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संडे मेगा स्टोरी में आज पढ़िए 95% विकलांग होने के बावजूद चित्रकला के क्षेत्र में राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त करने वाले बसंत साहू की कहानी..!

दल्ली राजहरा रविवार 07 दिसम्बर 2025
भोजराम साहू 9893 765541
हमारा दल्ली राजहरा एक निष्पक्ष समाचार चैनल के 07 दिसंबर 2025 के संडे मेगा स्टोरी के 34 वा अंक में आज पढ़िए 95 प्रतिशत विकलांग होने के बावजूद चित्रकला के क्षेत्र में राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त करने वाले धमतरी जिले के कुरूद निवासी बसन्त साहू की कहानी ..!

“मंजिलें उन्हीं को मिलती है,
जिनके सपनों में जान होती है!
पंख से कुछ नहीं होता,
हौसलों से उड़ान होती है !!”

इन्हीं मजबूत इरादों और हौसलों की कहानी आज के संडे मेगा स्टोरी में पढ़िए…!

दुर्घटना में विकलांग होने के बावजूद छत्तीसगढ़ धमतरी जिले के कुरूद के बसंत साहू ने अपनी कला को आगे बढ़ाया और चित्रकला के क्षेत्र में राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त किया । उनकी इस उपलब्धि ने यह साबित कर दिया कि इस जीवन में कुछ भी असंभव नहीं है जब तक आप हार नहीं मान जाते । इसलिए कहा जाता है । कि
“मन के हारे हार है ,
मन की जीते जीत ।”

03 दिसंबर 2025 को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में भारत सरकार सामाजिक न्याय एवं आधिकारिता मंत्रालय द्वारा दिव्यांग जनशक्तिकरण के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार 2025 से सम्मानित किया है । उनकी यह व्यक्तिगत उपलब्धि के साथ-साथ पूरे छत्तीसगढ़ और देश के लिए गौरव का पल था।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से पुरस्कार प्राप्त बसंत साहू एक ऐसे व्यक्तित्व के धनी हैं जिनकी हौसला ने उन्हें नव जीवन दिया है ।

बसंत साहू के बारे में आपको बता रहे हैं वह एक कुशल सबमर्सिबल पंप के मोटर मैकेनिक थे । आज से 30 वर्ष से पहले 15 सितंबर 1995 को मोटर पंप बनाने अपने सहयोगी के साथ गए थे वापसी में आते समय ट्रक के साथ दुर्घटनाग्रस्त हो गए । वे घटनास्थल पर ही वह पड़े थे गांव वाले ने उनके परिवार वालों को बताया तब परिवार वाले उन्हें उठाकर धमतरी के प्रसिद्ध बठेना अस्पताल लेकर गए । बठेना अस्पताल के डाक्टरों ने उनकी स्थिति को देखते हुए उन्हें उस समय के सबसे बड़े अस्पताल भिलाई इस्पात संयंत्र के सेक्टर 9 में भेजने की सलाह दी । सेक्टर 9 के अस्पताल में 6 माह तक इलाज चला उसके बाद लगभग 3 साल तक कई अस्पतालों में उनका इलाज चलता रहा । स्वामी विवेकानंद आश्रम रायपुर में भी कुछ दिनों तक उन्होंने इलाज करवाएं । अंत में कुछ सुधार होने पर गृह ग्राम कुरूद वापस आ गये ।

डॉक्टरो ने बताया कि रीड की हड्डी में समस्या आ चुकी है कमर के निचले हिस्सा का भाग अब शून्य हो गया है अब वह कभी चल नहीं पाएगा । हाथों की उंगलियां भी काम नहीं कर पाएगा तथा मुट्ठी भी बंद नहीं हो पाएंगे । शरीर 95 प्रतिशत विकलांगता में चला गया है ।

कृष्णकांत साहू बसंत साहू के छोटे भाई ने बताया कि भैया हमेशा चिंतित रहते वह बिस्तर पर ही पड़े रहते थे और दीवारों में लगे तस्वीरों को निहारते रहते थे। लगभग सन 2000 के आसपास की बात है भैया के मन में क्या आया उन्होंने अपने हाथों की उंगलियां से चित्र बनाने का प्रयास किया लेकिन उंगलियों ने साथ नहीं दिया । तब उन्होंने अपने दाएं हाथ में एक पट्टा बंधवा कर उसमें ब्रश फंसा कर कैनवास में लकीरें खींचना प्रारंभ किया । वे रंगों में ब्रश डुबो कर कांपते हाथों से रंग भरना शुरू किया । शुरुआत में एक तस्वीर बनाने में उन्हें चार से पांच दिन लग जाते थे । धीरे-धीरे उनकी कला को देखकर हम लोगों ने भी उन्हें प्रोत्साहित किया परिवार का सपोर्ट मिलता गया और भैया का मनोबल भी बढ़ता गया ।

उनकी कलाकृतियों के बारे में कला प्रेमियों और विशेषज्ञों का मानना है कि भैया की पेंटिंग सौंदर्य में बेजोड़ उदाहरण है। उनमें संवेदनशीलता और गहराई का अद्भुत मेल भी होता है ।

भैया के द्वारा बनाए गए पेंटिंग को लोगों तक पहुंचा ने के लिए हम लोगों ने 2002 ,3 ,4 में उनके द्वारा बनाए गए पेंटिंग का प्रदर्शनी लगवाए तथा रायपुर में भी उनकी पेंटिंग की प्रदर्शनी लगवाये । उसके बाद भैया बच्चों को भी पेंटिंग सिखाने लग गए ।

पेंटिंग की कला के बारे में जब पूछा गया तब बसंत साहू ने कहा कि जब कर्म समर्पण बन जाए और सीमाएं साधना तो पुरस्कार नहीं परमात्मा की कृपा मिलती है । मुझे राष्ट्रीय पुरस्कार मिलना मेरा नहीं मेरी मां की तपस्या मेरे परिवार का मेरे प्रति समर्पण और उनका विश्वास उनका सहयोग मेरा इच्छा शक्ति और मां सरस्वती की मेरे प्रति आशीर्वाद का प्रतिफल है । मैंने जीवन में सिखा कि “शरीर सीमित हो सकता है पर आत्मा की उड़ान अनंत होती है ,मेरी हर रचना उसकी उड़ान की गवाही है ।”

53 वर्षीय बसंत साहू पिछले 30 वर्षों से व्हीलचेयर के सहारे रंगों का संसार रच ने में लगे हैं । नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा है । दुर्घटना में 95% विकलांगता होने के बावजूद उन्होंने अपने आप को अकेला महसूस नहीं होने दिया उन्होंने जीवन जीने की लिए संघर्ष किया अपने आप को असहाय महसूस नहीं होने दिया । निरंतर मेहनत और समर्पण ने उनकी कला को दुनिया के ऊंचे मुकाम पर पहुंचा दिया है । जहां उन्हें भारत सरकार के द्वारा राष्ट्रपति पुरस्कारों से नवाजा गया तथा विदेशों में भी उनकी कला की प्रशंसा हो रही है ।

बसंत साहू जी एक प्रेरणा है जो दुर्घटनाग्रस्त हो जाने पर अपने आप को अकेला और नि: सहाय मानते हैं उनकी इच्छा शक्ति ने उन्हें अकल्पनीय चित्रकार बनाया है और साथ ही उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार दिलाया है । इसके लिए बसंत साहू जी के इच्छा शक्ति के साथ-साथ उनके परिवार की सहनशीलता और उनके प्रति निस्वार्थ सेवा को भी नजर अंदाज नहीं किया जा सकता । जिस तरह दुर्घटनाग्रस्त हो जाने पर उन्होंने 3 साल तक विभिन्न अस्पतालों में उनका इलाज करवाया ।साथ ही उन्हें भरोसा भी दिलाया कि इस दुनिया में आपके लिए भगवान ने बहुत कुछ सोचा है …..!

बस इन्हीं शब्दों के साथ राष्ट्रपति पुरस्कार मिलने पर बसंत साहू जी और उनके परिवार को हार्दिक बधाई और ढेर सारी शुभकामनाओं के साथ हमारा दल्ली राजहरा के संडे मेंगा स्टोरी में बस इतना ही…!





