दल्ली राजहरा रविवार 08 नवंबर 2026 भोजराम साहू 9893 765541https://hamaradallirajhara.in/wp-content/uploads/2026/11/VID-20261108-WA0023.mp4दीपावली के बाद दल्ली राजहरा में गौरी-गौरा महोत्सव का रंग, कहीं 50 साल तो कहीं 60 साल से चल रही परंपरा “गौरा जागे मोर गौरी जागे, एक पत्री रइनी बइनी…” – इन पारंपरिक गीतों की गूंज से इन दिनों पूरी लौह नगरी दल्ली राजहरा गूंज रही है। दीपावली के बाद शुरू हुआ पांच दिवसीय गौरी-गौरा उत्सव अब अपने चरम पर है।दल्ली राजहरा को यूं ही लघु भारत नहीं कहा जाता। यहां हर धर्म, हर जाति, हर प्रदेश के लोग रहते हैं। खदान में काम की तलाश में आए छत्तीसगढ़ी परिवार अपनी रोजी-रोटी के साथ-साथ अपने पुरखों की संस्कृति और परंपरा भी साथ लेकर आए थे। वही परंपरा आज दल्ली राजहरा की पहचान बन गई है।कभी यह उत्सव सिर्फ गोड़ समाज की परंपरा हुआ करता था। आज छत्तीसगढ़िया समाज के साथ-साथ हर समाज के लोग इसे पूरे पारंपरिक अंदाज में मनाते हैं। यही दल्ली राजहरा की सामाजिक समरसता है। शहर में कहां-कहां हो रहा है आयोजन?वार्ड 2, रामनगर चौक: सबसे पुराना, विगत 60 वर्षों से लगातार आयोजन हो रहा है। जेडी ऑफिस के पास:लगभग 50 वर्षों से पांच दिवसीय उत्सव मनाया जा रहा है। लिटिल बर्ड स्कूल / बीएसपी स्कूल क्रमांक 2 के पास: विगत 15 वर्षों से आयोजन हो रहा है। इसके अलावा अन्य कई जगहों पर आयोजन हो रहा है ।रामनगर चौक: जहां से शुरू हुई परंपरारामनगर चौक में इस परंपरा की शुरुआत स्वर्गीय उजियार बैगा और स्वर्गीय गणेश राम निर्मलकर ने की थी। उस समय न बिजली थी, न आज जैसी सुविधा। मिट्टी तेल के गैस से रोशनी की जाती थी। हर साल मिट्टी से गौरा चंवरा बनाया जाता था, क्योंकि बरसात में वह बह जाता था।आज भी दादा-दादी, नाना-नानी की शुरू की गई उस परंपरा को रामनगर की युवा पीढ़ी उसी अंदाज में निभा रही है। इसमें बुजुर्गों और महिलाओं का पूरा योगदान है।यहां द्वादशी के दिन छोटे-छोटे बच्चों द्वारा मुसर (धान से चावल निकालने का पौराणिक औजार) से अंडे फोड़ने की परंपरा से उत्सव की शुरुआत होती है। इसके बाद मोहल्ले की माताएं गौरी-गौरा का श्रृंगार गीत और गौरा जगाने का गीत गाती हैं। यह क्रम द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी तक चलता है।दीपावली की रात महालक्ष्मी पूजा के बाद युवाओं द्वारा मिट्टी से भगवान शिव और माता पार्वती की मूर्ति बनाई जाती है। जिसमें भगवान शिव नंदी पर और माता पार्वती कछुआ पर सवार होती हैं। दोनों मूर्तियों को लकड़ी के पाटा पर चंदेनी गोंदा फूल, धान की बाली, मेमरी, सीलहोटी आदि से सजाकर कलश के साथ पूरे मोहल्ले में घुमाया जाता है। जगह-जगह लोग रोककर बड़े श्रद्धा भाव से पूजा-अर्चना करते हैं। अंत में राजहरा बाबा तालाब में विसर्जन किया जाता है।लिटिल बर्ड स्कूल के पास: महिलाओं के हाथ में कमान । यहां 15 वर्ष पूर्व स्व. सुखदेव साहू (फुगा वाला), शुकदेव यादव, रूपु निषाद, राधा यादव, पूनिया सेन, नीरा साहू, योगेश झा, पुष्पा साहू, छन्नू सेन, शालिक राम, मांझनु कोतवाल आदि ने इसकी शुरुआत की थी। आज भी युवा वर्ग इसे जारी रखे हुए है।रमेश कुमार रावटे ने बताया कि इस बार आयोजन की पूरी जिम्मेदारी महिला समिति को सौंपी गई है। जिसमें अध्यक्ष इंदिरा साहू, कोषाध्यक्ष दीपिका रावटे और सचिव खुशी साहू हैं। उन्होंने कहा, महिलाएं भी नेतृत्व करें और अपनी जिम्मेदारी के साथ परंपरा को आगे बढ़ाएं, इसलिए यह जिम्मेदारी दी गई है।देव आना – आस्था या चमत्कार..⁰.?पांच दिवसीय यह त्योहार मन में उमंग, उत्साह और कौतूहल पैदा करता है। कई लोगों को लगता है कि देव आना एक ढकोसला है, लेकिन पूजा स्थल पर जाकर देखने पर ही पता चलता है। जब गौरी-गौरा के बाजे की धुन बजती है, तो लोग अपने आप झूमने लगते हैं। प्रतिदिन देव आना और देव उतरने के बाद जब उनसे पूछा जाता है कि तुम्हारे साथ क्या हुआ, तो वे अनभिज्ञता जताते हैं। यही अलौकिक शक्ति को दर्शाता है।इस बार तिथियों में बदलाव पिछले 3 सालों से आयोजन में एक विषमता देखी जा रही है। पहले लक्ष्मी पूजा के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा होती थी, लेकिन विगत 3 वर्षों से तिथियों में अंतर आ रहा है। जिसके कारण इस बार रविवार को महालक्ष्मी पूजा होगी, सोमवार को अल्पविराम के बाद मंगलवार को विभिन्न ग्रामीण अंचलों में सुबह गौरी-गौरा विसर्जन होगा और शाम को गोवर्धन पूजा का आयोजन होगा। दीपावली के बाद विभिन्न ग्रामों में देव मंडई का भी आयोजन होगा। Spread the lovePost navigationचिखला कसा की बेटी दिलप्रीत ने जीता गोल्ड मैडल, बालोद जिले का बढ़ाया मान ।