दल्ली राजहरारविवार 31मई 2026भोजराम साहू 9893 765541 “देश को लोहा दिया, बदले में मिला उजाड़”: डॉ. शिरोमणि माथुर ने उठाई राजहरा बचाने की पुकारभिलाई स्टील प्लांट की जीवनरेखा दल्ली राजहरा आज खुद वेंटिलेटर पर: खदानें सूखीं, झरने मिटे, दल्ली राजहरा उजड़ रहा है – यह सिर्फ एक शीर्षक नहीं, बल्कि उस लौह नगरी की चीख है जिसने भिलाई इस्पात संयंत्र को 60 साल तक खून-पसीना देकर सींचा। राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सम्मान प्राप्त लेखिका, छत्तीसगढ़ रत्न डॉ. शिरोमणि माथुर ने अपनी मार्मिक कलम से राजहरा के दर्द को शब्द दिए हैं। देश को संवारा, खुद उजड़ गयाडॉ. माथुर लिखती हैं कि नेहरू युग के औद्योगिक स्वप्न में भिलाई स्टील प्लांट की नींव रखी गई तो उसकी नसों में खून बनकर दौड़ा दल्ली राजहरा का लौह अयस्क। कोकान, राजहरा, कोड़ेकसा, झरन दल्ली, महामाया, आरी डोंगरी, दुलकी – इन खदानों ने BSP को जिंदा रखा। राजहरा जलाशय, बोइरडीह, हितकसा, तांदुला ने पानी पिलाया।बदले में राजहरा को क्या मिला ? धूल, धुआं, सिल्टिंग, उजड़े जंगल, जहरीला पानी और खंडहर होते क्वार्टर।प्रकृति ने संवारा, नीति ने उजाड़ा`झरन दल्ली` नाम का शहर आज अपने झरनों को तरस रहा है। महामाया पहाड़ी पर माता के चरणों से निकलने वाले त्रिवेणी स्वरूप तीन झरने – जिनका पानी आज भी अलग-अलग स्वाद का है – सूखने की कगार पर हैं। सागौन-साजा के जंगल, यूरेनियम तक की खदानें, रंग-बिरंगे पत्थर – सब कुछ था राजहरा के पास।आज डैम मिट्टी से पट चुके हैं। महामाया मार्ग धूल के गुबार से ढंक जाता है। झरने खत्म हो रहे हैं खेती बर्बाद हो रही है , सांस लेना मुश्किल हो रहा है। गंगा-जमुनी तहजीब आज भी जिंदाडॉ. माथुर याद दिलाती हैं कि 1984 के सिख दंगे हों या 1992 का तनाव – राजहरा कभी नहीं जला। यहां मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारा-चर्च-बौद्ध विहार को मानने वाले कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं। देश के कोने-कोने से आए लोग यहां भाई बनकर रहते हैं। यही `अपनापन` राजहरा की असली पहचान है। करोड़ों की रॉयल्टी, फिर भी बदहालसबसे बड़ा दर्द यही है – करोड़ों की खनिज रॉयल्टी देने वाला राजहरा आज शिक्षा-स्वास्थ्य-रोजगार के लिए तरस रहा है। कारण साफ है सरकार राजहरा से रॉयल्टी तो ले रही है लेकिन रॉयल्टी का राशि राजहरा के विकास के बजाय अन्य क्षेत्र में खर्च नहीं कर रही है।क्या-क्या उजड़ गया:1. अस्पताल: BSP अस्पताल में स्टॉप की कमी के कारण गंभीर मरीज सीधे भिलाई भेजे जाते हैं।2. शिक्षा: एकमात्र शासकीय नेमीचंद जैन कॉलेज बदहाल। तकनीकी कॉलेज का नामोनिशान नहीं। शहर के कई पुराने स्कूल बंद हो चुके हैं ।3. टाउनशिप: कोण्डे, पावरहाउस, पंडर दल्ली, 256 क्षेत्र के सैकड़ों क्वार्टर खंडहर। नई भर्ती नहीं, इसलिए बसाहट नहीं।4. खेल: जिस राजहरा ने देश को खिलाड़ी दिए, वहां खेल मैदान वीरान।5. युवा: रोजगार नहीं तो पलायन। नई पीढ़ी नगर छोड़ रही है। सरकार नगर में रोजगार उपलब्ध कराने के लिए के लिए नाकामयाब साबित हुआ । रोजगार की दिशा में प्रयास ही नहीं किया गया जबकि संभावनाएं बहुत है। पर्यटन बन सकता है संजीवनीडॉ. माथुर का मानना है कि महामाया मंदिर, त्रिवेणी झरने, खदानें, पहाड़ियां – ये सब मिलकर राजहरा को छत्तीसगढ़ का टॉप टूरिस्ट डेस्टिनेशन बना सकते हैं। बस चाहिए सरकार की इच्छाशक्ति।डौंडी ब्लॉक की अजीब विडंबनासेवानिवृत्त BSP-रेलवे अधिकारी यहां बसना चाहते हैं, व्यापार करना चाहते हैं, पर सामान्य वर्ग के लिए भूमि खरीद पर रोक है। नतीजा – निवेश रुका, विकास रुका।डॉ. माथुर के 7 सूत्रीय सुझाव: राजहरा कैसे बचेगा?1. BSP अस्पताल का बड़े शहरों के अस्पतालों की तरफ उन्नयन हो ।2. खनिज रॉयल्टी का 33% स्थानीय विकास पर सरकार खर्च करें ।3. इंजीनियरिंग-मेडिकल कॉलेज की स्थापना शहर में हो।4. खेल स्टेडियम और रोजगार मेले का आयोजन हो।5. महामाया सर्किट को टूरिज्म मैप पर लाना होगा ।6. झरनों का पुनर्जीवन और पर्यावरण संरक्षण के दिशा में प्रयास हो ।7. भूमि नीति में सुधार – सेवानिवृत्त कर्मियों को बसने दें । “राजहरा एक भावना है”डॉ. शिरोमणि माथुर अंत में लिखती हैं – `राजहरा केवल नगर नहीं, एक भावना है। यहां की मिट्टी, पानी, अपनापन और गंगा-जमुनी संस्कृति लोगों के दिलों में बसती है। यहां पूरा भारत बसता है।`इक बार जो राजहरा में आगया वह यहीं का हो जाता है । `जरूरत है कि शासन, BSP प्रबंधन और समाज मिलकर राजनीति से ऊपर उठकर राजहरा को बचाएं, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस पावन धरा के गौरव को महसूस कर सकें।`✍️ छत्तीसगढ़ रत्न डॉ. शिरोमणि माथुर_राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सम्मान प्राप्त लेखिका, दल्ली राजहरा_ Spread the lovePost navigationरेलवे इंस्टिट्यूट दल्ली राजहरा का “समर कैंप सीजन- 4 संपन्न” 350 से अधिक बच्चों को मिली खेल से लेकर विभिन्न जानकारी । “आदिवासी को वनवासी कहना पहचान पर हमला”: छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा का तीखा विरोध ।