छत्तीसगढ़डौंडीदल्लीराजहराबालोद

शहीद वीर नारायण सिंह की 168वीं पुण्यतिथि 19 दिसंबर को डौंडीलोहारा में मनाया जाएगा।

दल्ली राजहरा बुधवार  17 दिसंबर 2025 भोज राम  साहू 9893765541

19 दिसम्बर 2025 को छ.ग. मुक्ति मोर्चा/जिला किसान संघ बालोद/छ.ग. माइंस श्रमिक संघ वीर नारायण सिंह की 168 वीं पुण्यतिथि मना रही हैं, इस बार यह कार्यक्रम डौंडीलोहारा के बाज़ार चौक में मनाए जाने का निर्णय लिया गया, जिसमें जिला किसान संघ बालोद, छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ और छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा इस कार्यक्रम को व्यापक और बड़ा रूप मनाने का प्रयास किया जा रहा है, छत्तीसगढ़ के इतिहास पुरूष शहीद वीर नारायणसिंह को इतिहास के गर्भ से निकालकर जनमानस के दिल में उनके क्रांतिकारी संघर्षों को उजागर करने के उद्देश्य से शहीद शंकर गुहा नियोगी ने 19 दिसम्बर 1979 को जयस्तंभ चौक रायपुर , उसी स्थान से जुलूस की शुरूवात किया और आमसभा ऐतिहासिक गाँधी मैदान रायपुर में सम्पन्न हुई थी।
सभा को मजदूरों के मुखिया के अलावा शहीद-ए-आजम भगतसिंह के भाँजे जगमोहन सिंह और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मन्मथनाथ गुप्त ने सम्बोधित किया। तब पहली बार छत्तीसगढ़ के आमजनों को ज्ञात हो सका कि छत्तीसगढ़ के इतिहास में कोई इतिहास पुरूष शहीद वीर नारायण सिंह था जिसने 1857 के महासंग्राम में अंग्रेजों से डटकर लोहा लेकर उनके दाँत खट्टे किये थे। बेईमान इतिहासकारों ने वीर नारायण सिंह के क्रांतिकारी गरिमामय संघर्षों को इतिहास की काल कोठरी में दफन किया था।
उस इतिहास पुरूष की गौरव गाथा को शंकर गुहा नियोगी ने 19 दिसम्बर 1979 को रायपुर के गाँधी मैदान में उजागर किया। तब से प्रतिवर्ष छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा शहीद वीर नारायणसिंह शहीद दिवस मना रहा है।

 19 दिसम्बर 1983 को जब कांग्रेस के मुख्यमंत्री अर्जुनसिंह ने सरकारी तौर पर पहली बार दल्ली राजहरा के मीना बाजार मैदान से मनाने की शुरूवात किया, दूसरी ओर छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा और छत्तीसगढ़ माइन्स श्रमिक संघ ने त्रि-दिवसीय आयोजन किया 17 दिसम्बर से 19 दिसम्बर तक 2 नम्बर हाई स्कूल मैदान दल्ली राजहरा में वीर नारायण सिंह के जीवन पर आधारित नाटक का मंचन सांस्कृतिक मंडली नवाँ अंजोर के माध्यम से पूरे रात गीत-संगीत, नाच प्रहसन के जरिए वीर नारायण सिंह के संघर्ष को जनमानस तक पहुंचाया।

छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा/छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ और जिला किसान संघ बालोद, तमाम साथियों, किसान मजदूर, युवा वर्ग, बुद्धिजीवी वर्ग, महिलाओं, संगठनों और छत्तीसगढ़ में सभी वीर नारायण सिंह के अनुयायियों से अपील करता है कि 19 दिसंबर को अधिक अधिक संख्या में आकर वीर नारायण सिंह के शहादत को सफल बनाए।

➡️🔥🏹⚔️शहीद वीर नारायण सिंह एक परिचय🏹⚔️🔥⬅️

शहीद वीर नारायण सिंह छत्तीसगढ़ के लिए एक महान क्रांतिकारी के रूप में पूजा जाता है l आज भी इस वीर की गौरव गाथा छत्तीसगढ़ के जनमानस के बीच सुनाई जाती है l प्रदेशवासियों के साथ-साथ पूरे देश में उन्हें एक आदर्श पुरुष के रूप में माना जाता है l गरीबों के अधिकार के लिए लड़ने वाले इस वीर ने अपना जान तक निछावर कर दिए l छत्तीसगढ़ के बलौदा बाजार जिले के सोनाखान के लोग आज भी इन्हें देवता के रूप में पूजते हैं l जब हम गरीबों को इंसाफ और उनके अधिकार दिलाने वाली चरित्र की बात करते हैं तो सबसे पहले हमारे दिमाग में एक ही नाम आता है वह है जिसने गरीब देशवासियों की जान बचाने के लिए अपने आप को बलिदान कर दिया l जमीदार होते हुए भी वह साहूकारों से देशवासियों के भूख के लिए लड़ा उनका नाम है वीर नारायण सिंह l जिन्हें 1857 के छत्तीसगढ़ के प्रथम शाहिद के रूप में जाना जाता है l वीर नारायण सिंह का जन्म छत्तीसगढ़ के सोनाखान में 1795 में एक जमींदार परिवार में हुआ था इनके पिता का नाम रामसाय था l

कहते हैं कि वे 300 गांव की जमींदार थे पिता की मृत्यु के बाद 35 वर्ष के आयु में वह जमीदार बन गए l उनका स्थानीय लोगों से अटूट लगाव था 1856 में इस क्षेत्र में भीषण अकाल पड़ा लोगों के पास खाने के लिए कुछ भी नहीं था जो था वह अंग्रेज और उनके गुलाम साहूकार अपने गोदाम में भर लेते थे l भूख से जनता का बुरा हाल था अपने क्षेत्र में जनता का इतना बुरा हाल वीर नारायण सिंह से देखा नहीं गया l उन्होंने कसडोल में अंग्रेजों से सहायता प्राप्त साहूकार माखनलाल की गोदाम से अवैध और जोर जबरदस्ती से एकत्रित किया हुआ अनाज लूट लिया और भुखमरी से पीड़ित जनता को बांट दियाl इस कृत्य से अंग्रेज उन्हें 24 अक्टूबर को 1856 को बंदी बनाकर जेल में डाल दिया l 1857 को पूरे प्रदेश में स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए ज्वाला धड़क उठा अंग्रेजों के सेवा में कार्यरत भारतीयों ने भी विद्रोह कर दी l इस समय आजादी के आग की लपटे छत्तीसगढ़ में भी आई l जिससे सोनाखान भी अछूत नहीं रहा l इस कारण 18 अगस्त 1857 को भारतीय सेवा में कार्यरत स्थानी लोग लोगों ने वीर नारायण सिंह को जेल से मुक्त कर लिया और अपना नेता मान लिया जन समर्थन पाने के बाद उन्होंने 500 लोगों की एक बंदूकधारी सेना बनाया l

जो अंग्रेजों के दांत खट्टे कर सके और अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया शहीद वीर नारायण सिंह कोरपट की दुर्गम पहाड़ियों को अपना केंद्र बनाया था l वह यहां अपनी कुलदेवी मां दंतेश्वरी के साधना करते थे और गुफाओं पहाड़ी दरों में सैन्य अभियान की अभ्यास किया करते थे l अनेक जमीदार इनसे बदला लेने के लिए अंग्रेजों के साथ देने लगे l वह अपने धन के साथ सैन्य संसाधनों की सहायता भी वीर नारायण सिंह के विरुद्ध करने लगे जब अंग्रेज अपनी चाल पर कामयाब नहीं हो सका तब अंग्रेजों ने वीर नारायण सिंह की डूबती रग पर हाथ रखकर स्थानीय निवासियों के घर जलाकर उन पर अत्याचार करने लगे l वीर नारायण सिंह ने अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया उनका आत्मसमर्पण का मूल उद्देश्य था कि उनके कारण किसी गरीब जनता को हानि न पहुंचे l यह युद्ध उनके और अंग्रेजों के बीच है तो इसका भुगतान एक गरीब जनता क्यों करें अंग्रेजों के द्वारा वीर नारायण सिंह पर राजद्रोह का आरोप लगाकर कोर्ट में पेश किया गया l जज ने उन्हें 10 दिसंबर 1857 को फांसी देने का फैसला सुनाया उन्हें जहां फांसी दी गई वह जगह आज राज भवन के सामने शहीद वीर नारायण सिंह चौक के नाम पर है l वंशज राजेंद्र सिंह के अनुसार वीर नारायण सिंह से अंग्रेज इतने खौफ खाते थे कि फांसी देने के बाद के शव को अंग्रेजों ने जेल परिसर में 6 दिन तक फांसी पर लटका कर रखा और सातवें दिन जय स्तंभ चौक पर तोप से उड़ा दिया l

भारत सरकार ने उनके बलिदान को सम्मान देने के लिए इनकी 130वीं बरसी पर सन 1987 में 60 पैसे का डाक टिकट जारी किया है l जिसमें अंग्रेजों के द्वारा उन पर किए गए अत्याचार को दिखाया गया है l छत्तीसगढ़ राज्य सरकार ने उनके सम्मान में आदिवासी उत्थान के लिए शहीद वीर नारायण सिंह सम्मान प्रतिवर्ष देते हैं l

Bhojram Sahu

प्रधान संपादक "हमारा दल्ली राजहरा: एक निष्पक्ष समाचार चैनल"

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