दल्ली राजहराशनिवार 16 मई 2026भोजराम साहू 9893 765541 छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा और छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ ने केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि राज्यों के चुनावों को प्रभावित न होने देने के लिए पेट्रोल-डीजल का जमकर उपयोग किया गया और अब इसका खामियाजा आम जनता भुगत रही है।मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व विधायक जनक लाल ठाकुर ने कहा कि पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और असम जैसे अहम राज्यों के चुनावों के दौरान ईरान-अमेरिका तनाव और वैश्विक युद्ध जैसे हालात के बावजूद बड़े पैमाने पर ईंधन चुनावी रैलियों, हेलीकॉप्टर, काफिलों और प्रचार अभियानों में खर्च किया गया। उस समय सरकार और प्रशासन ने जनता को किसी संकट का अहसास नहीं होने दिया, लेकिन चुनाव खत्म होते ही कई इलाकों में पेट्रोल-डीजल की आपूर्ति चरमरा गई।ठाकुर ने कहा कि चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों ने ईंधन को खुलकर खर्च किया और अब लंबी कतारें, बढ़ते दाम और परिवहन संकट ने किसानों, छोटे व्यापारियों और आम नागरिकों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की आपूर्ति पहले से दबाव में थी। ऐसे में अगर ईंधन का इस्तेमाल जरूरी जरूरतों की जगह शक्ति प्रदर्शन में हो, तो उसका बोझ अंततः जनता पर ही पड़ता है। इसका असर मालभाड़े से लेकर खेती-किसानी और रोजमर्रा की चीजों के दामों पर दिख रहा है।उन्होंने चिंता जताई कि एक तरफ पिछले साल से खाद-बीज का संकट झेल रहे अन्नदाता अब ईंधन संकट से जूझ रहे हैं। खेती का मौसम सिर पर है, लेकिन खेतों में काम कैसे होगा यह बड़ा सवाल बन गया है। ठाकुर ने किसानों से अपील की कि वे इस बार खेती के विकल्पों और तकनीकों पर गंभीरता से विचार करें। उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि प्रधानमंत्री ने तो बिना तेल का खाना खाने, यानी बासी चटनी या छत्तीसगढ़ी में कहें तो डबका खाने का आश्वासन दे ही दिया है।छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ के अध्यक्ष सोमनाथ उइके ने सवाल उठाया कि क्या चुनावी राजनीति के लिए देश की ऊर्जा सुरक्षा और जनता की जरूरतों को नजरअंदाज कर दिया गया। यदि ईंधन संकट की आशंका थी तो सरकार ने पहले से वैकल्पिक व्यवस्था और पारदर्शी जानकारी क्यों नहीं दी। उन्होंने कहा कि हर संकट का भार अंत में आम आदमी पर ही डाला जाता है। चुनाव खत्म होते ही मुख्यमंत्री कुर्सी संभालते हैं और जनता के सामने संकट रख दिया जाता है।संघ के उपाध्यक्ष सुरेन्द्र साहू ने बताया कि दल्ली राजहरा के कई माइंस क्षेत्रों में ‘नो वर्क नो पेमेंट’ के नोटिस चिपका दिए गए हैं। ऐसे में मजदूरों की स्थिति बेहद खराब हो गई है। पेट्रोल-डीजल की कमी शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी है, लेकिन हर बार इसका बोझ मेहनतकश मजदूर और छोटे दुकानदारों पर डाला जा रहा है। पहले गैस की किल्लत से होटल व्यवसायी परेशान थे, अब पेट्रोल-डीजल न मिलने से खाद्य संकट की आशंका बढ़ रही है।साहू ने जिला प्रशासन के उस दावे पर भी सवाल उठाया जिसमें कहा गया है कि ईंधन पर्याप्त मात्रा में है और अफवाहों से बचें। उन्होंने पूछा कि अगर भंडार पर्याप्त है तो पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें क्यों हैं और तेल क्यों नहीं मिल रहा। यदि जमाखोरी हो रही है तो उस पर तत्काल कार्रवाई होनी चाहिए। संगठन ने सरकार से मांग की है कि समस्या का समाधान तुरंत किया जाए, अन्यथा सड़क पर उतरकर उग्र आंदोलन किया जाएगा।Spread the lovePost navigationरेलवे इंस्टिट्यूट दल्ली राजहरा में 340 बच्चों को मिल रहा निशुल्क समर कैंप का लाभ, बढ़ रहा बच्चों का उत्साह ।