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संजय बैस (पूर्व जनपद सदस्य) के द्वारा पूज्य पिता श्री के स्मृति में आयोजित श्रीमद् भागवत ज्ञान यज्ञ सप्ताह “गीता उपदेश” के साथ हुआ समाप्त..!

दल्ली राजहरा
गुरुवार 25 दिसंबर 2025
भोजराम साहू 9893 765541
ग्राम कुसुमकसा में पूर्व जनपद सदस्य संजय बैस एवं बैस परिवार के द्वारा अपने पूज्य पिता स्वर्गीय जयपाल सिंह बैस के प्रथम पुण्य स्मृति में श्रीमद् भागवत ज्ञान यज्ञ सप्ताह का आयोजन किया गया था ।

इस भागवत कथा के समाप्ति के अंतिम दिन बैस परिवार के द्वारा नेत्र शिविर का आयोजन किया गया । इस नेत्र जांच शिविर में 695 व्यक्तियों का नेत्र परीक्षण हुआ जिसमें 270 लोगों को चश्मा वितरण किया गया तथा 168 लोगों को ऑपरेशन के लिए 30 दिसंबर 2025 को रायपुर ले जाया जाएगा । इस नेत्र शिविर में कुसुमकसा के आसपास के लोगों ने लाभ लिया है । यह नेत्र शिविर रात्रि 8:30 तक चला । नेत्र शिविर में निशुल्क दवाई का वितरण भी किया गया । नेत्र शिविर का आयोजन गणेश विनायक अस्पताल रायपुर के सहयोग से किया गया था ।

श्रीमद् भागवत कथा के कथाकार पंडित कृष्णकांत शास्त्री कवर्धा वाले थे। कथा के अंतिम दिन लगभग 4 हजारों से अधिक की संख्या में लोगों ने कथा श्रवण किया तथा महाप्रसाद का भी आनंद लिया ।

कथा के अंतिम दिन भागवत आचार्य श्री कृष्ण कांत शास्त्री जी ने गीता उपदेश एवं तुलसी वर्ष के संबंध में बताया हुआ । उन्होंने श्रीमद् भागवत गीता के बारे में बताया कि व्यक्ति के जीवन में सबसे पुण्य का काम है श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन करना व्यक्ति का जीवन में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन बहुत बड़ी पुण्य का काम होता है ।

उन्होंने बताया कि श्रीमद् भागवत कथा भगवान का स्वरूप है तो गीता भगवान के मुखार बिंदु से निकली हुई अमर वाणी है । उन्होंने बताया कि पांडव और कौरव के बीच जुए में पांडव की हार होती है तब दुर्योधन दुशासन को द्रौपति का चीर हरण करने का आदेश देता है । भगवान श्री कृष्ण के सहयोग से द्रोपती की रक्षा होती है । इस हार के बाद पांडवों को 12 वर्ष की वनवास तथा 1 वर्ष का अज्ञातवास में जाना पड़ता है ।

अज्ञातवास उपरांत जब लौटकर वापस आते हैं तब श्री कृष्णा दुर्योधन के पास जाता है और पांडवों को राज्य का कुछ हिस्सा देने की बात करता है । दुर्योधन मना कर देता है श्री कृष्णा कहता है कि पांडव को कुछ नहीं मात्र पांच गांव ही दे दीजिए । लेकिन दुर्योधन कहता है कि जब तक युद्ध नहीं होगा 5 गांव तो क्या आप को सुई के नोक के बराबर भी जमीन नहीं दी जाएगी ।

इस तरह महाभारत युद्ध की बिगुल फूंका जाता है । अर्जुन के सारथी बने भगवान श्री कृष्णा को अर्जुन कहता है सारथी रथ को लेकर दोनों सेनाओं के बीच में ले चलो मैं देखना चाहता हूं कि मुझे किनके साथ युद्ध करना है और कौन मेरा सहयोगी है ।
एक ओर कौरव तो दूसरी ओर पांडव अपनी सेना को लेकर युद्ध के लिए तैयार खड़े हैं । अर्जुन युद्ध से विचलित हो जाता है कि मैं किनको मारूंगा कौरव पक्ष में खड़े भीष्म पितामह गुरु द्रोण , आचार्य , अश्वत्थामा को देखकर विचलित हो जाते हैं । कि मैं युद्ध नहीं करूंगा इससे अच्छा है कि हम सभी राज पाठ को छोड़कर वनवासी की तरह जिंदगी जिए ।

लेकिन भगवान श्री कृष्णा उन्हें विराट स्वरूप दिखाकर अर्जुन को समझाता है कि अर्जुन तुम्हारे मन में कैसा विचार पनप रहा है अर्जुन कहते हैं पार्थ मै किसके साथ लडू । गुरु द्रोण जिन्होंने मुझे युद्ध कला सिखाए सिखाया है वह पितामह जिनके गोदी में मैं खेल कर बड़ा हुआ हूं यह सगे संबंधी किन से मैं लडू कन्हैया मैं इनको नहीं मार सकता ।
भगवान श्री कृष्णा कहता है अर्जुन अगर यह अर्जुन इन्हें नहीं मारेगा तो और भी अर्जुन है जो इनको मारने के लिए तैयार हो जाएगा । अर्जुन यह शरीर किराए का घर है आत्मा अजर और अमर है । ना इसे अग्नि जला सकती है और ना पानी भीगा सकती है वह एक शरीर से दूसरे शरीर दूसरे शरीर तीसरे शरीर में चलाए मान है।

हमारे अंदर यह जो आत्मा है न जाने कितनी बार मां बनी पिता बने भाई बना बहन बने हम जैसे वस्त्र बदलते हैं वैसे ही आत्मा एक शरीर से दूसरा शरीर बदलता है । भगवान ने अर्जुन को दिव्या दृष्टि दिया और कहा अर्जुन देखो सब मुझ में है मैं ही धरती हूं मैं ही आकाश हूं मैं ही शत्रु हूं और मैं ही मित्र हूं ।

जितने भी क्रियाकलाप हो रहा है वह सब मेरे अंदर ही हो रहा है । शास्त्री जी ने बताया जो मनुष्य गीता पढ़ ले सुन ले दर्शन कर ले या जिनकी मृत्यु के बाद सीने में श्रीमद् गीता रख दे वह विष्णु लोक में जाता है । इसलिए सभी के घरों में गीता होनी चाहिए गीता रखने से ही कल्याण नहीं होता । इसे पढ़ कर जीवन में उतारना पड़ता है गीता में लिखा है शरीर को स्वस्थ रखना है तो प्राणायाम करना होगा मन को स्वस्थ रखना है तो मन को विचार अच्छे रखने होंगे । परोपकार की भावना रखना होगा ।
गीता पढ़ने का कोई भी निर्धारित समय नहीं होता । किसी भी समय गीता पढ़ा जा सकता है । पूर्व जन्म के पाप से गीता मुक्ति दिलाता है इसलिए इसे भागवत गीता कहते हैं ।चाहे किसी की भी पूजा करोगे अंत में भगवान विष्णु के शरण में ही जाओगे । देवताओं में श्री विष्णु शास्त्र में गीता और मंत्र में ओम से बड़ा कोई मंत्र नहीं है इन तीनों से बड़ा कोई सेवा नहीं ।भगवान कृष्ण ने अर्जुन से कहा अर्जुन लड़ना पड़ेगा और अर्जुन लड़े तथा विजय हुए ।




