट रहिए । किसी दूसरों की ऐश्वर्या वैभव को देखकर मन में बैर की भावना मत रखिए l

शिव विवाह के संबंध में महाराज जी ने बताया कि पहले जन्म में राजा दक्ष प्रजापति की पुत्री होने पर अपने पिता के द्वारा यज्ञ में ना बुलाए जाने एवं भगवान शिव की यज्ञ में अपमान होने के कारण वह यज्ञ के अग्नि में जलकर भस्म हो जाती है l मां सती के देह त्याग करने के बाद, भगवान शिव ने अपनी तपस्या शुरू कर दी। वे इतने अधिक लीन हो गए कि उनकी तपस्या से पूरा ब्रह्मांड प्रभावित होने लगा।

इसी बीच, भगवान विष्णु के वरदान से हिमवान और मेना के घर में एक कन्या का जन्म हुआ, जिसका नाम पार्वती था। पार्वती भगवान शिव की भक्त थीं और उन्होंने भगवान शिव को अपना पति बनाने का संकल्प लिया। पार्वती ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या शुरू कर दी। भगवान शिव को अपने प्रति आकर्षित किया। भगवान शिव पार्वती की तपस्या और भक्ति से प्रसन्न हुए और उनसे विवाह करने का निर्णय लिया। भगवान शिव और पार्वती का विवाह एक भव्य समारोह में हुआ, जिसमें सभी देवी-देवता और ऋषि-मुनि उपस्थित थे।

भगवान शिव के विवाह में उनके बाराती बहुत ही अनोखे और विचित्र थे। उनकी बारात में भूत-प्रेत ,पिशाच , यक्ष , गंधर्व और नंदी भगवान शिव के विश्वासपात्र और सबसे करीबी सेवक थे lजब भगवान शिव की बारात हिमालय के घर पहुंची, तो लोगों ने उनके घर बारातियों को देखकर बहुत आश्चर्य और भय महसूस किया। लोगों ने भगवान शिव की बारात को देखकर कहा “यह तो एक भूतों की बारात है! भगवान शिव के साथ इतने सारे भूत-प्रेत और पिशाच कैसे हो सकते हैं?”लेकिन भगवान शिव की पत्नी पार्वती ने अपने पिता हिमालय से कहा: “पिताजी, भगवान शिव की बारात में शामिल होने वाले ये सभी जीव उनके अनुयायी और सेवक हैं। वे भगवान शिव की शक्ति और प्रभाव का प्रतीक हैं।”

इस तरह, भगवान शिव की बारात का स्वागत हिमालय के घर में हुआ और उनका विवाह पार्वती के साथ संपन्न हुआ।शिव पार्वती विवाह को ब्रह्मांड का अद्भुत विवाह कहा जाता है क्योंकि यह विवाह दो विपरीत शक्तियों के मिलन का प्रतीक है। भगवान शिव को विनाशक और योगी के रूप में जाना जाता है, जबकि देवी पार्वती को प्रेम, सौंदर्य और सृजन की देवी के रूप में पूजा जाता है।
इसके अलावा, शिव पार्वती विवाह को ब्रह्मांड का अद्भुत विवाह इसलिए भी कहा जाता है क्योंकि यह विवाह ब्रह्मांड की उत्पत्ति और विकास का प्रतीक है। यह विवाह देवी पार्वती के पूर्वजन्म में सती के रूप में भगवान शिव के साथ उनके विवाह की पुनरावृत्ति भी है।





