दल्ली राजहरा मंगलवार 24 अप्रैल 2026 भोजराम साहू 9893 765541 छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा/छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ दल्ली राजहरा ने जनगणना के माध्यम से सरकार पर छत्तीसगढ़ की संस्कृति और पहचान को धूमिल करने की साजिश करने का आरोप लगाया है,भारत जैसे बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक देश में भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि पहचान, इतिहास और आत्मसम्मान का प्रतीक होती है। ऐसे में यदि राष्ट्रीय जनगणना में किसी समृद्ध और व्यापक रूप से बोली जाने वाली भाषा को स्थान नहीं दिया जाता, तो यह केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक उपेक्षा का भी संकेत है। छत्तीसगढ़ी भाषा के साथ यही स्थिति बार-बार देखने को मिलती रही है। छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष श्री जनक लाल ठाकुर कहा कि छत्तीसगढ़ की मातृभाषा छत्तीसगढ़ी न केवल करोड़ों लोगों की रोज़मर्रा की भाषा है, बल्कि यह लोकगीतों, परंपराओं, नाट्यकला और जनजीवन की आत्मा है। इसके बावजूद, इसे अक्सर “हिंदी की बोली” कहकर राष्ट्रीय स्तर पर नजरअंदाज कर दिया जाता है। यह दृष्टिकोण न केवल भाषाई विविधता को कमतर आंकता है, बल्कि छत्तीसगढ़ के लोगों की सांस्कृतिक पहचान को भी कमजोर करता है। पहले संसाधनों को हमसे छीना और अब पहचान छीनने को कोशिश छत्तीसगढ़ के लोगों के लिए कुछ भी नहीं व्यवसाय और यहां खनिज संपदा को लूटा जा रहा है बड़े पैमाने पर यहां का व्यवसाय आयातित लोगों के पास है छत्तीसगढ़ के स्थानीय जनता से अपील करते है कि इसे गंभीरता के साथ चिंतन करे क्योंकि सरकार धीरे धीरे आपके हाथों से जल जंगल जमीन, रोजगार के साथ अब आपकी पहचान छीनने का प्रयास कर रही है।छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ के अध्यक्ष सोमनाथ उइके ने अपना विचार व्यक्त किया जनगणना का उद्देश्य देश की वास्तविक सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक तस्वीर प्रस्तुत करना होता है। यदि इसमें भाषाओं का सही और स्वतंत्र रूप से उल्लेख नहीं किया जाएगा, तो नीतियों का निर्माण भी अधूरा और भ्रामक होगा। छत्तीसगढ़ी भाषा को अलग से दर्ज न करने का सीधा असर शिक्षा, प्रशासनिक योजनाओं और सांस्कृतिक संरक्षण पर पड़ता है।आज जब कई क्षेत्रीय भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग जोर पकड़ रही है, तब छत्तीसगढ़ी को नजरअंदाज करना न्यायसंगत नहीं है। यह भाषा समृद्ध साहित्य, लोककथाओं और ऐतिहासिक परंपराओं से भरी हुई है। इसे उचित मान्यता देना न केवल छत्तीसगढ़ के लोगों का अधिकार है, बल्कि यह देश की भाषाई विविधता को सम्मान देने का भी प्रश्न है।इस उपेक्षा के खिलाफ आवाज उठाना समय की मांग है। सरकार को चाहिए कि वह जनगणना में छत्तीसगढ़ी भाषा को स्वतंत्र पहचान दे और इसे संवैधानिक मान्यता दिलाने की दिशा में ठोस कदम उठाए। यदि ऐसा नहीं किया गया, तो यह केवल एक भाषा का नहीं, बल्कि एक पूरे समाज के अस्तित्व और सम्मान का सवाल बन जाएगा। छत्तीसगढ़ी भाषा को जनगणना में स्थान न देना एक गंभीर मुद्दा है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।मोर्चा के मीडिया प्रभारी टोमन निर्मलकर ने इसे जनगणना में छत्तीसगढ़ी भाषा को शामिल न करना केवल आंकड़ों का सवाल नहीं, बल्कि पहचान, अधिकार और सम्मान का सवाल है। हम मांग करते हैं कि आगामी जनगणना में छत्तीसगढ़ी भाषा को स्पष्ट रूप से शामिल किया जाए और इसे मान्यता देकर प्रदेश की अस्मिता का सम्मान किया जाए। यदि इस दिशा में जल्द सुधार नहीं किया गया, तो व्यापक जन आंदोलन के लिए बाध्य होना पड़ेगा।Spread the lovePost navigationटी ज्योति (पार्षद ) का सहारणीय कार्य, वार्ड वासियों को मिलेगी ओपन जिम की सुविधा ।