दल्ली राजहरा

रविवार 15 फरवरी 2026

भोजराम साहू 9893 765541

 

“संडे मेगा स्टोरी” में आज रविवार 15 फरवरी 2026 को संडे मेगा स्टोरी क्रमांक 37 की कहानी में पढ़िए नगर के राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त लेखिका मातृशक्ति डॉक्टर शिरोमणि माथुर की आलेख किशोर में बढ़ता क्रोधी स्वभाव इस आलेख में मातृशक्ति डॉक्टर शिरोमणि माथुर ने बच्चों को पालकों और शिक्षकों के द्वारा सही समय शिक्षा और संस्कार नहीं देने पर उन्हें हो रही अल्पज्ञ ज्ञान और संस्कार की कमी को अपने आलेख में बेहतरीन ढंग से लिखी है। यह आलेख एक बार आप अवश्य पढ़िए।

पेड़ों के शाखाओं में कली आना कली से फूल, फूल से बीज और बीज से पौधा बनने में एक निश्चित समय लगता है। बीज पौधा बन जाए तो उसे खाद पानी के साथ उसके बढ़ने और पनपने की योग्य वातावरण की आवश्यकता होती है। तभी वह बीज से पौधा और पौधा से पेड़ बन पाता है यही प्रकृति का नियम है और यह नियम पेड़ पौधे जीव जंतु के अलावा मानव जीवन पर भी लागू होता है।

 मां के गर्भ से जब बच्चे का जन्म होता है तो छोटे से बीज की तरह उनका भी लालन पालन के साथ-साथ सही समय पर उन्हें रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए दवाई के साथ मां का दूध और भोजन की आवश्यकता होती है जब बच्चे थोड़ा सा बड़ा हुए तो उन्हें संसार की ज्ञान के साथ संस्कार की आवश्यकता होती है । जहां बहुत सी आवश्यक बातें उन्हें मां घर परिवार से मिलती है तो कई जानकारियां और ज्ञान प्राप्त करने के लिए हम उन्हें गुरुकुल या स्कूल भेजते हैं ।

शिक्षा का मंदिर कहे जाने वाले स्कूल में सरकारों के द्वारा शिक्षकों पर थोपी जा रही विभिन्न जिम्मेदारी से बच्चे को शिक्षा देने में अब वह समय नहीं दे पा रहे हैं । जिसके कारण जो संस्कार और ज्ञान स्कूलों में दिया जाता था। वह समय अभाव के कारण बच्चों को नहीं मिल पा रहा है । ज्ञान और संस्कार नहीं मिलने से बच्चों में बहुत ज्यादा बदलाव देखने को मिल रहा है ।

➡️????????किशोरों में बढ़ता क्रोधी स्वभाव????????⬅️

आज किशोरों और युवाओं में बढ़ता क्रोध या गुस्सैल स्वभाव चिन्ता का विषय है। स्कूल जाने वाले छात्र लड़ाई , मारपीट , अपराधी वृत्तियों की ओर आकर्षित होते जा रहे है ।उनमें धैर्य व सहनशीलता की कमी दिखाई देती जा रही है। यह हमारे लिए चिंतन का विषय हैं ।

         बच्चे देश का भविष्य है वर्तमान समय में अधिकतर बच्चों में गलत संस्कार घर करते जा रहे हैं। स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे निराशा , गुस्सा व हिंसक प्रवृत्तियों को अपनाते जा रहे हैं। हमें चिंतन करना होगा इसके लिए कौन जिम्मेदार है ?नैतिक मूल्यों की कमी , मीडिया, इन्टरनेट , माता पिता , सामाजिक परिवेश , सरकारें.. ? या सभी।

जहाँ माता पिता- दोनों काम पर जाते हैं वे काम की व्यस्तता और आधुनिकता की चकाचौंध में नैतिक मूल्यों को महत्व देना जरुरी नहीं समझते उनके पास बच्चों के लिए समय नहीं होता। वे बाल सुलभ भावनाओं को महत्व नहीं दे पाते, अपने काम के कारण दिनभर की थकान से स्वयं टूटे हुए होते हैं । इसलिए वे बच्चों पर ध्यान नहीं दे पाते । जिन घरों में माता पिता लड़ते झगड़ते रहते हैं उन घरों के बच्चे और भी अपने को अनाथ व असहाय समझते है । वे भी माता पिता के झगड़े से हिंसक प्रवृत्ति अपना लेते हैं, और चिड़चिड़े रहते है ।

 

        टूटते संयुक्त परिवार बच्चों के भविष्य को और स्वभाव को बहुत प्रभावित करते हैं। लोग घरों में आया रखना तो पसंद करते है परन्तु अपने माता पिता को अपने साथ रखना नहीं चाहते। सोचिए जिस लाढ़ प्यार से दादा,दादी बच्चों को रखते और उनकी देखभाल करते हैं वैसा आया रख सकेगी, क्या ?

➡️????????सरकारी स्कूलों का हो रहा है बुरा हाल????????⬅️

     सरकारी  स्कूलों  में जो बच्चे पढ़ते हैं वहां शिक्षक सरकारी योजनाओं की पूर्ति में व्यस्त रहते है- योजनाओं को पूरा करने में नियमित पढ़ाई पीछे छूट जाती है , सरकारी शिक्षक से पढ़ाने के अलावा बहुत से अन्य काम लिए जाते हैं , वे कभी चुनाव कर्मी है, कभी सर्वेयर है ,डाटा कर्मी , जनगणना , शौचालय सर्वें, स्वास्थ रैकिंग , रैलियों का आयोजन मिड-डे-मिल की व्यवस्था पोर्टल पर पंजीकरण और अब एसआईआर सबकी जिम्मेदारी उन्हीं पर होती है।शिक्षकों को पढ़ाने का समय कम मिलता है। ऐसे में प्राथमिकता शिक्षा की जगह योजनाओं को मिल जाती है और बच्चे खाली बैठे गलत रुचियां पाल लेते है। ऐसे में जरुरी है कि शिक्षक को शिक्षक ही रखा जाय, योजनाओं की अपेक्षा शिक्षा को प्राथमिकता दी जाय बच्चों को पढ़ने का पूरा समय दिया जाय। करोना काल में आनलाइन पढ़ाई के कारण स्मार्ट फोन का चलन बढ़ा , जिसका प्रभाव अभी तक है। 

आजकल बच्चों को मोबाइल की लत लग गई है। कुछ माताएं बच्चों को मोबाइल थमाकर अपने कामों में व्यस्त रहती है और बच्चा धीरे धीरे मोबाइल का आदी हो जाता है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के समाचार और समाचार पत्रों में ऐसी कई घटनायें पढ़ने को मिल जाती है कि मोबाइल न मिलने पर बच्चे विक्षिप्तों जैसा व्यवहार करते है और कभी कभी घातक कदम उठाकर हत्या या आत्महत्या की ओर बढ़ रहें जो अत्यंत चिंता का विषय है। 

गाजियाबाद की तीन नाबालिग बहनों की मौत की त्रासदी अत्यंत दुखद है। आन लाइन गेमिंग के कारण कई परिवारों के बर्बाद होने की घटनायें भी सामने आती रहती है। गंभीर चिंतन का विषय कि हमारा समाज किधर जा रहा है ?

          किशोरों और युवाओं की हिंसक प्रवृत्तियों को रोकने के लिये बच्चों को नैतिक मूल्यों का ज्ञान, अपनी संस्कृति, परम्पराओं का अनुसरण, अध्यात्म को दैनिक जीवन में सम्मिलित करना आवश्यक है। माता पिता के अतिरिक्त शिक्षण संस्थाओं को पहल करने की महती अवश्यकता है , तभी बच्चे सभ्य, संस्कारी व सहनशील व्यक्तित्व की छवि बना सकेंगे। जब माता पिता दोनों काम पर जाते हो तो सयुक्त परिवार की महत्ता को स्वीकार करने का समय आता जा रहा है, जहाँ बच्चे ज्यादा सुरक्षित रहते हैं। 

           आधुनिकता और उत्तर आधुनिकता से डिजिटल दुनियां में हमारा समाज कहा खड़ा है यह समझना होगा। आई आई आई एम अहमदाबाद के अध्ययन से सामने आया है भारत में तेजी से मानसिक बीमारियां बढ़ेगी । परिवार सिमट रहे है, कुटुम्ब खो रहे है, अब एकल परिवार भी सुरक्षित नहीं है। स्मार्ट फोन के हमलों से सचेत रहने की आवश्यकता है। किशोरों में बढ़ती हिंसक व नकारात्मक सोच को समझते हुए सुधार हेतु प्रयास अति आवश्यक है ।

 

यदि आपके पास भी ऐसा कोई आलेख या कहानी हो जिससे लोगों को शिक्षा  या प्रेरणा  मिल सके तो अवश्य भेजिए आपका कहनी  हमारा दल्ली राजहरा एक निष्पक्ष समाचार चैनल  पर  निःशुल्क प्रसारित किया जाएगा ।

धन्यवाद..!

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Bhojram Sahu

By Bhojram Sahu

प्रधान संपादक "हमारा दल्ली राजहरा: एक निष्पक्ष समाचार चैनल"

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