दुर्ग। पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती पर वरिष्ठ भाजपा नेता अनिल साहू ने कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय भारतीय राजनीतिक चिंतक और राजनेता थे। उन्होंने भारतीय जनसंघ की स्थापना की और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के (RSS) संगठनकर्ता भी रहे। पंडित दीनदयाल उपाध्याय हिंदुत्व विचारधारा के समर्थक थे जिन्होंने भारतीय सनातन परंपरा को नवीनतम युग के अनुसार करने के लिए एकात्म मानववाद की विचारधारा प्रकट की।। वरिष्ठ भाजपा नेता अनिल साहू ने बताया कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितंबर 1916 को चंद्रभान, मथुरा यू पी में हुआ उनके पिता का नाम भगवती प्रसाद और माता का नाम रामप्यारी था। माता पिता की जल्दी मृत्यु हो जाने के कारण उनका पालन पोषण मामा ने किया। उन्होंने पिलानी में बिडूला कॉलेज में इंटरमीडिएट किया। उन्होंने 1939 में कानपुर के सनातन धर्म कॉलेज में बी.ए. किया। वे अंग्रेजी साहित्य में मास्टर डिग्री हासिल करने के लिए सेंट जॉन कॉलेज आगरा में शामिल हो गए लेकिन उन्होंने अपनी मास्टर डिग्री पूरी नहीं की। वरिष्ठ भाजपा नेता अनिल साहू  ने बताया कि भारतीय जन संघ 1951 में जब जनसंघ बना तब उन्हें उत्तर प्रदेश शाखा के महासचिव और बाद में अखिल भारतीय महासचिव नियुक्त किया गया था। 15 वर्षों तक, वह संगठन के महासचिव बने रहे। 1937 में कानपुर के सनातन धर्म कॉलेज में छात्र होने के दौरान, वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के संपर्क में आए। और 1942 में संघ के आजीवन प्रचारक बने… प. दीनदयाल उपाध्याय ने राजनीतिक दर्शन एकात्म मानवतावाद की कल्पना की। यह दर्शन शरीर, मन और बुद्धि और प्रत्येक इंसान की आत्मा के एक साथ लाने को प्रयासरत है। अंतोदय “समाज की अंतिम पंक्ति के व्यक्ति का उदय”, जिसका सरल भावार्थ है पिछड़े लोगों का उत्थान करना। गरीबों और पिछड़े वर्गों को दूसरे वर्गों के समान लाना। “हमारी राष्ट्रीयता का आधार भारत माता है, केवल भारत ही नहीं माता शब्द हटा दीजिए तो भारत केवल जमीन का एक टुकड़ा बनकर रह जाएगा।” इतना बड़ा नेता होने के बाद भी उन्हें जरा सा भी अहंकार नहीं था..पंडित दीनदयाल उपाध्याय का मानना था की भारत को औद्योगीकरण के रास्ते पर चलते हुए अनाज के मामले में भी आत्मनिर्भर बनना चाहिए।हमें आर्थिक कमजोरियों को दूर करते हुए अपनी मजबूती (कृषि) पर ध्यान देना चाहिए।
आम आदमी की आय बढ़ेगी तभी सब को काम मिलेगा।राजनीति में वो नव उदारवाद के विरोधी थे उनका मानना था की लोकतंत्र के लिए नव उदारवाद एक चुनौती साबित हो सकता है।राजनीति जनता द्वारा नियंत्रित की जानी चाहिए ना कि कुछ धनी व्यक्तियों द्वारा।पंडित दीनदयाल उपाध्याय भारतीय जन संघ के संस्थापक थे जो बाद में जाकर भारतीय जनता पार्टी नाम से बना। दिसंबर 1967 में उपाध्याय को भारतीय जन संघ का अध्यक्ष बनाया गया था एकात्म मानववाद की विचारधारा का मूल सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है जो समाजवाद और व्यक्तिवाद से अलग सोचने की आजादी देता हैं।एकात्म मानववाद एक वर्गहीन, जातिविहीन तथा संघर्ष मुक्त सामाजिक व्यवस्था जो साम्यवाद से अलग है उसके रूप में परिभाषित किया। वो सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक तरीके से भारतीय संस्कृति का एकीकरण होना चाहिए।भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में घुटन सी महसूस करता है क्योंकि पश्चिमी विचारधाराओं के कारण (लोकतंत्र, समाजवाद, साम्यवाद और व्यक्तिवाद) मौलिक भारतीय विचारधारा में कमी और उसके विकास में बाधा आ रही है।पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी कहते थे कि भारत में रहने वाला और इसके प्रति ममत्व की भावना रखने वाला मानव समूह एक जन हैं। उनकी जीवन प्रणाली, कला, साहित्य, दर्शन सब भारतीय संस्कृति है। इसलिए भारतीय राष्ट्रवाद का आधार यह संस्कृति है। इस संस्कृति में निष्ठा रहे तभी भारत एकात्म रहेगा।”पंडित दीनदयाल उपाध्याय की मौत राजनीतिक साजिश का एक परिणाम जो की सीधे शब्दों में कहा जाए तो राजनीतिक हत्या थी..फरवरी 1968 पंडित दीनदयाल उपाध्याय सियालदह एक्सप्रेस में लखनऊ से पटना के लिए रवाना हुए शाम 7 बजे यूपी के उप मुख्यमंत्री राम प्रकाश गुप्त और एमएलसी पीताम्बर दास उन्हे छोड़ने के लिए स्टेशन तक आए।ट्रेन 12 बजे जौनपुर स्टेशन पहुंची वहां दीनदयाल जी से मिलने जौनपुर महाराजा का खत लेकर कन्हैया आया। पंडित जी ने उसको जल्द खत का जवाब देने को कहा और ट्रेन 12 बजकर 12 मिनट पर वहां से चल दी।गाड़ी 2 बजकर 15 मिनट पर मुगलसराय जंक्शन पर पहुंची वहां से इस डिब्बे को दिल्ली-हावड़ा एक्सप्रेस में जोड़ दिया गया। लेकिन जब 6 बजे रेलगाड़ी पटना पहुंची तो उसमे उपाध्याय जी नही थे।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का शव मुगलसराय स्टेशन से दूर 1267 नंबर खंभे के पास रात में 3.30 बजे लीवर मैन ईश्वर दयाल ने देखा था। उसने इसके बारे में सहायक स्टेशन मास्टर को ख़बर दी।रेलवे पुलिस वहां पहुंची राम प्रसाद और अब्दुल गफूर नाम के अधिकारी वहां पहुंचे लेकिन डॉक्टर 6 बजे के बाद पहुंचा और उसने उन्हे मृत घोषित कर दिया और अभी तक किसी को नही पता था की ये शव पंडित दीनदयाल उपाध्याय का है।पंडित जी को सबसे पहले बनमाली भट्टाचार्य जो स्टेशन पर काम करता था उसने पहचाना।सीबीआई ने मामले की जांच की और दो आरोपी राम अवध और भरत लाल को कोर्ट ने पेश किया गया।उन्होंने स्वीकार किया था कि उन्होंने चोरी का विरोध कर रहे दीनदयाल उपाध्याय को चलती ट्रेन से नीचे फेंक दिया था लेकिन कोर्ट ने सबूतों के अभाव में दोनो आरोपियों को हत्या के मामले में बरी कर दिया गया।बलराज मधोक जो उस समय जन संघ के प्रमुख विचारकों में से एक थे उन्होंने पंडित दीनदयाल उपाध्याय की मृत्यु को एक राजनीतिक हत्या बताया था।नानाजी देशमुख ने भी उनकी हत्या को एक राजनीतिक साजिश बताया क्योंकि उनके पास खुफिया दस्तावेज थे इस तरह 11 फरवरी 1968 को पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने इस दुनिया को छोड़ दिया.।

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