दल्ली राजहरा
गुरुवार 25 जून 2026
भोजराम साहू 9893 765541
योग दिवस के अवसर पर  काव्य गोष्ठी का आयोजन…!
हस्ताक्षर साहित्य समिति दल्लीराजहरा द्वारा योग दिवस के अवसर पर निषाद समाजिक भवन में दिनाँक 23 .06.26 को काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया । योग जीवन को स्वस्थ एवं तंदुरुस्त रखने में बहुत सहायक है। समिति दल्लीराजहरा के कवियों द्वारा काव्य पाठ कर एक संदेश जन मानस को देने का प्रयास किया गया । जन जागरूकता सबकी जरूरत और जिम्मेदारी है । नवोदित कलमकार दीपक मंडल नये सदस्य के रूप में प्रकृति से जोड़कर कविता पाठ किया । आद. वरि. साहित्यकारों में श्री शमीम अहमद सिद्दिकी, गोविंद कुट्टी पाणिकर जी , अमित सिन्हा जी, घनश्याम पारकर एवं समिति के अध्यक्ष संतोष ठाकुर “सरल”‘ ने भी योग पर कविता पाठ किया ।
संतोष कुमार ठाकुर ने  विश्व योग दिवस के संबंध में बेहतरीन गजल पढ़ा

  सांस लेने ,छोड़ने में योग हो जाए ,
शांत चित संयम रखें प्रयोग हो जाए ।
आज विश्व मना रहा है योग, 
दिन एक हो  ,
सब करें मिल साथ में सहयोग हो जाए । ।

 

 शमीम अहमद सिद्दीकी ने वर्तमान स्थिति में मनुष्यों की अपने आप में मस्त हो जाने और सहानुभूति दिखने में हो रही कंजूसी को बड़े ही अनोखे अंदाज में प्रस्तुत की । उन्होंने अपने मुक्तक में कहा कि

कोई बहारों से बात करता है,
 कोई नजारों से बात करता है !
 मौन हो गई मानवता जब से,
 कोई दीवारों से बात करता है !!

 

अमित कुमार सिन्हा ने गांव से शहर रोजगार के तलाश में चले आने के बाद प्रेमिका की विरह को अपनी कविता के माध्यम से बताया उन्होंने कहा कि आज भी गांव की वह सुनी गलियां आपके इंतजार कर रही है, कभी भी किसी तरह बहाने बनाकर मिलने आ जाया करो ।

दूर चाहे रहो बात करते रहो,
अपनी यादों से घर को ना भुलाया करो!
गांव की वह गलियां राह ताकती तेरी,
कर बहाना कोई मिलने आया करो !!
गोविंद कुट्टी पाणिकर ने गजल गाया उन्होंने आदमी के द्वारा एक-एक पल धन कमाने में गुजारने के बाद अपनी गजल में बताया कि आदमी जीवन के पथ पर जब से खड़ा होता है एक-एक पैसा कमाने के लिए अपना समय बर्बाद कर देता है जीवन को अच्छी तरह से सुख मय बनाने के लिए रात दिन एक कर देता है जबकि उनको मालूम है कि इस दुनिया में खाली हाथ आया है और खाली हाथ ही जाना है सब इस धरा पर ही रह जाना है ।उन्होंने बताया कि

 दुख में भी सुख की,
 आरजू करता है आदमी ।
जीने की धुन में ,
रोज ही मरता है आदमी ।
जाना है खाली हाथ ही,
 जब इस जहां से ।
दौलत से अपनी कोठी,
 क्यों भरता है आदमी ..?
अंत में वरिष्ठ कवि घनश्याम पारकर ने छत्तीसगढ़ी में अपनी कविता पढ़ी उन्होंने बताया कि गांव हो या शहर सभी तरफ के व्यक्ति पान मसाला जैसे पाउच और गुटका आदि के दीवाने हो गए हैं उसी को लेकर एक बेहतरीन कविता उन्होंने छत्तीसगढ़ी भाषा में पढ़ा ।

वह रे पान मसाला गुटखा,
सब ला देवत हस तैहर झटका। 
गांव अउ शहर म एहा छागे ,
 टूरी टूरा मन सब एमा मोहागे ।।
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Bhojram Sahu

By Bhojram Sahu

प्रधान संपादक "हमारा दल्ली राजहरा: एक निष्पक्ष समाचार चैनल"

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