दल्ली राजहरारविवार 31मई 2026भोजराम साहू 9893 765541 “ये शब्द नहीं, अस्मिता का सवाल है” – जनकलाल ठाकुर | “आदिवासी प्रकृति के पुरखा हैं” – “छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ” देश के आदिवासियों को “वनवासी” कहे जाने पर छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा और छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ ने तीखा विरोध जताया है। मोर्चा ने इसे आदिवासी समाज की ऐतिहासिक पहचान, संस्कृति और अधिकारों पर सीधा हमला करार दिया।“आदिवासी मूल निवासी हैं, वनवासी नहीं” मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष एवं पूर्व विधायक जनक लाल ठाकुर ने कहा, आदिवासी शब्द उन समुदायों की पहचान है जो सदियों से इस देश के मूल निवासी हैं। इन्होंने ही प्रकृति का संरक्षण किया है। आदिवासी प्रकृति को अपना पुरखा मानते हैं। उनकी पहचान को वनवासी कहकर संकुचित करना गलत है।`ठाकुर ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, बीजेपी सरकार बहुमत के दम पर इतिहास बदलने पर तुली है। आज आदिवासियों को वनवासी कह रहे हैं, कल किसी और समुदाय की पहचान बदल देंगे। डबल इंजन सरकार देश को मुफ्त लॉलीपॉप देकर जनता को मांगने वाला बना रही है।`संविधान में आदिवासी, तो वनवासी क्यों? छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ के अध्यक्ष सोमनाथ उइके ने कहा, संविधान और सरकारी दस्तावेजों में आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति कहा गया है। ऐसे में उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान का सम्मान होना चाहिए। किसी समुदाय पर उसकी इच्छा के विरुद्ध पहचान थोपना लोकतंत्र के खिलाफ है। आदिवासियों को वनवासी कहना बर्दाश्त नहीं।`“महामहिम राष्ट्रपति जी आदिवासी, फिर भी संवेदनशीलता नहीं” CMSS के महामंत्री रामचरण नेताम ने सवाल उठाया, देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आदिवासी समाज का प्रतिनिधित्व है, फिर भी पहचान के मुद्दे पर सरकार में संवेदनशीलता नहीं दिखती। आदिवासी समाज अपनी अस्मिता और अधिकारों को लेकर सजग है। किसी भी वैचारिक हस्तक्षेप का लोकतांत्रिक विरोध होगा।`उपाध्यक्ष सुरेन्द्र साहू ने कहा, देश की विविधता तभी बचेगी जब हर समुदाय की ऐतिहासिक पहचान का सम्मान होगा।`माफी मांगो, शब्द वापस लो मोर्चा के पदाधिकारी राजाराम धनकर, नासिक यादव, ललन साहू, नम्मू यादव ने एक स्वर में आदिवासियों को वनवासी कहे जाने का विरोध किया और सरकार से माफी मांगकर वनवासी शब्द वापस लेने की मांग की।Spread the lovePost navigation“राजहरा उजड़ रहा है..!” – छत्तीसगढ़ रत्न डॉ. शिरोमणि माथुर की कलम से लौह नगरी की दर्दभरी दास्तान..! “नव आगमन” का विशेषांक डॉ. शिरोमणी माथुर को समर्पित, 2 जून को विमोचन व सम्मान समारोह ।