दल्ली राजहरासोमवार 18 मई 2026भोज राम साहू 9893765541 शहरों की कंक्रीट की दीवारों और एसी की हवा में बड़े होते बच्चों के लिए आज गौरैया किसी कहानी की किरदार जैसी हो गई है। कभी हर घर की खिड़की, छत और आंगन में चूं-चूं करती ये नन्ही मेहमान अब विलुप्ति के कगार पर खड़ी हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के बागबाहरा तहसील के ग्राम आमाकोनी में कुछ लोगों ने ठान लिया है कि वो बीते दिनों को वापस लाएंगे। उनकी कोशिश का नाम है “दो कदम प्रकृति की ओर” — एक ऐसी संस्था जो सिर्फ गौरैया नहीं बचा रही, बल्कि पर्यावरण, जल, गौ-संरक्षण और सामाजिक जागरूकता के मोर्चे पर भी चुपचाप काम कर रही है। और सबसे बड़ी बात, ये सब हो रहा है बिना किसी सरकारी मदद के, सिर्फ लोगों के सहयोग और निस्वार्थ सेवा से। एक टूटे अंडे से शुरू हुई क्रांति साल 2017 की बात है। आमाकोनी निवासी संजय साहू, जो पेशे से फार्मासिस्ट हैं, अपने घर के टिन शेड में रोज गौरैयाओं को आते-जाते देखते थे। एक दिन उन्होंने देखा कि तेज हवा और बारिश में गौरैया के अंडे नीचे गिरकर फूट गए हैं। उस दृश्य ने उन्हें भीतर तक हिला दिया। “अगर इंसान के घर में रहने वाली चिड़िया को सुरक्षित ठिकाना नहीं मिलेगा, तो वो कहां जाएगी?” इसी सवाल ने उन्हें एक रास्ता दिखाया। नवरात्रि के बाद बेकार हो चुके मिट्टी के कलश को उन्होंने साफ करके घर के कोने में लटका दिया। कुछ ही दिनों में गौरैया ने उसे अपना घोंसला बना लिया। वहीं से शुरू हुआ ‘एक कदम प्रकृति की ओर’ अभियान, जो धीरे-धीरे पूरे गांव और फिर सात गांवों तक फैल गया। आज आमाकोनी, रोड़ा, खुटेरी, तमोरी, डोंगा, कोकनाधार और गरियाबंद के संबलपुर गांवों में हर घर की छत पर मिट्टी का घोंसला लटका मिल जाएगा। इन गांवों को अब लोग ‘गौरैया ग्राम’ के नाम से जानते हैं। सुबह होते ही बच्चों का उठना गौरैया की चहचहाहट के साथ होता है, और शाम ढलते ही यही आवाजें माहौल को सुकून देती हैं। 10,000 घोंसले, 13 राज्य, एक मकसदसंस्था ने अब तक 10,000 से अधिक मिट्टी के घोंसले निःशुल्क वितरित किए हैं। कुम्हारों से विशेष रूप से बनवाए गए ये घोंसले न सिर्फ गौरैया को सुरक्षित ठिकाना देते हैं, बल्कि स्थानीय कारीगरों के लिए रोजगार का साधन भी बने हैं। संजय साहू और उनके साथी सोशल मीडिया के जरिए लोगों को घोंसला बनाना और पक्षी संरक्षण सिखाते हैं। इसका असर यह हुआ कि पंजाब, गुजरात, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, झारखंड, ओडिशा, मध्यप्रदेश समेत 13 राज्यों के लोग रजिस्ट्री के जरिए घोंसले मंगवा रहे हैं। आमाकोनी के चौराहे पर बना ‘गौरैया गार्डन’ तो अब एक छोटा सा पर्यटन स्थल बन गया है, जहां 50 से अधिक बसेरे लटकाए गए हैं और पक्षियों का मेला लगा रहता है।संजय बताते हैं, “गौरैया इंसानों के बीच रहना पसंद करती है। मिट्टी का बसेरा उनके अंडों को गिरने से बचाता है और उन्हें ठंडक देता है। दिसंबर से बारिश शुरू होने तक ये अपना घोंसला बनाती हैं और साल में 2-3 बार अंडे देती हैं। इन्हें कीट, धान, पका चावल और चावल के टुकड़े सबसे ज्यादा पसंद हैं।” सिर्फ गौरैया नहीं, पूरा पारिस्थितिकी तंत्रसंस्था का काम सिर्फ गौरैया तक सीमित नहीं रहा। ‘तोता को पिंजरे से आजाद करो’ अभियान के तहत लोगों को समझाया जा रहा है कि जंगली पक्षियों को कैद में रखना उनके स्वभाव के खिलाफ है। जल संरक्षण के लिए तालाबों के किनारे और स्कूलों में पौधारोपण किया जा रहा है। गर्मियों में गौ-वंशों और पक्षियों के लिए पानी और दाना रखने की व्यवस्था की जाती है।रेलवे फाटक के पास जहां लोग 20-30 मिनट तक धूप में खड़े रहते थे, वहां संस्था ने छायादार पौधे लगाए। तीन साल पहले लगाए गए आम के दो पौधे आज पेड़ बनकर राहगीरों को छांव दे रहे हैं। इसी तरह आंवराडबरी के तालाब किनारे 2020 में लगाए गए बरगद और पीपल के पौधे अब 15-20 फीट के हो चुके हैं। इन्हें कर्मा हॉस्पिटल के डॉ. धीरेंद्र साव ने अपनी स्वर्गीय मां की स्मृति में रोपा था। आज ये पेड़ पूरे इलाके में हरियाली बिखेर रहे हैं। समाज को जोड़ती मुहिम“दो कदम प्रकृति की ओर” की सबसे बड़ी ताकत इसके लोग हैं। संस्था में 22 साल के कन्हैया यादव से लेकर 60 साल की कमला साहू तक हर उम्र के सदस्य जुड़े हैं। अध्यक्ष संजय साहू, सचिव पुष्पराज निषाद, उपाध्यक्ष कन्हैया यादव, कोषाध्यक्ष उमेश कुमार दीवान, संयुक्त सचिव कमला साहू, संरक्षक सुमीत कुमार साहू समेत 25 से अधिक कार्यकर्ता अपनी आय का एक हिस्सा हर महीने इस काम के लिए निकालते हैं।साल 2022 में पंजीकृत हुई यह संस्था पिछले 8-9 सालों से बिना रुके काम कर रही है। स्कूलों में जागरूकता कार्यक्रम, सार्वजनिक स्थानों पर पौधारोपण, जंगल में आग न लगाने की अपील, पर्यावरण दिवस पर विशेष अभियान — हर मोर्चे पर ये लोग सक्रिय हैं। उनके अभियानों के नाम भी उतने ही दिल को छूने वाले हैं — “हमर गांव स्वच्छ हरा भरा गांव”, “एक पेड़ आने वाले कल के नाम”, “मिशन-गौरैया”, “हर घर बसेरा”, “जल है तो कल हैं”, “माह की कुछ कमाई प्रकृति के नाम”। इन अभियानों के जरिए उन्होंने गांव-गांव में यह संदेश पहुंचाया है कि प्रकृति की सेवा कोई बड़ा काम नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिम्मेदारी है। भविष्य का सपनासंजय साहू और उनकी टीम का सपना है कि हर गांव ‘गौरैया ग्राम’ बने। हर घर में फलदार वृक्षों का बगीचा हो, हर घर में जल संचयन की व्यवस्था हो, गौ-वंश फिर से घरों में लौटें और वन्य जीवों की सुरक्षा के लिए लोग खुद खड़े हों। स्कूल के बच्चों के लिए तो उन्होंने अलग से कार्यक्रम बनाए हैं, ताकि नई पीढ़ी प्रकृति से जुड़कर बड़ी हो।“यह बड़ी चुनौती है कि हर व्यक्ति में प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का भाव पैदा किया जाए। लेकिन हम हार नहीं मानेंगे। हमारा प्रयास है कि आने वाले सालों में यह मुहिम महासमुंद से निकलकर पूरे छत्तीसगढ़ और देश तक पहुंचे,” संजय कहते हैं। आप भी बन सकते हैं हिस्साअब तक संस्था को किसी तरह की सरकारी या संस्थागत आर्थिक मदद नहीं मिली है। सारा काम लोगों के छोटे-छोटे सहयोग से चल रहा है। जो भी व्यक्ति प्रभावित होता है, वो खुद आगे आकर मदद करता है। मिट्टी के घोंसले अब भी निःशुल्क दिए जाते हैं, और बदले में लोग स्वेच्छा से सहयोग राशि दे देते हैं।अगर आप भी इस मुहिम का हिस्सा बनना चाहते हैं, तो “दो कदम प्रकृति की ओर” समिति से 8839830574 या 8717965727 पर संपर्क कर सकते हैं। ईमेल dokadamprakritikior@gmail.com पर भी जुड़ सकते हैं। सहयोग के लिए संस्था का खाता पंजाब नेशनल बैंक, खम्हरिया में है — A/C No. 1059002100001597, IFSC: PUNB0105900। एक छोटी चिड़िया, बड़ा संदेशआज जब शहरों में गौरैया की चहचहाहट दुर्लभ हो गई है, आमाकोनी जैसे गांव याद दिलाते हैं कि बदलाव के लिए बड़ी मशीनरी या करोड़ों के बजट की जरूरत नहीं होती। जरूरत होती है एक संवेदनशील मन की, जो टूटते अंडे को देखकर रुक जाए और सोच ले कि कुछ तो करना होगा। “दो कदम प्रकृति की ओर” की कहानी यही सिखाती है कि अगर इरादा सच्चा हो, तो एक व्यक्ति का कदम भी पूरे समाज को नई दिशा दे सकता है। और शायद यही वजह है कि आज सात गांवों की छतों पर लटकते मिट्टी के घोंसले, आने वाले कल के लिए उम्मीद का प्रतीक बन चुके हैं। अपीलयदि आपके पास भी ऐसी कोई कहानी हो तो आप अवश्य संपर्क करिए आपकी कहानी पाठकों के पास निशुल्क प्रसारित की जाएगी ताकि लोग आपसे प्रेरणा लेकर ले सके । धन्यवाद भोजराम साहू संपादक (हमारा दल्ली राजहरा _एक निष्पक्ष समाचार चैनल ) 98937 65541Spread the lovePost navigationगर्मी की छुट्टियों में ट्रेनों में उमड़ी भीड़, अतिरिक्त कोच की मांग उठी – आशीष गुप्ता