दल्ली राजहरासोमवार 06 जुलाई 2026भोजराम साहू 9893 765541 संडे मेगा स्टोरी में आज रविवार 5 जुलाई 2026 को हमारा दल्ली राजहरा निष्पक्ष समाचार चैनल के 46 वीं कहानी में पढ़िए एएसपी “संतोष कुमार पटेल” की कहानी । हम अक्सर महलों में रहने वाले सुरवीरो की बात करते हैं आज आपको बता रहे हैं मध्य प्रदेश के पन्ना के जंगलों में रहने वाले शूरवीर की कहानी गरीबी में पल बढ़कर एएसपी बने संतोष पटेल की कहानी ।आपको बता दे की मध्यप्रदेश जिले के पन्ना जिले अजय गड़ के देवगांव के रहने वाले संतोष पटेल की जीवन बहुत ही गरीबी में बिता। मां पिताजी की तपस्या और अपनी कड़ी मेहनत के बदौलत आज एक सफल पुलिस अधिकारी के रूप में जाने जाते हैं । उच्च नीच अमीरी गरीबी जात पात उनके शब्दकोश में है ही नहीं । वे मिलनसार व्यक्तित्व के धनी हैं जहां भी जब भी मौका मिला वे लोगों की मदद करने में कभी नहीं चुके । जहां भी गए एक मिसाल खड़ा कर दिए बालाघाट से विदा लेने के समय लोग कहते उनसे इतना प्यार और लगाव हो गया है कि हम उनको अपना शहर से जाने नहीं देना चाहते । उनके जैसा अधिकारी हम लोगों ने आज तक नहीं देखा । उनके पास अपनी समस्याओं लेकर जाते हैं तो ऐसा नहीं लगता कि वो पुलिस विभाग के बड़े अधिकारी हैं बल्कि हमें अपना परिवार के सदस्य की तरह महसूस होता है । संतोष कुमार उनके साथ रहते उनके त्यौहार , कार्यक्रम में भी सम्मिलित रहते उनके साथ बैठकर पंगत में भोजन करते और अपने साथ उच्च अधिकारियों को भी बैठ कर भोजन करने के लिए प्रेरित करते थे । उनके व्यक्तित्व नहीं उनके बीच में उन्हें मसीहा बना दिया।उनका बचपन बहुत ही गरीबी में गुजरा घर की स्थिति ऐसी थी की बरसात में बाहर से ज्यादा घर के अंदर पानी बरसता था । किताबें भींग जाती थी फटे पुराने कपड़े में स्कूल जाना पड़ता था पिताजी राज मिस्त्री थे और मां दूसरों को खेत में काम करने जाया करती थी। संतोष पटेल जब अपने बचपन को याद करते हैं तब उनकी गला भर आता है । गरीबी इतनी थी कि घर में खाने को दाने नहीं होते । जब गांव में कोई मेहमान आता तो खुश होते कि उन्हें भी कुछ मिल जाएगा । पिता दूसरे के लिए महल बनाते थे लेकिन खुद का परिवार जर्जर झोपड़ी में रहते थे । बरसात आता तो पूरा परिवार कोने में दुबक जाते थे । संतोष के स्कूल की किताबें भीग जाती थी जिन्हें वह सुबह धूप में सुखाकर फिर से पढ़ने लग जाता था । गरीबों में बचपन कैसा होता है वह संतोष पटेल की दास्तान बताती है । महज 8 साल की उम्र में जब बच्चे खेलने कूदने लगते हैं तब संतोष अपनी मां पिता के साथ वन विभाग में पौधा लगाने जाया करते थे । बिना चप्पल के जंगलों में तेंदू पत्ता तोड़ने भी जाया करते थे पिता के साथ पहाड़ों पर चढ़कर शहर निकाला करता । https://hamaradallirajhara.in/wp-content/uploads/2026/07/VID-20260706-WA0008.mp4उन्होंने बताया कि दूसरे बच्चों की तरह बिस्कुट और चॉकलेट पैसो के आभाव में नहीं मिला करते थे ।लोगों के घर काम करते थे ताकि दो पैसे घर आ जाये और घर में कुछ मदद हो जाए । वे ईटा भट्टा से इट भी उठाते थे जिससे नाजुक हाथों के चमड़ी भी छील जाया करते थे और खून आने लगते थे ।भरी दोपहर में जब अपने पिता को गहरे कुवे के अंदर जाकर ईट के जुड़ाई करते देखे तब इस मासूम के कलेजा काप जा ते कि कहीं हादसा ना हो जाए । हाथों में हसिया लेकर मां कहती थी यदि नहीं पढ़ोगे तो बेटा जो जिंदगी भर हमारी तरह यही दिहाड़ी मजदूरी करनी पड़ेगी । बस वही बात इसके बेटे के मन में रह गई चुभ जाती ।https://hamaradallirajhara.in/wp-content/uploads/2026/07/VID-20260706-WA0014.mp4आठवीं के बाद जब संतोष आगे पढ़ने के लिए पटना शहर आया तो रहने के लिए कमरा ऐसा था जिसमें दीवारों पर प्लास्टर तक नहीं था कई किलोमीटर दूर से पीने का पानी सिर पर उठाकर लाना पड़ता था । आर्थिक तंगी इतनी थी कि मकान के किराए देने तक के पैसे नहीं होते थे ।जब एक समय दो लोगों के कमरे में वे उनके साथ छुपकर रह रहे थे तब मकान मालिक ने इनको डरा धमका कर कमरे से बेइज्जती करके भगा दिया । उस नन्हे बालक के मन में क्या गुजरी होगी यह ये संवेदन शील समाज कभी नहीं समझ सकता ।https://hamaradallirajhara.in/wp-content/uploads/2026/07/video_20260706_131435.mp4 बाद में भोपाल में सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन हुआ तो हो गया लेकिन लाचारी ने यहां भी पीछा नहीं छोड़ा । जहां अमीर घरों के बच्चे नए-नए कपड़े पहन कर आते तब संतोष फटा पुराना कपड़ा पहनकर आते थे । जब कॉलेज की पार्टियां होती तो उनके पास बदलने के लिए कपड़ा नहीं होते वह कॉलेज के यूनिफॉर्म को ही पहन कर वे जाते थे । https://hamaradallirajhara.in/wp-content/uploads/2026/07/VID-20260706-WA0011.mp4कहानी का सबसे दर्दनाक मोड़ 2000 में आया जब बीमारी के कारण संतोष के फेफड़ा में पानी भर गया । जिंदगी और मौत से जूझते हुए बेटे को बचाने के लिए डॉक्टर ने ₹50000 का खर्च बताया । परिवार के पास अगले दिन राशन के लिए पैसा ना हो वह ₹ 50000 कहां से लाता । परिजन काफी मिन्नतों के बाद ₹25000 के भारी भरकम ब्याज के बदले ₹10000 का कर्ज मिल सका । कर्ज का दलदल ऐसा था की बहन की शादी में परिवार पूरी तरह से टूट गया ।https://hamaradallirajhara.in/wp-content/uploads/2026/07/VID-20260706-WA0015.mp4बीटेक करने के बाद स्थिति और अधिक खराब हुई तो पिता ने हाथ जोड़ लिया बेटा अब मेरे पास एक भी रुपया नहीं है भेजने के लिए । गांव वाले भी ताने मारते थे बड़ा आया इंजीनियरिंग बनाने क्या इतना पढ़कर कलेक्टर बनाओगे ..? इसे भैंस चराने भेजो ..! संतोष की आत्मा रो पड़ी उन्होंने कसम खा ली कि जब तक खाकी वर्दी नहीं पहन लूंगा और लाल पीली बत्ती की गाड़ी नहीं मिलेगी तब तक दाढ़ी नहीं बनाऊंगा । उनका आत्मविश्वास था कि वे सिर्फ 15 महीने की कड़ी मेहनत और पुरानी किताबें पढ़कर एमपी पीएससी की परीक्षा पास कर ली । 2018 में डीएसपी बैच में सलेक्शन हो गया । जब पासिंग आउट परेड चल रहा था देश की बड़े-बड़े आदमियों के बीच पन्ना के गरीब मां-बाप अपने बेटे को पासिंग परेड देखने के लिए आए थे । उन्हें अपने बेटे की कंधे पर तीन स्टार देखना था । संतोष के मां-बाप को जब वहां मौजूद पुलिस अधिकारियों ने देखा तो उनके आंखों में आंसू छलक पड़े ।https://hamaradallirajhara.in/wp-content/uploads/2026/07/VID-20260706-WA0013.mp4 जब संतोष डीएसपी बनने के बाद पहली बार अपने सरकारी गाड़ी में बैठा और बजते सायरन के साथ अपने गांव पहुंचा तब उनकी मां खेत में मजदूरी कर रही थी । डीएसपी बेटा अपने मां के पैर छूने को झुका मां के आंसू जमीन को छू रहे थे । मन बार-बार बेटों के कंधों को निहारता क्या सचमुच में मेरा बेटा साहब बन गया है ..? https://hamaradallirajhara.in/wp-content/uploads/2026/07/VID-20260706-WA0010-1.mp4संतोष पटेल सिर्फ एक अफसर ही नहीं आज भी वे सादगी में जीते हैं 2025 में उनकी शादी रोशनी पटेल से हुई तब उन्होंने किसी लग्जरी गाड़ी में नहीं बल्कि अपने चाचा के पुराने साइकिल में बिठाकर उबर खाबड़ रोड से अपनी पत्नी को लेकर आए थे । संतोष पटेल को ड्यूटी एमपी के नक्सल प्रभावित जिला बालाघाट के हार्ड फोर्स में लगा दी थी । यह ऐसी ड्यूटी भी थी जहां अफसर को जान हथेली पर रखकर नक्सलियों से मोर्चा संभालना पड़ता था । परिवार से दूर ना तो बीमार मां को देख सकते थे और ना ही घर जा सकते थे । 17 माह तक वही ड्यूटी करते रहे । इसी दरमियान घर पर उनकी पत्नी रोशनी पटेल ने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया कि नक्सली क्षेत्र में 1 साल की ड्यूटी रहता है लेकिन मेरे पति को 17 माह हो गए हैं । सास बीमार रहती है । दवाई समय पर नहीं हो पा रहा है । मेरी जैसी कई पत्नियों है जो इंतजार कर रही है कृपया उनका ट्रांसफर किया जाए । सरकार संज्ञान में लिया और बालाघाट के जंगलों से सीधे कोतवाली एसपी के रूप में भोपाल ट्रांसफर कर दिया गया । xएएसपी संतोष पटेल की कहानी उन युवाओं के लिए उदाहरण है जो संसाधनों की कमी का रोना रोते हैं । यदि इरादों में दम हो तो एक बिस्कुट के लिए ईट ढोने वाला हाथ भी राज्य का व्यवस्था को अपने हाथों में ले सकता है ।जब उनकी पोस्टिंग बालाघाट क्षेत्र में हुआ तब पुलिस ने नक्सल मुक्त भारत क्रिकेट टूर्नामेंट का आयोजन बालाघाट के अंतिम छोर पर स्थित शक्तिझोड़ी गांव में किया था जहाँ बैगा जनजाति समाज की महिलाओं बच्चों को अनुपयोगी जल में निस्तार करते देखा तो मन व्यथित हुआ लेकिन माताओं ने सुझाव दिया कि यहाँ बोरियों में रेत भरकर पानी को रोका जा सकता है।https://hamaradallirajhara.in/wp-content/uploads/2026/07/video_20260706_131653.mp4उन्होंने बताया कि गंगा जल संवर्धन कार्यक्रम का पुण्य अवसर चल रहा था तो हमने सोचा कि क्यों न एक नया प्रयास किया जाए और जनभागीदारी से स्टॉप डैम का कार्य शुरू किया तो आज तस्वीर बदल गई।जहाँ सूखा नाला में थोड़ा सा पानी होता था अब पूरे साल पर्याप्त और स्वच्छ जल नहाने धोने के लिए उपलब्ध होगा। हमे एकल सुविधा केंद्र बालाघाट पुलिस का सहयोग और श्रमदान मिला, साथ ही बालाघाट के सामाजिक कार्यकर्ता श्री अंचल आकाश बिसेन बंधु, श्री मदन पटेल जी, श्री योगेंद्र बिसेन जी और स्थानीय सरपंच देवरबेली, बैगा जनजाति परिवारों के सहयोग से बालाघाट पुलिस प्रशासन ने एक शानदार स्टॉप डैम बनाकर तैयार करवाया। आज जब देखने के लिए पहुंचे तो बैगा जनजाति की माताएं बहने नृत्य करके जन भागीदारी के कार्य का अभिनंदन कर रही थीं। कई बार थोड़े से सामूहिक प्रयास में बड़े बड़े काम हो जाते हैं जो इतिहास बन जाते हैं। जिस गाँव में नक्सलवाद का भय होता था वहाँ आज खुशियों का माहौल है जो देखते ही बनता है।संतोष कुमार ने एक पहल भी की पुराने अनुपयोगी कपड़े को आसरा बैंक में जमा करने की अपील की जिससे जरूरमंद लोग ले जा सके।साथ ही उन्होंने छोटे-छोटे बच्चों के कपड़ों के साथ खिलौने आदि को भी जमा करने की लोगों को अपील की जिसका फायदा यह हुआ कई लोग जो गरीबी के अभाव में अपने बच्चों को खिलौने आदि नहीं दिला पाए थे उन्हें मुफ़्त में खिलौने कपड़े और बड़ों को भी कपड़े मिल गए । लोगों को जागरूक करने और समाज सुधारने का भी काम किया उन्होंने ,सहरिया आदिवासी सबसे पिछड़ी जनजाति है जो अशिक्षित होने के कारण समाज से दूर रहते हैं। ये बहन जी को ढेर सारे ऑफर दिये फिर भी पुड़िया छोड़ने का नाम नहीं ले रही। इसके पतिदेव छोड़कर भाग गए जैन उर मायके में रहकर जीवन यापन कर रही है। मज़दूरी अकेले बच्चों का पेट पालती है लेकिन 80 रुपये की पुड़िया खा जाती है। एक साल के 30 हज़ार रुपये बुरी लत में थूककर उड़ा देती है। आसपास ऐसे लोगों को समझाइश दें ताकि वो पसीने की कमाई बच्चों के भविष्य में लगायें। इनाम जीतने की प्रतियोगिता जिसके प्रश्न बहुत आसान थे फिर जवाब नहीं मिल पाये। जंगल में मेंला लगा हुआ था और रात्रि 10 बजे कुछ महिलाएं ही शेष थीं जो सूनसान जंगल में पैदल जा रही थीं। हमारी पुलिस भी वापस हो चुकी थी सिर्फ़ तीन पुलिसमैन ड्यूटी पर थे। पहले माताओं बहनों को उनको सुरक्षित स्थान तक पहुँचाया और उसके बाद अंत तक ड्यूटी पर तैनात पुलिसवालों के SP सर को नाम बताये तो कप्तान साब ने तत्काल 500-500 रुपये नगद ईनाम दिया। उन्होंने बताया कि एक बार सड़क किनारे खाकी वर्दी का ख़्वाब लिए दौड़ते हुए युवकों के संघर्ष को देखकर मन रुक गया। जब एक बंदे से पूछा कि इतनी मेहनत के लिए जोश जुनून कहा से आता है तो जवाब था कि जितना पसीना बहेगा चेहरे में उतनी ज़्यादा चमक आएगी, “ख़ुशी उस दिन होगी जब मेरी माँ वर्दी देखकर मुस्कुरायेगी।” उनके हौंसले बहुत मज़बूत लग रहे थे। उनकी माँग थी कि सड़क पर ट्रक डंफर निकलते हैं इसलिए २ स्टॉपर्स चाहिए। उनकी बात जायज़ लगी तो वहीं से एक किलोमीटर उनके साथ दौड़ लगाई और पास के हस्तिनापुर थाने से दो बेरिकेड्स दिलाये ताकि सुरक्षित व्यायाम कर सकें और अपनी मंज़िल को पा सकें। एक बार वे पेट्रोलिंग से आ रहे थे तो देखा कि रात के अंधेरे में दो लड़के केला लिए हुए चल रहे थे । उन्होंने गाड़ी रुकवाकर पूछा तो बताया कि परीक्षा देने के लिए कल जाना है ।गाड़ी नहीं मिली इसलिए पैदल चल रहे हैं पैसे कम है तो केला खरीद लिए ताकि हम लोग मिलकर खा सके । दोनों लड़ को को गाड़ी में बैठकर गंतव्य स्थान पर छोड़ा और मकान मालिक से बोलकर उनके लिए खाने की व्यवस्था अपने पैसे से की । उन लोगों से कहा कि खूब मन लगाकर पढ़ो और आगे बढ़ो । मैं चाहता हूँ कि भारत माँ आपके हरेक सपने सजा दे, पुलिस वाला बनना चाहते हो दुआ करता हूँ कि थानेदार बना दे। सपने बड़े रखें और निरंतर बड़ा बनने के प्रयास करते रहें।संतोष कुमार ने पिता के महत्व को बताते हुए कहा कि पिता के दोस्त जब पार्टी देने की बात करते हैं तब पिता कंजूस हो जाता है और जब बच्चे की बात आती है तो जादूगर बनाकर ढेर सारी पैसा निकाल लेता हैं । यह होता है पिता की बात यदि भगवान को मानते हो तो याद रखना भगवान मंदिर में कम रहता है और पिता के दिल में ज्यादा रहता है ।इसलिए उनका दिल कभी भी मत दुखाना जीवन भर उनकी सेवा करना । उनके स्वाभिमान उनके सम्मान के लिए मेहनत करना ईश्वर हमेशा आपको खुश रखेगा । उन्होंने मां की महिमा के संबंध में बताया कि मां एक पेड़ की तरह होती है , मां ऐसी होती है ,जो छाया देता है ,ऑक्सीजन देता है भोजन देती है बाकी सारे रिश्ते पतझड़ बन जाते हैं । वो हमें अपने पैरों पर खड़े करती है जब बात औलाद पर आती है तो वह मौत से भी लड़ जाती है और मौत को भी मात दे देती है यह है मां की महिमा ।संतोष कुमार बालाघाट के उन पिछड़े हुए नक्सल प्रभावित क्षेत्र में ड्यूटी करते थे साथ में सरकार के विभिन्न योजनाओं को जनता तक पहुंचाते भी थे और साइबर फ्रॉड के बारे में कई जानकारियां वे मोबाइल के माध्यम से फेसबुक यूट्यूब में डालकर लोगों को बताते थे । स्थानीय लोगों के खुशियों के मौके पर ढोल डफली के साथ नाचते गाते और इसी अंदाज में भी साइबर फ्रॉड के संबंध में लोगों को बताते थे ।जिसमें उन्होंने कहा था कि ना सिफारिश लगती है ना कोई फीस रे जब भी कोई फ्रॉड हो जाए तो डायल करो 1930 रे ।शासकीय कर्मचारी और खासकर पुलिस विभाग हर किसी का चहेता नहीं होता पुलिस विभाग की ड्यूटी आम लोग दुश्मन की तरह मानते हैं । खासकर नक्सली क्षेत्र में तो पुलिस मानो आम नागरिकों का सबसे बड़ा गुनहगार होता है । उस समय बालाघाट क्षेत्र नक्सल प्रभावित था और पुलिस के विरोध में नक्सलवादी इस तरह से लोगों के ब्रेनवास कर चुके थे के लोग उन्हें देखते ही नुकसान पहुंचाने के लिए तैयार रहते थे । पुलिस की ड्यूटी ऐसी होती थी की 24 घंटा सजग रहना पड़ता । कब कहां से किस ओर से हमला हो जाए यह नहीं कह सकते । लेकिन इसके विपरीत संतोष कुमार के व्यवहार और लोगों के प्रति मदद की भावना ने वहां के आम नागरिकों पर ऐसा जादू किया कि जब वह बालाघाट से भोपाल प्रमोशन होकर आए तो लोगों के आंखों में आंसू आ गए । लोगों ने कहा हम साहब को जाने नहीं देना चाहते अगर हमारे हाथ में रोकना होता तो यही रोक लेते । उनका अपनापन को हम कभी नहीं भूल पाएंगे , उनकी तरह के अधिकारी मिलना मुश्किल है । आदिवासी भी उन्हें अपने बीच का व्यक्ति मानते थे विभिन्न कार्यक्रम में उन्हें अतिथि के रूप में बुलाते थे । बालाघाट से विदा होते हुए उन्होंने उनके रंग रूप में ढल कर नाचते हुए कहा कि आदिवासियों की पहचान है ,जल जंगल और पीली साफी रे ..!अगर मुझसे कोई गलती हुई हो ,तो हाथ जोड़कर मांगता हूं माफी रे !! वे प्रतिभा का भी सम्मान करते थे । अक्षरा गोड़ेश्वर नाम की एक लड़की मध्य प्रदेश हाई स्कूल परीक्षा में 500 में से 498 अंक लाकर प्रदेश में द्वितीय स्थान पर आई थी । एक कार्यक्रम में उनका सम्मान किया जाना था । इस बीच लड़की के बारे में उद्घोषक ने बताया कि पिता की मृत्यु हो चुकी है भाई भी इस दुनिया में नहीं है मां अकेली मेहनत मजदूरी कर इन्हें पढ़ाई है । जिसके बदौलत यह लड़की पूरे प्रदेश में द्वितीय स्थान लेकर आई है वे अतिथि के बतौर एसपी सर के साथ वहां पहुंचे थे । तब उन्होंने कहा कि इस बेटी की महत्वाकांक्षा बहुत बड़ी है आप सब इस बेटी के लिए मदत करिए कि आगे पढ़ सके । इसके लिए मैं आप सभी से अपना झोली फैला कर मदद की गुहार लगाता हूं । बस उनका बोलना था जिस किसी के पास जो था सब दे दिए लगभग 36000 रुपए की राशि एकत्र हुए जिसे उन्होंने अक्षरा गोड़ेश्वर को पढ़ाई करने के लिए दिए तथा यह भी कहा जब भी जरूरत पड़े तो मदद के लिए आवश्यक फोन करना मैं आपकी मदद करने अवश्य आऊंगा ।उन्होंने बताया कि कई बार स्थिति ऐसा आता है युवा वर्ग परीक्षा में असफल हो जाते हैं और हार मान लेते हैं उस पर उन्होंने कहा कि असफलता बुरी चीज है लेकिन उम्मीद बड़ी चीज है ।असफलता किसी को अस्पताल पहुंचा देती है या किसी को आसमान पहुंचा देती है लेकिन उम्मीद नई ऊंचाइयां देती है । उम्मीद उम्दा इंसान बना देती है बार-बार फैल होने के बाद जो हर बार प्रयास करता है वह भले ही परीक्षा में फैल हो जाए लेकिन जीवन में अच्छा इंसान बना देती है । जो संघर्ष करता है अपनी संघर्ष को जारी रखिए और भी दिन आएंगे आपको सफलता अवश्य मिलेगी ।जब उँगलियाँ मुट्ठी बन जाती हैं तो ताक़त दिखती है। यही हुआ कुछ दिन पहले पुलिस ने नक्सल मुक्त भारत क्रिकेट टूर्नामेंट का आयोजन बालाघाट के अंतिम छोर पर स्थित शक्तिझोड़ी गांव में किया था जहाँ बैगा जनजाति समाज की महिलाओं बच्चों को अनुपयोगी जल में निस्तार करते देखा तो मन व्यथित हुआ लेकिन माताओं ने सुझाव दिया कि यहाँ बोरियों में रेत भरकर पानी को रोका जा सकता है।गंगा जल संवर्धन कार्यक्रम का पुण्य अवसर चल रहा था तो हमने सोचा कि क्यों न एक नया प्रयास किया जाए और जनभागीदारी से स्टॉप डैम का कार्य शुरू किया तो आज तस्वीर बदल गई। जहाँ सूखा नाला में थोड़ा सा पानी होता था अब पूरे साल पर्याप्त और स्वच्छ जल नहाने धोने के लिए उपलब्ध होगा। हमे एकल सुविधा केंद्र बालाघाट पुलिस का सहयोग और श्रमदान मिला, साथ ही बालाघाट के सामाजिक कार्यकर्ता श्री अंचल आकाश बिसेन बंधु, श्री मदन पटेल जी, श्री योगेंद्र बिसेन जी और स्थानीय सरपंच देवरबेली, बैगा जनजाति परिवारों के सहयोग से बालाघाट पुलिस प्रशासन ने एक शानदार स्टॉप डैम बनाकर तैयार करवाया। आज जब देखने के लिए पहुंचे तो बैगा जनजाति की माताएं बहने नृत्य करके जन भागीदारी के कार्य का अभिनंदन कर रही थीं। कई बार थोड़े से सामूहिक प्रयास में बड़े बड़े काम हो जाते हैं जो इतिहास बन जाते हैं। जिस गाँव में नक्सलवाद का भय होता था वहाँ आज खुशियों का माहौल है जो देखते ही बनता है ।साल पुरानी समस्या जिसमें 38 पुलिस वालों को मारा गया जबकि सामने वाले दुश्मन गिनती के या कम संख्या में मारे गए थे। जिससे भी सवाल करो कि 31 मार्च 2026 तक नक्सल मुक्त मध्यप्रदेश हो जाएगा क्या? तो जवाब असंभव होता था और मैं भी यही कहता था लेकिन 11 जून को बालाघाट में एक जवान आईपीएस अधिकारी की एंट्री हुई जिनके आते ही चार बंदूक धारी माओवादी एनकाउंटर में मार गिराये गए और दहशत के कारण 31 मार्च की जगह 11 दिसंबर को 4 माह पहले ही मध्यप्रदेश नक्सल मुक्त हो गया।ये हो गई वर्दी की सख्ती वाली ड्यूटी लेकिन इसके अतिरिक्त आईपीएस आदित्य मिश्रा सर ने जंगल में बसे आदिवासी गांवों के लिए एकल सुविधा केंद्र खोले जहाँ एम्बुलेंस से गांव में ही इलाज, जिनकी आँखों को रोशनी चली गई उनका ऑपरेशन कराया, आधार कार्ड, जाति प्रमाण पत्र बनवाये, जमीन के पट्टे दिलवाए और अगर किसी आदिवासी भाई का मोबाइल चोरी हुआ तो उसे ढूंढ़वाया जबकि उन्हें थाने या तहसील जाने की जरूरत नहीं पड़ी।अभी पूरे मध्यप्रदेश में बेरोजगार युवा भटक रहे थे क्योंकि एमपी पुलिस में बैंड भर्ती का फॉर्म भरा था ।लेकिन सिखाने वाले नहीं थे सर ने फ्री में ऑफर दिया तो यूपी बिहार राजस्थान सभी जगह से लड़के सीखने आ रहे हैं।Safe click न तो आपको मूर्ख बनने देगा और न ही खाता खाली होने देगा… कई बार समझाने के बाद भी एक लड़के को पुराने सिक्के बेचकर 30 लाख देने के चक्कर में जाल में फँसा लिया। ट्रेक्टर बने हुए पुराने नोट के बदले सरकार से 3000000 रुपये मिल रहे हैं इस लालच में पहले आधार कार्ड फिर रजिस्ट्रेशन फीस मांगी गई। उसके बाद अगले दिन पैसे लेकर आ रही टीम को एयरपोर्ट में रोक लिए है और 3000 रुपये माँग रहे हैं। ऐसा करके 10-20000 रुपये ठग लिए गए। जब मेरे पास फ़ोन आया तो मैं फिर से आप सभी को बता रहा हूँ कि यदि मेरी फोटो और नाम लिखकर पुराने सिक्के खरदीने बेचने की कोई बात कर रहा है तो ये फ्रॉड है। अभी मध्यप्रदेश पुलिस का सेफ क्लिक अभियान चल रहा है जिसके उद्देश्य यही सिखाना है कि ग़लत, गुमराह और गपलेबाज़ी वाली लिंक, लालच को समझें और सुरक्षित रहें। खाते से पैसे कटने के बाद 1930 पर कॉल करें। यदि फ़ोन न उठायें तो cybercrime.gov.in पर जाके रिपोर्ट करें।उन्होंने बताया कि सड़क में दुर्घटना में घायल हुए व्यक्तियों को सरकारी योजना के अंतर्गत अस्पताल पहुंचने पर राज्य सरकार की ओर से₹25000 की नगद पुरस्कार दी जाएगी इसके लिए थाने में सूचना देना आवश्यक है । DSP संतोष पटेल का बालाघाट से भोपाल के लिए विदाई के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में उस समय विशेष उत्साह देखने को मिला, जब लांजी विधायक राजकुमार कर्राहे कार्यक्रम में शामिल होने पहुंचे। बैगा जनजाति परिवारों ने पारंपरिक अंदाज में उनका स्वागत करते हुए उन्हें सजी-धजी बैलगाड़ी पर बैठाया। रंग-बिरंगी सजावट और जनजातीय संस्कृति की झलक से सुसज्जित बैलगाड़ी आकर्षण का केंद्र बनी रही। इस अनोखी प्रस्तुति ने कार्यक्रम में मौजूद लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया और स्थानीय संस्कृति तथा परंपरा के प्रति सम्मान का संदेश भी दिया। कार्यक्रम के दौरान उपस्थित लोगों ने इस पारंपरिक स्वागत की सराहना की। उन्होंने अपने स्मरण में बताया कि ऊपर से बारिश की बूंदें गिर रहीं थी और अम्मा ने धोती के छोर से कुछ निकाला और मेरी हथेली में रख दिया। किसी ने दौलत किसी ने इज्जत कमाई, जो खर्च न हो हमारे हिस्से में वो दुआ आई। बैगा जनजाति के बुजुर्ग अम्मा बाबा ने कभी पैर नहीं छूने दिए क्योंकि ये लोग ज्यादातर राम राम करते हैं या सेवा जोहार बोलते हैं। जब मैंने उनके पैर छुए तो उन्होंने मेरे पैर दूर से ही सही लेकिन परने को कोशिश की। जब गांव से गाड़ी में बैठकर निकलने लगा तो पहली बार सिर पे हाथ फेरा, यही मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी कमाई बन गई जो अमर रहेगी और मेरे सफर को सेवाभाव में बदलेगी।यह छोटी सी कहानी है गरीबों की मार झेलते हुए एएसपी बने संतोष कुमार पटेल की। अक्सर हम देखते हैं पद और प्रतिष्ठा पाते ही लोगों की अहम उनसे सौ गुना आगे बढ़ जाती है उसके विपरीत संतोष कुमार पटेल ने लोगों से मेल मिलाप किया उनके रंग में रंग गए पुलिस प्रशासन और आम जनता के बीच कड़ी जोड़ने का जो उन्हें उन्होंने काम किया है वह सभी प्रशासनिक अधिकारियों के लिए एक उदाहरण है ।एसपी संतोष कुमार पटेल की कहानी हमें बहुत कुछ सीखने को मिलती है । वह डीएसपी बनने के बाद अपने गांव गए तो वहां उन्होंने अपने गुरु जनों जिन्होंने बचपन में उन्हें पढ़या उनका सम्मान किया जब भी बहुत बीमार पड़े थे तब उन्हें खून देने वाले सफाई कर्मचारी के घर जाकर उनकी बेटियों से भी मिला उन्हें मदद का आश्वासन दिया।नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने के कारण नक्सलियों ने झंडा फहराने पर मौत के घाट उतार देने की फरमान जारी किया था लेकिन जिस शिक्षक ने हिम्मत करके स्कूल में झंडा फहराया उनका भी सम्मान किया । उनके स्कूलों में जाकर बच्चों को काफी पेन दिए । बच्चों को पढ़ने के लिए नदी पार कर स्कूल लाने वाले शिक्षक का सम्मान किया।अंत में जब बालाघाट से भोपाल ट्रांसफर होकर आना था उस समय अपने साथ सारथी की भूमिका निभाने वाले ड्राइवरो का भी सम्मान किया । यह एक संवेदनशील इंसान की कहानी बनती है जो अपने जीवन के समक्ष में जो भी मदद किया उन्हें भूले नहीं । साथ ही उन्होंने हमेशा साइबर अपराध के विभिन्न पहलू से लोगों को बचने के लिए हमेशा फेसबुक और विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से लोगों को सजक करते रहते हैं ।आज के संडे मेगा स्टोरी में बस इतना ही।भोजराम साहू संपादक हमारा दल्ली राजहरा एक निष्पक्ष समाचार चैनल 9893765541Spread the lovePost navigationशहीद अस्पताल दल्ली राजहरा में सिकल मित्र सम्मेलन: 107 सिकल सेल योद्धाओं ने लिया भाग । पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई को लौह अयस्क समूह दल्ली-राजहरा ने दी “भावभीनी श्रद्धांजलि”..!