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शीतल साहू (अध्यक्ष तहसील साहू संघ) के नेतृत्व में राजिम जयंती महोत्सव में शामिल हुए 115 सदस्यों का दल ।

दल्ली राजहरा
गुरुवार 08 जनवरी 2026
भोज राम साहू 9893765541
तहसील साहू संघ दल्ली राजहरा से समाज की आराध्य देवी माता राजिम जयंती के अवसर पर दल्ली राजहरा से शीतल साहू (अध्यक्ष तहसील साहू संघ दल्ली राजहरा) के नेतृत्व में 115 सदस्यों का दल कल राजिम पहुंचे थे l 

 तय समय अनुसार सभी सामाजिक सदस्यों का दल स्थानीय साहू सदन के पास एकत्र हुए l पूर्व तहसील साहू संघ अध्यक्ष लैलन साहू तोरण लाल साहू वर्तमान अध्यक्ष शीतल साहू सचिव राजेश कुमार साहू उपाध्यक्ष विमला साहू, कुंती साहू संगठन सचिव , विजय साहू संयोजक न्याय प्रकोष्ठ अंजू साहू उप संयोजिका न्याय प्रकोष्ठ एवं उमा साहू संयोजिका महिला प्रकोष्ठ के द्वारा संत शिरोमणि भक्त मां कर्मा एवं राजिम मां के नाम पर पूजा अर्चना कर बस रवाना किया गया। सभी सदस्यों ने गंगा मैया पहुंच कर पूजा अर्चना कर सुखद यात्रा की आशीर्वाद मांगी उसके बाद बस गंतव्य स्थल राजिम पहुंचे ।

 सभी ने राजीव लोचन मंदिर, कुलेश्वर महादेव मंदिर, और जगन्नाथ मंदिर राजिम माता, मां कर्मा मंदिर , तथा त्रिवेणी संगम स्थल का दर्शन किये तथा भोजन उपरांत वापस सकुशल दल्ली राजहरा पहुंचे।

राजिम में छत्तीसगढ़ प्रदेश साहू संघ के द्वारा राजिम जयंती भव्य रूप से आयोजन किया गया था । इस पावन अवसर पर विष्णु देव साय, (मुख्यमंत्री छत्तीसगढ़ शासन ) अरुण साव (उप मुख्यमंत्री ) तोखन साहू (केंद्रीय राज्य मंत्री ), ताम्रध्वज साहू (पूर्व कैबिनेट मंत्री ) एवं डॉ. निरेंद्र साहू (प्रदेश साहू संघ अध्यक्ष ) ने ध्वजारोहण कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया।

  कार्यक्रम में समाज के लोगों के द्वारा विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम के साथ सामाजिक उद्बोधन दिया गया तथा कार्यक्रम में प्रदेश स्तरीय पदाधिकारीयो के द्वारा समाज में एकता और अखंडता बनाएं रखने का आह्वान किया। 

तोरण लाल साहू ने सफल राजिम यात्रालिए शीतल  साहू एवं उनके पूरे टीम को बधाई दिया । उन्होंने कहा कि इस तरह का आयोजन सामाजिक एकता और समाज के लोगों को अपनी संस्कृति आराध्य देवी देवताओं के इतिहास को बताने का बेहतरीन माध्यम है । 

यात्रा को सफल बनाने में किशोर साहू संरक्षक न्याय प्रकोष्ठ उमाकांत साहू अध्यक्ष ट्यूबलर शेड कमलेश साहू अध्यक्ष पुराना बाजार छन्नू लाल साहू अध्यक्ष शहिद चौक श्रीमती लिली साहू अध्यक्ष कोन्ड़े पावर हाउस श्रीमती कुंती साहू अध्यक्ष रेलवे कॉलोनी श्रीमती राधा साहू कार्यकारिणी सदस्य न्याय प्रकोष्ठ चंन्देनी भाठा एवं सुरेश कुमार साहू उपाध्यक्ष चिखलाकसा का विशेष सहयोग रहा

➡️🔥🔥क्या है भक्तिन माता राजिम की कहानी 🔥🔥

 

राजिम छत्तीसगढ़ क्षेत्र का पवित्र ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक केन्द्र रहा है, इसे छत्तीसगढ़ का “प्रयाग” भी कहा जाता है, क्योंकि यहां पैरी नदी, सोंढूर नदी और महानदी तीन नदी का संगम है। 

राजिम में कई प्राचीन मंदिर हैं, जिनमें से राजीव लोचन मंदिर, कुलेश्वर महादेव मंदिर, और जगन्नाथ मंदिर प्रमुख हैं यह अपने पुरातन इतिहास की गौरवमयी परम्परा को आत्मसात किये। यह भगवान विष्णु की नगरी है। छत्तीसगढ़ के लाखों नर-नारियों को माघ पूर्णिमा से शिव रात्रि तक सांस्कृतिक एकता के पवित्र बंधन में आबद्ध किये रहती है। यहाँ पूर्वोक्त अवधि पर्यन्त विशाल मेला का आयोजन किया जाता है।

अपने आप में उत्तर तथा दक्षिण भारत की संस्कृति को संजोये राजिम संगम पुण्य को बांटती है और आज भी हर छत्तीसगढ़िया 

कहाँ जाबो अबड़ दूर हे गंगा। 

राजिम जा कर नहाना 

कहकर अपने सभी पवित्र धार्मिक तथा मोक्ष कार्य इसी त्रिवेणी संगम (महानदी, सोंदूर एवं पैरी नदी) में पूर्ण करता है। राजिम की इस सांस्कृतिक ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक उपलब्धि के पीछे महान नारी का आत्म मार्ग अनन्य सेवा भाव श्रम साधना का फल जुड़ा हुआ है, भले ही इसे आज विस्मृत कर दिया गया हो अथवा जाति विशेष का तर्तव्यमान प्रबुद्ध वर्ग निश्चित हो गये हो। पर जिस नारी ने निःस्वार्थ भाव से अपना आराध्य का साथ मांगा था और अपना प्राणोत्सर्ग भी उन्हीं के श्री चरणों में किया था। आज भी अपना प्रिय भगवान के सामने उस सती की समाधि विद्यमान है।

हमें इस बात का गौरव है, भक्त माता परम श्रद्धेय राजिम का असीम स्नेह हमारे वंश को प्राप्त हुआ है। छत्तीसगढ़ की चित्रोपल्ला गंगा (महानदी) की गोद में जन्म लेने वाली भक्त माता राजिम तैलिक वंश शिरोमणि है।
 कहा जाता है कि राजिम नामक एक तैलिन महिला के नाम पर इस स्थान का नाम पड़ा। एक समय जब राजिम तैलिन नामक महिला तेल बेचने जा रही थी तो रास्ते में पड़े पत्थर से ठोकर खाकर गिर पड़ी और सारा तेल बर्तन से गिर कर बहने लगा। बहु राजिम बहुत दुखी हुई, सास एवं पति द्वारा दिए जाने वाली संभावित  दण्ड से भयभीत होकर रोने लगी । बहुत देर तक रोते रहने एवं हृदय की व्यथा कुछ कम होने पर बोझिल मन से घर जाने के लिये खाली पात्र को जब वह उठाने लगी तो उसे यह देख हर्ष मिश्रित आश्चर्य हुआ कि तेल का बर्तन तेल से भरा मिला। 

वह दिन भर घूम घूम कर तेल बेचती रही पर उस पात्र का खाली होना तो दूर रहा एक बूंद भी कम नहीं हुआ। आश्चर्य, चमत्कार से खुशी और भयभीत होकर माता राजिम के पति को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि पात्र तेल से भरा हुआ है और अन्य दिनों की अपेक्षा वह तेल बिक्री का अधिक दाम लेकर आई है । पति एवं सास सोचने लगे कि इतना धन कैसे आया ?
किन्तु माता राजिम के मुख से घटना का विवरण सुनकर अचरज का ठिकाना न रहा। कौतुहल भी जागा प्रमाण के लिए दूसरे दिन सास-बहू खाली पात्र ले गये। निश्चित स्थान पर जाकर माता राजिम ने उपरोक्त स्थल दिखाया वहां पर सास के अपने खाली पात्र को रख दिया। पूर्व दिन की भांति वह भी तेल से लबालब भर गया । इतना ही नहीं उस दिन ग्राहकों को तेल बेचने के बाद भी वह पात्र पूर्व की भांति एक बूंद भी रिक्त नहीं हुआ। संध्या घर आकर उसने पुत्र को सूचना दी। योजना बन गई और संकल्प जागा। प्रेरणा मिला, उस अक्षय फल दाता प्रश्तर खण्ड को खोदकर निकाला गया। आश्चर्य साधारण शिला खण्ड के स्थान पर चतुर्भुजी भगवान विष्णु का श्यामवर्णी श्री विग्रह पाकर उनके आनन्द का ठिकाना न रहा। वस्तुतः प्रतिमा औधी पड़ी हुई थी इसलिए ऊपरी भाग से केवल प्रश्तर खण्ड ही प्रतीत हो रहा था। उस मूर्ति को घर लाकर श्रद्धापूर्वक नित्य प्रति उसकी पूजा की जाने लगी। 

आराध्य देव, प्रथम पूजनीय भगवान विष्णु उसी कमरे में स्थापित किए गये जहाँ तेल पेरने का कार्य संचालित होता था तथा व्यवसाय प्रारंभ करने से पहले प्रतिमा में प्रतिदिन तेल अर्पित करती थी।
इन्हीं दिनों राजा जगत पाल का राज्य दक्षिण कौशल में था। उन्हें स्वप्न में आदेश हुआ कि लोक कल्याण के लिए एक मंदिर का निर्माण करें तथा प्रतिमा स्थापित करें। स्वप्न के आदेशानुसार राजा जगतपाल ने मंदिर का निर्माण किया किन्तु प्राण प्रतिष्ठा के लिए सिद्ध मूर्ति प्राप्त नहीं कर सका। अब तक राजिम तैलिन के जीवन घटी चमत्कार की कहानी सर्वत्र फैल चुकी थी ।

 उसके मन में इसी मूर्ति को नवनिर्मित मंदिर में स्थापित करने का संकल्प जागा। अतः राजिम तेलिन से मूर्ति की याचना की। वहीं मुँह माँगा ईनाम देने का प्रलोभन दिया। दूसरी बात राजाज्ञा थी, जिसे तेलिन उल्लंघन नहीं कर सकती थी, तीसरी  श्री विग्रह के प्रताप से अब तक वह काफी धनाढ्य हो चुके थे। चौथी बात यह कि स्वयं राजिम तेलिन चाहती थी कि उसके इस आराध्य के अनेक भक्त बन जावें । पाँचवी बात यह कि एक सुदृढ़ हाथों में सौंपकर वह आश्वस्त होना चाहती थी तथा अंतिम बात यह भी कि उसकी भक्ति समर्पण की थी इस तेलिन कुल गौरव ने राजा से चौबीस घंटे की मोहलत माँगी। तब कहा जाता है कि रात्रि में ईश्वर से आदेश प्राप्त किया था। उसी रात्रि को भगवान ने उसे दर्शन देकर वरदान माँगने का आदेश दिया था तभी राजिम तेलीन माँ ने एक ही वरदान मांगा था कि अब से भगवान तो राजा के हाथ में सुरक्षित हो जायेगा उन्हें यह वरदान दिया जाये कि भगवान के नाम के आगे उनका नाम चलेगा। राजा की यह वाणी गुंजित हुई थी और इस शर्त पर राजिम तेलीन से वह मूर्ति राजा जगतपाल को सौंप दी थी उस दिन से भगवान राजीव लोचन अब राजिम लोचन के नाम से पुकारे जाने लगे।

Bhojram Sahu

प्रधान संपादक "हमारा दल्ली राजहरा: एक निष्पक्ष समाचार चैनल"

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