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“”जीवन में सुख दुख तो हमेशा चलता रहेगा इसलिए हमेशा मुस्कुराते हुए जिंदगी जिए..!” :—भागवताचार्य पं. चैतन्य पाण्डेय

दल्ली राजहरा

बुधवार 24 दिसंबर 2025

भोजराम साहू 9893 765541

दल्ली राजहरा गणेश चौक वार्ड नंबर 2 में मोहल्ले वासियों के सहयोग से श्रीमद शिव महापुराण कथा का आयोजन किया जा रहा है । इस आयोजन के भागवताचार्य पंडित चैतन्य पाण्डेय ग्राम बगदई (भरदा )जिला बालोद के हैं ।

भागवताचार्य चैतन्य पांडे जी ने बताया कि इंसान को अपने द्वारा किए गए कर्मों का बखान स्वयं के मुख से नहीं करना चाहिए । आपने क्या किया है क्या नहीं यह तो लोग अपने मुंह से आपको बताएंगे कि वास्तव में अपने किया गया कार्य लोकहित में था या स्वयं के हित और अपने स्वार्थ के लिए किए थे ।

कथा में महाराज जी ने रामेश्वरम शिवलिंग की स्थापना के संबंध में कथा बताया उन्होंने बताया कि लंका विजय के लिए जब मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम समुद्र किनारे लंका विजय की कामना के लिए भगवान शिव की स्थापना के लिए पूजा अर्चना की तब उन्होंने अपने सैनिकों से कहा की उच्च कोटि का विद्वान ब्राह्मण की व्यवस्था की जाए जिससे उनकी पूजा सफल हो तथा युद्ध में विजय प्राप्ति हो । सभी ने बताया कि दूर-दूर तक सिर्फ एक ही व्यक्ति है जो इस योग्य है उन्होंने लंका के महाराजा रावण की बात बताई । वे तो शत्रु थे उन्हें पर विजय के लिए भगवान शिव की स्थापना हो रही थी । भगवान राम असमंजक में पड़ गए फिर भी उन्होंने पूजा के लिए जामवंत जी से लंका पति राजा रावण के लिए संदेश भेजा ।

जब लंका पति रावण को यजमान बने का न्योता मिला तो वह सहर्ष तैयार हो गया । लेकिन उन्होंने सोचा मेरा यजमान वलकट वस्त्र धारी हैं वे वनवासी है उनके पास पूजा के लिए कुछ भी सामग्री नहीं है तो पूजा कैसे संपन्न होगा । इसलिए उन्होंने जामवंत जी से कहा यजमान से कहना मैं पूजा का सामग्री स्वयं लेकर आऊंगा । उन्हें बस स्नान होकर पूजा स्थल पर बैठना है l महाराज रावण विद्वान थे उन्हें पता था कि हिंदू धर्म में बिना पत्नी के पूजा संपन्न नहीं होता तब उन्होंने माता सीता को भी पूजा स्थल पर लेकर गए थे । लेकिन उन्हें कुछ दूरी पर घाट पर छोड़ दिए ।तय समय अनुसार महाराज रावण पूजा स्थल पर गया वहां भगवान राम और लक्ष्मण बैठे थे रावण ने सामग्री सजाई और पूजा के लिए भगवान राम से इशारा करके कहा पत्नी ..! महाराज भगवान राम समझ गए जब महाराज रावण इतना विद्वान है तो जरूर माता- सीता को लेकर आए ही होंगे उन्होंने जोर से आवाज दी सीते माता- सीता दौड़कर आई और भगवान राम के बगल में बैठ गई ।
इस तरह भगवान राम के हाथों रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना हुई जब पूजा संपन्न हुआ तब दक्षिण की बात आई तब रावण ने भगवान श्री राम के हाथों जल देकर संकल्प लेने कहा जजमान भगवान श्री राम असमंजक में पड़ गए महाराज रावण ने कहा प्रभु मेरा आपसे विनती है जब मेरी मृत्यु का समय आए तब मुझे आपका दर्शन हो दूसरा यह की दक्षिणा मैं यह मांगता हूं कि जब मेरी मौत हो तो आपका नाम लेता हुआ मरूं ।
 पंडित जी ने कथा के उपरांत बताया कि भगवान ने हमें मानव जन्म दिया है लेकिन मानव उदास चेहरा लेकर चलते हैं क्या हमारा यही जीवन है । क्या आपने कभी पशुओं को हंसते मुस्कुराते देखा है जब यदि हमें भगवान ने मानव जन्म दिया है हंसने मुस्कुराने के लिए। एक दूसरे के दुख दूर करने के लिए ऐसा दुखी चेहरा क्यों लिए रहते हैं आप यदि एक बार मुस्कुरा देते हैं तो आपका चेहरा में रौनकता बन जाती है । हंसने से सभी दुख दूर हो जाते हैं । आज की दुनिया में कोई सुखी नहीं है धनवान धन पाकर दुखी है तो निर्धन धन नहीं है इसलिए दुखी है इस सुख-दुख हमेशा जीवन में चलता रहेगा इसलिए हमेशा हंसते हुए जिंदगी जिए मुस्कुराइए ।

 

दूसरी कथा उन्होंने देव ऋषि नारद के संबंध में बताया उन्होंने बताया कि देव ऋषि नारद को अपने तपस्या का घमंड हो गया था एक बार वे कैलाश पर्वत पर तपस्या करने गए । उनकी तपस्या देखकर देवराज इंद्र घबरा गए उन्होंने तपस्या भंग करने के लिए कामदेव को भेजा । फिर भी वे टस से मस नहीं हुए ।

अंत में किसी तरह तपस्या खत्म कर भगवान ब्रह्मा से मिलने गए । उन्हें बताया कि मैं कठोर तपस्या किया भगवान इंद्र ने कामदेव को भेजा तब भी मैंने अपनी तपस्या भंग नहीं की । उन्होंने कहा यह बात मुझे बताया तो बताया और किसी को मत बताना । लेकिन देवर्षि नारद भगवान शंकर के पास भी जाकर यही बात बताया उन्होंने विष्णु लोक में जाकर भगवान विष्णु को बताया भगवान विष्णु ने सोचा देव ऋषि नारद को अपने तपस्या का घमंड हो गया है उनकी घमंड को तोड़ना जरूरी है । जैसे ही नाराद विष्णु लोक से निकले वह रास्ते में एक सुंदर सा महल की रचना की तब उन्होंने राजा के महल को देखा तो वहां के राजा शिव निधि से मिलने पहुंचे । शिव निधि ने अपनी बेटी विश्व सुंदरी के भविष्य के बारे में नारद मुनि से पूछा नाराज ..!

मैं अपनी बेटी का स्वयंवर रचा रहा हूं आप बताइए इसे कैसा पति मिलेगा । तब नारद विश्व सुंदरी के हाथ को देखते ही पथभ्रष्ट हो गया वह भगवान विष्णु के माया में भ्रमित हो गया ।हाथ देखना छोड़कर उनके चेहरा देखने लग गए । नारद जी ने कहा आपकी बेटी विश्व सुंदरी को भगवान विष्णु की तरह सुंदर पति मिलेगा । नारद जी का इतना कहना था और वह दौड़कर भगवान विष्णु के पास गए और उन्होंने भगवान विष्णु से कहा प्रभु मुझे आपका चेहरा उधार दे दीजिए । मुझे विश्व सुंदरी से मोह हो गया है मुझे उनसे विवाह करना है । भगवान विष्णु ने कहा नाराद मेरा चेहरा पाना आसान है लेकिन इसको निभाना बहुत ही मुश्किल और कठिन है । यदि तुम्हारा यही इच्छा है तो मैं अपना चेहरा तुम्हें उधार देता हूं । नारद मुनि को लगा भगवान विष्णु ने ने उन्हें अपना चेहरा उधार में दिया है और वह स्वयंवर में जाकर बैठ गए । जैसे ही लोगों ने देखा एक व्यक्ति अजीब सा चेहरा लिए स्वयंवर में घुस आया है नाक मुंह सिकोड़ने लगा और वह जहां-जहां विश्व सुंदरी जाती वहां बीच कोने में घुस जाता ।

अंत में विश्व सुंदरी ने कहा यह अजीब सा आदमी कौन है इसे बाहर निकलिए । सेवक ने उन्हें पड़कर जब बाहर कुएं के पास ले जाकर खड़ा किया तब नारद मुनि ने जैसे ही अपना चेहरा कुएं के पानी में देखा वानर रूप देखकर बहुत लज्जित हुआ । इसी समय देखा कि भगवान विष्णु विश्व सुंदरी के साथ रथ में जा रहे थे भगवान विष्णु को देखकर नारद मुनि को क्रोध आ गया और उन्होंने भगवान विष्णु को श्राप देते हुए कहा कि भगवान विष्णु भगवान आप मुझे आज देखकर मुस्कुरा रहे हैं जिस विश्व सुंदरी के मोह में पड़कर मैंने अपना आपा खो दिया आपसे आपका रूप मांगा लेकिन आपने मुझे वानर का रूप दे दिया ।

मैं आपको श्राप देता हूं यही वानर आपको एक दिन काम आएगा लेकिन  जिस विश्व सुंदरी के लिए मैं रो रहा हूं वैसे ही आप भी अपनी पत्नी के लिए रोते-रोते भटकोगे । ब्रह्म ऋषि नारद की बात सत्य हुई और सतयुग में भगवान राम माता सीता के लिए भटकते रहे और जिसे भगवान विष्णु ने वानर रूप दिया था वही नारद मुनि भगवान हनुमान बनकर हमेशा उनका सहयोग किया ।

Bhojram Sahu

प्रधान संपादक "हमारा दल्ली राजहरा: एक निष्पक्ष समाचार चैनल"

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