दल्ली राजहराशनिवार 06 जून 2026भोजराम साहू 9893 765541 विश्व पर्यावरण दिवस पर ग्रामीणों ने पारंपरिक ज्ञान से बनाया “बीज बैंक” । “सियाराम वट्टी बोले – `अब वोट नहीं, वोट के पेड़ लगेंगे” कभी सड़क के लिए चुनाव बहिष्कार से चर्चित रहा मुड़पार गांव अब `जंगल बचाओ आंदोलन` की नई पहचान बन गया है। विश्व पर्यावरण दिवस पर ग्राम सभा ने सामुदायिक श्रमदान से `कम्युनिटी नर्सरी` तैयार की। खास बात ये कि ये काम 3 साल से लगातार चल रहा है, वो भी बिना एक रुपये सरकारी अनुदान के।“बीज जंगल के, मेहनत गांव की”ग्राम सभा ने स्थानीय जंगलों से बीज इकट्ठा कर नर्सरी बनाई। महिला-पुरुष मिलकर सीड बॉल बना रहे हैं और `ठेंगा पाली` जैसी रूढ़ीगत व्यवस्था से जंगल की रखवाली कर रहे हैं। पूरा काम पारंपरिक ज्ञान से हो रहा है।“9 अगस्त 2023 ने बदली तस्वीर” CFR प्रबंधन समिति अध्यक्ष सियाराम वट्टी ने बताया, `विश्व आदिवासी दिवस 2023 को हमें सामुदायिक वन संसाधन अधिकार मिला। उसी दिन तय किया कि अब जंगल हम खुद बचाएंगे। न सरकार का पैसा लेंगे, न बाहर की मदद। हमारे बाप-दादा ने जंगल बचाया, अब हमारी बारी है।`“वोट नहीं, पेड़ की बात” सचिव मोहनलाल सलाम ने कहा, `पहले सड़क नहीं तो वोट नहीं कहते थे। अब कहते हैं – जंगल नहीं तो जीवन नहीं। हर घर से एक सदस्य श्रमदान करता है। बीज लाना, नर्सरी बनाना, पेड़ों की रखवाली – सब गांव वाले करते हैं।` “पूरे प्रदेश के लिए मॉडल” कार्यक्रम में सहयोगी संस्था `खोज एवं जनजाति समिति` के कार्यकर्ता भी मौजूद रहे। मुड़पार का ये मॉडल बताता है कि वन अधिकार कानून को जमीन पर कैसे उतारा जाता है। बिना सरकारी पैसा, बिना ठेकेदार – सिर्फ जनभागीदारी से जंगल का पुनर्जीवन हो रहा है।–Spread the lovePost navigationमाइनिंग कंपनी बनी हरियाली की ब्रांड एंबेसडर : निको गिधाली ने 200 पौधों से किया ग्रीन मिशन-2026 का आगाज…! कुसुमकसा मंडल अध्यक्ष योगेंद्र सिन्हा ने विभिन्न विकास कार्यों के लिए प्रभारी मंत्री से मांगे 30 लाख ।