दल्ली राजहरा
रविवार 7 जून 2026
भोजराम साहू 9893 765541
आज हमारा दल्ली राजहरा एक निष्पक्ष समाचार चैनल की ओर से संडे मेगा स्टोरी के 44 वाँ अंक में छत्तीसगढ़ से बाहर के एक ऐसे स्कूल की शिक्षा व्यवस्था के बारे में आपको बता रहे हैं । इस स्कूल के बारे में आप में से कईयों ने सुना होगा और पढ़ा भी होगा । देश केऐसे प्रदेश जहां कई राजनेता और प्रधानमंत्री जन्म लिए ऐसी प्रदेश की कहानी है । उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के एक छोटा सा शासकीय स्कूल हरदोई के पी टी वाले मास्टर जी के नाम से प्रसिद्ध रमेश कुमार और उनके शासकीय प्राथमिक विद्यालय सनफरा ब्लाक सांडी जिला हरदोई की कहानी । 

आज आपको बता रहे हैं रमेश कुमार शिक्षक की जुनून ने आज इस अत्यंत पिछड़े हुए स्कूल को इस मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया है कि पूरे उत्तर प्रदेश और देश के अलावा विदेश अमेरिका और कनाडा से भी इन छोटे-छोटे प्राइमरी के बच्चों के हुनर देखने के लिए बुलावा आ रहे हैं । यह एक ऐसा स्कूल है जहां के छोटे-छोटे बच्चे जिले में 8 साल से   । ये बच्चे डंबल उठाते हैं लीजिंग बजाते हैं मानव पिरामिड बनाते हैं । यह एक सरकारी स्कूल ,कम सुविधा फिर भी ये बच्चे कमाल कर रहे हैं ।इनका पूरा श्रेय जाता है रमेश कुमार पीटी टीचर को जो वास्तव में पीटी टीचर ना होकर सब्जेक्ट टीचर है ।फिर भी पढ़ाई के साथ-साथ फिजिकल ट्रेनिंग इन बच्चों को देते हैं रमेश कुमार जी का मानना है की पढ़ाई के साथ-साथ खेल भी जीवन में जरूरी है । 
 शुरुआत कैसे की इस संबंध में बताते हैं कि एक बार में कंपटीशन में भाग लेने दूसरे गांव के स्कूल गए थे । स्कूल के बच्चों को देखकर रमेश कुमार ने सपना देखा कि मेरे स्कूल के बच्चे का भी ऐसा टीम होता । बिना सुविधा के एक सरकारी स्कूल के बच्चे इस कैसे कर पाएंगे । प्रॉब्लम बहुत सारा था पर सपना देख लिया था फिर क्या था बच्चों को ट्रेनिंग देना चालू किया । कई बाधाएं आई पर वे आगे बढ़ते गए । वो छुट्टी के बाद बच्चों को मैदान पर सिखाते गए । ना कोई अतिरिक्त वेतन ना कोई अतिरिक्त फायदा सिर्फ एक ही जुनून को पूरा करना था उनको , बच्चों को कुछ अलग करने की ललक और जुनून ।

 

शिक्षक रमेश कुमार ने बताया सितंबर 2018 में जब स्थानांतरण हो कर हरदोई के इस स्कूल में आए थे तब स्कूल की स्थिति बहुत ही खराब थी बड़ा जगह होने के कारण गांव वाले यहां अपना गाय भैंस यही बांधते थे । बच्चे स्कूल पढ़ने के नाम से नहीं आते खाना खाने के लिए आते और खाना खाकर झोला उठाकर चले जाते थे । किसी को कोई मतलब ही नहीं था शिक्षक तो यहां पर थे पर अव्यवस्था के कारण वे भी नतमस्तक थे । जब स्थानांतरण होकर रमेश कुमार का इस स्कूल में आना हुआ तो उन्होंने अपने जुनून के साथ कुछ कर दिखाने की बात ठानी । उन्होंने बताया कि मैं जब आया तो यहां दो टीचर पहले से थे शिक्षकों के साथ बैठकर स्कूल में कुछ करने के लिए मैंने सबसे पहले ग्राम के प्रधान को बोलकर स्कूल में पशु आदि को बांधना बंद करवाया।

 अब स्कूल की सफाई के बाद इन बच्चों को शिक्षा और खेल से जोड़ने के लिए सबसे पहले पहली और दूसरी कक्षा के बच्चों से की क्योंकि बड़े बच्चों को सिखाने के बाद वह आगे निकल जाएंगे तो सिखाने में कोई फायदा नहीं होगा । इसके लिए मैंने छोटे बच्चों को पीटी सीखाना चालू किया । शुरू में 30 _35 बच्चे थे पी टी के शुरुआत में बहुत दिक्कत हुआ । बच्चे बोले हम नहीं कर सकेंगे शुरुआत से कुछ बच्चे और कम हो गए । कुछ बच्चों को मजा आना चालू हो गया उनको देखकर और बच्चे बढ़ने लगे । अब हम बच्चों से कहते कि बच्चे 10 मिनट यह वाला अभ्यास तकर लो बच्चे कहते नहीं कर आधा घंटा और करेंगे। मतलब बच्चे को इतना इंटरेस्टेड होते गए हैं कि हमें इनको बंद करने के लिए कई बार बच्चों को दबाव बनाना पड़ता था कि आप पहले पढ़ाई कर ले फिर बाद में अभ्यास करेंगे ।

4& 6 महीने बाद बहुत अच्छी टीम तैयार हो गई । गांव वाले ने देखा की स्कूल में इतना शोर शराबा कैसे हो रहा है पहले यहां तो कुछ भी आवाज नहीं आता था । बच्चे अपने घर जाते अपने परिजन को बताते कि आज हम लोगों ने यह सिखा उनकी बात करने की शैली बदलती गई । गांव के गालियों में स्कूलों की चर्चा होती गई जो बच्चे स्कूल नहीं आना चाहते थे ।वो भी अब दौड़कर स्कूल आने लगे । और उनके परिजन भी बच्चों को स्कूल भेजने लगे । इस तरह से दर्ज संख्या में दिनों दिन बढ़ोतरी होती गई ।

 धीरे-धीरे बच्चों को खेल से जोड़ने के लिए हम लोगों ने खो-खो कबड्डी भी चालू कर दिया अब खेल के साथ-साथ पढ़ाई में भी बच्चे ध्यान देने लगे । हमारे सारे बच्चे पीटी जानते हैं पीटी से शरीर का विकास ही नहीं मानसिक विकास भी होने लगा जब तक बच्चा हष्ट पुष्ट नहीं होगा उनकी मानसिक विकास नहीं होगी तो पढ़ाई में क्या आगे बढ़ेंगे ।

क्या आपको विशेष ट्रेनिंग मिली है…?
 तब उन्होंने बताया कि नहीं मैं पीटी टीचर नहीं हूं मैं जब हाई स्कूल में पढ़ाई करता था तब शिक्षक ने सिखाया उसको मैंने बच्चों को सिखाया थोड़ी बहुत पुस्तक आदि से सीख कर बच्चों को बताता हूं । मैं शुरू में शिक्षामित्र था आज शिक्षक हो गया हूं । सोचा कि कुछ अलग करना चाहिए ।सबसे अच्छी बात यह हुई कि हमने पहले बच्चों की एक्टिविटी की वीडियो बना कर पहली बार शिक्षा मिशन ग्रुप में डाला । वीडियो में स्कूल की रूपरेखा के साथ-साथ मैंने अपना नंबर भी डाला था यह वीडियो इतने फेमस हो गए कि लोग कई बार देखे । कि 6 से 7 साल का बच्चा किस तरह की गतिविधियां कर सकता है । सिर्फ हमारा उत्तर प्रदेश ही नहीं दूसरे प्रदेशों के साथ-साथ अमेरिका और कनाडा से भी हमारे पास फोन आने लगे इतने छोटे-छोटे बच्चों के पास इतनी फुर्ती कैसे और कहाँ से आ गई ।

 आपने इसे तैयार कैसे लिया 
तब उन्होंने बताया कि आप शिक्षक हो यह मत सोचो कि बच्चे यह नहीं कर सकते । जब शिक्षक दृढ़ निश्चय कर ले तो बच्चे सब कर सकते हैं ।आप जानते हैं ये गांव के बच्चे हैं गांव की स्थिति कैसे रहती है जब वीडियो वायरल हुआ तो लोगों ने देखा । उनके पास ना तो ड्रेस है ना तो जूता है पूरे बच्चे सुविधा हीन हैं । लोगों के फोन आने लगे कि सर हम बच्चों की मदद करना चाहते हैं बताइए हम क्या करें आपको किस चीज की आवश्यकता है । सर्वप्रथम दिल्ली से प्रमोद सूद जो की क्रिकेट के अंतरराष्ट्रीय अंपायर हैं वह आए ।उन्होंने बच्चों से लेकर हम शिक्षकों तक के लिए ट्रैक सूट जूता मौजा दिए । उसके बाद कानपुर से गायत्री प्रज्ञा पीठ वाले भी कई सामान लेकर आए थे इस तरह से सहयोग हर तरह से आए । सबसे ज्यादा मीडिया आए बहुत चैनल में वीडियो आया लोगों को बीच फैली जब मीडिया हावी होने लगी तो पूरे जगह में फोन आने लगे ।

पूछने लगे 1 साल में इतने फेमस हो गया कि बड़े-बड़े अधिकारी भी हमारे सनफरा की स्कूल में आने लगे । शासन के मंत्री भी आकर स्कूल को देखते जब भी किसी मंत्री या शासन के अधिकारी का इस क्षेत्र में दौरा होता वह हमारे स्कूल बच्चों से मिलने अवश्य आते । जिससे फायदा यह हुआ कि स्कूल के साथ-साथ आज गांव का भी विकास हो रहा है । जब स्कूल की प्रसिद्धि बढ़ी तो आसपास के गांव वाले भी कहने लगे कि हमारे बच्चे को भी सरफरा के स्कूल में पढ़ना है । हम भी यही अपने बच्चों को पढ़ना चाहते हैं आज स्कूल को देखकर गांव वाले भी खुश बच्चे भी खुश हैं साथ-साथ हम लोग भी खुश हैं ।

 

रमेश कुमार जी से जब प्रश्न किया गया कि आपने 1 साल के अंदर स्कूल की दिशा से लेकर दशा बदल दी दूसरे शिक्षक के लिए आप क्या कहना चाहते हैं ..? जो इस तरह से करना चाहते हो ..?

 जो बातें उन्होंने कही वह हर शिक्षकों के लिए एक प्रेरणादाई है उन्होंने कहा कि सबसे पहले आपको समय का ध्यान रखना होगा । यदि आपका विद्यालय 8:00 बजे लगता है तो आपको कम से कम 7:45 बजे तक स्कूल पहुंचना होगा प्रयास करें कि 8:00 बजे से पहले छोटी-छोटी जो गतिविधियां हैं वह पूरा हो जाए । पढ़ाई वगैरह सभी के लिए आपको समय मिल जाएगा समय में हम नहीं पहुंचेंगे तो बच्चे को क्या बताएंगे । सर जब मैं पढ़ता हूं तो मैं कुर्सी में बैठकर नहीं पढ़ता हूं कई दिन तो मुझे कुर्सी में बैठने का समय ही नहीं मिलता मैं बच्चों को घूम-घूम कर पढ़ता हूं कि बच्चे क्या कर रहे हैं उनकी गतिविधियां ध्यान से देखता हूं । जिससे बच्चे पढ़ाई में ध्यान देते हैं मैं उन्हें शिक्षक बनकर नहीं एक मित्र की तरह पढ़ता हूं उससे फायदा यह होता है कि जो भी बच्चों को कठिनाई या समस्या होती है वह बे झिझक मुझसे पूछता है की सर इसको कैसे बनाएं । एक तो उनका आत्मविश्वास भी इससे बढ़ता है । और वे पूरे मन और लगन से पढ़ाई करते हैं ।

 

जब उनसे पूछा गया कि आप इन्हें क्या बनना देखना चाहते हैं।
 तब उन्होंने बताया बच्चे खुद अपना रास्ता चुन रहा है एक दिन मैं बच्चों से पूछा कि आप लोग क्या बनना चाहते हो तो उन बच्चों में से कोई कहता है मैं पुलिस बनना चाहता हूं कोई कहता है कि मैं मिलिट्री में जाऊंगा मैं देश सेवा करूंगा यह सब देखकर और बच्चों के मुंह से सुनकर बहुत अच्छा लगता है । उनकी लगन और उनकी आंख में विश्वास को देखकर खुशी भी होती है कि बच्चे आगे बढ़ाकर देश और समाज की रक्षा कर सकेंगे । 

जब उनसे पूछा गया कि आप प्राथमिक शाला की शिक्षक हैं आगे बच्चे जब मिडिल में जाएंगे तो वहां इस तरह की गतिविधियां और माहौल नहीं मिल पाएगा तो बच्चों को भविष्य का क्या होगा ..?

तब उन्होंने बताया कि आसपास का क्षेत्र बहुत ही पिछड़ा हुआ है पास में कोई ऐसा स्कूल भी नहीं है जहां बच्चे मिडिल लेवल की शिक्षा के लिए जाएं और मैं जाकर उन्हें कुछ सिखा सकूं वास्तव में यह चिंता का विषय तो है पर क्या करें जितना बन सकता है हम उतना ही कर सकते हैं 

 

जहां खेल नहीं है वहां स्कूल नहीं है फिजिकल एक्सरसाइज से शरीर का मानसिक विकास होता है टीचर को अपने आप को सुधारना होगा । जब तक आप अपने आप को नहीं सुधारेंगे विद्यालय सुधरेंगे नहीं ।

 

 टीचर कहता है कि हमारे विद्यालय में बच्चे नहीं आते हम उन विद्यालय में से है जहां बच्चे विद्यालय के नाम से भागते थे । आज विद्यालय खुलते ही दौड़े चले आते हैं किसी को बुलाना नहीं पड़ता बच्चों के साथ मित्रवत व्यवहार करिए उनसे प्यार से बोलिए बच्चे खुद-ब-खुद आपके पास आएंगे पढ़ने में रूचि रखेंगे ।

 

मां कहती है आज हमारे बच्चे ऐसी जगह से घूम कर आते हैं जिसकी हम लोगों ने कल्पना भी नहीं की है । यह सब स्कूल की गुरुजी रमेश कुमार जी की मदद से हुआ है ।

 

आज की संडे मेंगा स्टोरी एक ऐसी व्यवस्था को लेकर बनाई गई है । जहां शिक्षक कई रूपों में आते हैं एक शिक्षक जिन्होंने स्कूल की उतनी ही सीमित साधन और व्यवस्था से बच्चों की मनोदशा को ही बदल दी जो बच्चे स्कूल आने से कतराते थे वो बच्चे स्कूल खुलने का इंतजार करने लगे। इतना ही नहीं पूरे क्षेत्र के अलावा विदेश में भी इन बच्चों के प्रतिभा का चर्चा होने लगा । रमेश कुमार जैसे शिक्षक भी हमारे बीच में है ।और कुछ ऐसे शिक्षक भी हैं जिनके बारे में चर्चा करना ही मूर्खता है आज संडे मेगा स्टोरी में बस इतना ही ।

 

 

संडे मेगा स्टोरी में बस इतना ही 
भोज राम साहू
संपादक
( हमारा दल्ली राजहरा एक निष्पक्ष समाचार चैनल ) 

 

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Bhojram Sahu

By Bhojram Sahu

प्रधान संपादक "हमारा दल्ली राजहरा: एक निष्पक्ष समाचार चैनल"

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