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“मित्र धर्म निभाएं तो सुदामा जैसे निभाए , सुदामा ने अपने मित्र भगवान श्रीकृष्ण को विपत्ति से बचाने गरीब बनना स्वीकार किया..!”:—- पंडित विजय शर्मा भागवत आचार्य

दल्ली राजहरा

रविवार 18 जनवरी 2026

भोज राम साहू 9893765541

दल्ली राजहरा के वार्ड क्रमांक 25 अनिल प्रिंटिंग प्रेस के ऊपर रेलवे कॉलोनी पानी टंकी के पास श्रीमद् भागवत महापुराण ज्ञान यज्ञ सप्ताह का आयोजन दिनाँक 10 जनवरी 2026 से 18 जनवरी 2026 तक मोहल्ला वासीयो के द्वारा शानदार चौथा वर्ष में किया जा रहा है। श्रीमद् भागवत ज्ञान यज्ञ सप्ताह के भागवताचार्य पंडित पं. विजय शर्मा ( दल्ली राजहरा ) श्रीमद् भागवत ज्ञान यज्ञ सप्ताह में कल कथा में सातवें दिन  भागवताचार्य पंडित विजय शर्मा ने भगवान श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा बताया उन्होंने बताया कि मित्र हो तो सुदामा और श्री कृष्ण की जैसी क्योंकि सुदामा ने अपने मित्र कृष्ण के लिए दरिद्रता सही । उन्हें मालूम था कि बूढी मां के चना खाने से उनका श्राप लगेगा और वह दरिद्र हो जाएंगे इसलिए उन्होंने कर्मयोगी श्री कृष्ण को बचाने के लिए श्रापित पूरे चना खा गया और दरिद्रता स्वीकार किया ।

श्रीमद् भागवत कथा में उन्होंने बताया कि । सुदामा गरीब क्यो बना क्या कारण है …? सुदामा बलराम और श्री कृष्ण महर्षि गुरु सांदीपनी के आश्रम रह कर शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। सुदामा और श्री कृष्ण परम मित्र थे। सुदामा पहले गरीब नही था । सुदामा अपने मित्र के हिस्से का आने वाली विपत्ति को स्वीकार कर अपने आप को गरीब बनाया। 

एक समय गुरुकुल के पास गांव में एक बुढ़िया माँ रहती थी । वह भिक्षा मांगकर अपने शालीग्राम का पूजा कर उसे भोग लगाती थी। एक बार उन्हें को भिक्षा नही मिला । बुढियां मां शालीग्राम से से बोली प्रभू कल भिक्षा माँगकर लाऊँगी और आपको भोग लगाऊँगी । दूसरे दिन बुढिया माँ भिक्षा माँगने गई भिक्षा मांगते शाम हो गई वह थकी हारी अपने कुटिया में आयी और शालीग्राम से कहा प्रभु आज एक थक गयी हूँ कल प्रातः भोग लगाऊँगी यह कहकर वह चने की पोटली को वहाँ खूंटी में टांग दी और सो गई। उसी रात दो चोर आये और उसी कुटीया में घुस गये और पोटली चोरी करके भाग गये । 

जिस गुरुकुल मे श्री कृष्ण और सुदामा शिक्षा ग्रहण कर रहे थे वहाँ भी वही चोर पहुँचा चोरी के नियत से । जिसे किसी ने देख लिया और चिल्लाया चोर चोर यह देखकर वह चोर भागने लगा उसी दौरान चने की पोटली वहाँ गिर गयी और वह पोटली गुरुकुल मे रख लिये । प्रात : दूसरे दिन कृष्ण सुदामा लकड़ी लाने के लिए जंगल गए तब गुरु माता ने श्री कृष्णा और सुदामा को वह चने की पोटली भूख लगने पर खाने के लिए दे दिए ।
 इधर वह बुढ़िया माँ जब सबेरे उठी और देखी मेरे चने की पोटली वहाँ पर नहीं है। वह दूखी मन से अपने आप बुदबुदाई कि जो मेरे गरीब का चना खायेगा वह दीन हीन गरीब हो जाएगा , यह मेरा श्राप है ..!

सुदामा को यह सब ज्ञान हो गया था। वही चने की पोटली गुरुमाता श्री कृष्ण के हाथ में दिया था कि रास्ते मे खा लेना । तत्पश्चात् सुदामा ने वह चना अपने हाथ में ले लिया वह चना श्रापित था यह जानकर सुदामा ने यह सोचा कि मेरे मित्र कृष्ण इस चने को खाएंगे तो वह गरीब हो जायेंगे। यह चना मैं अकेले खाऊँगा और गरीब हो जाऊँगा और श्री कृष्ण जग के पालनहार है वह मुझे संभाल लेंगे । यह सोचकर वह पूरा चना खा लिया इस कारण सुदामा गरीब हुए।

 गुरुकुल से निकलने के बाद कृष्ण द्वारिका चले गये और सुदामा अपने नगर चले गए। कुछ समय बाद सुदामा का विवाह सुशीला नामक कन्या से हुआ। सुदामा का समय के अनुसार चार संतान उत्पन्न हुए। सुदामा हर समय हरिकिर्तन जप करता। श्रापित चने का असर दिखना शुरू किया और सुदामा गरीब होते चला गया । वह हर समय हरी का नाम जपा करता । सुदामा भीख न माँगकर गली में कृष्ण कृष्ण करके जपा करता और जो मिले उसे अपने घर लाकर सुखी से रहता था। कभी सुदामा भूखा रहता कभी खाना नसीब नहीं होता था। बच्चे भी भूखे रहते थे। एक दिन सुशिला अपने पति से बोली के स्वामी आपका कन्हैय्या से बहुत अच्छी मित्रता है। जाओ वहाँ से मांगकर कुछ ले आओ जिससे हमारे परिवार का कुछ दिन गुजारा चले। सुदामा बोले में खाली हाथ कैसे जाऊ मेरे पास तो कुछ भी नहीं है। सुशीला बोली चिन्ता न करो स्वामी मैं पड़ोस से कुछ माँग कर ले आती हूँ। सुशीला पडोस में गयी और दो मुट्ठी चावल माँगकर लायी जिसे सुदामा अपनी फटी धोती में बाँधकर द्वारिका की ओर चले गये और रास्ते मे कृष्ण कृष्ण करते चले गये जब वह वहाँ पहुंचे तो लोग उन्हें देखकर मजाक उड़ाते । सुदामा उन्हें कहते श्री कृष्ण मेरे मित्र है। यह खबर जब कृष्ण को मिला तो वह नंगे पैर दौड़ते आये , सुदामा को सीने से लगा लिया और महल ले गये। भगवान अपने आंसुओं से सुदामा का पैर धोए। इधर भगवान श्री कृष्ण की आंखों में मित्र को देखकर आंसू था क्योंकि उन्होंने श्री कृष्ण के हिस्से का दुख स्वयं भोग लिया। तो उधर मित्र सुदामा की आंखों में बड़े दिनों बाद भगवान श्री कृष्ण को देखकर आंसू निकल रहे थे। भगवान और भक्त की यह अदभुत मिलन था । दोनों एक दूसरे को देखकर रो रहे थे दोनों के आंखों से अविरल आंसू की धारा बह रहे थे।

भगवान श्री कृष्णा अंतर्यामी थे उन्होंने सुदामा से कहा की भाभी ने जो मेरे लिए उपहार भिजवाई है वह कहां है मुझे दीजिए । सुदामा संकोच ग्रस्त हो गए इतने बड़े महाराज उसके लिए मैं क्या लाया हूं मुट्ठी भर चावल उन्हें दु तो दु कैसे । भगवान श्री कृष्ण ने अपने मित्र सुदामा से पोटली छीन लिए और उसमे से दो मुट्ठी चावल खा गये । जैसे ही तीसरी मुठी चावल हाथ मे लिये तो रुक्मिणी ने उनका हाथ पकड़ लिया और बोली के हमारे लिये भी कुछ छोड़ो । श्री कृष्ण दो मुट्ठी चावल में सुदामा का काया बदल दिये। सुदामा वहाँ से अपने नगर की ओर चले गये । सुदामा ने देखा उसकी झोपड़ी राजमहल में बदल गया था।

 भगवान श्री कृष्ण कभी किसी को नाराज नहीं करते। जो उन्हे सच्चे मन से पुकारता है वह दौड़ कर चले आते हैं। भक्ति ही सब कुछ है, भक्ति मे भागवत प्राप्ति है। हम भगवान के अंश है वह सदैव हमारे साथ रहते है। भक्ति करो जितना हो सके उतना भक्ति करो। भक्ति में ही शक्ति प्राप्ति होगी और वैकुण्ठ नहीं मोक्ष धाम मिलेगा जिससे दोबारा इस मृत्यु लोक में नहीं आना नहीं पड़ेगा ।

Bhojram Sahu

प्रधान संपादक "हमारा दल्ली राजहरा: एक निष्पक्ष समाचार चैनल"

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