दल्ली राजहरा सोमवार 03 जुलाई 2026 भोजराम साहू 9893 765541

 

 हॉस्पिटल सेक्टर शिव मंदिर में 14वें वर्ष से चल रहा विशेष आयोजन, ब्रह्म मुहूर्त से देर रात तक भक्ति में लीन श्रद्धालु

 

सावन के प्रथम सोमवार को लौह नगरी दल्ली राजहरा पूरी तरह शिवमय हो गई। सुबह से ही शहर के हर मोहल्ले, गली और चौराहे पर ओम नमः शिवाय और हर हर महादेव के जयकारे गूंजते रहे। श्रद्धालु हाथों में जल, बेलपत्र और फूल लेकर मंदिरों और शिवालयों की ओर चलते दिखाई दिए।

 

इस बार सावन की शुरुआत पर मंदिरों में पहले जैसी भीड़ देखने को नहीं मिली। इसका कारण यह है कि अब शहर में जगह-जगह शिवलिंग की स्थापना हो चुकी है। लोग अपने घर के पास ही बने शिवालयों में जाकर भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक कर पूजा-अर्चना कर रहे हैं। मान्यता है कि सावन और बरसात का अनोखा रिश्ता है, लेकिन इस बार प्रथम सोमवार को आकाश से जल नहीं बरसा, फिर भी भक्तों की श्रद्धा में कोई कमी नहीं आई।

दल्ली राजहरा के प्रसिद्ध हॉस्पिटल सेक्टर स्थित शिव मंदिर में सावन माह को लेकर विशेष आयोजन किए जा रहे हैं। यह परंपरा पिछले 14 वर्षों से लगातार चली आ रही है। मंदिर के पुजारी गौतम गिरी गोस्वामी ने बताया कि सावन के प्रत्येक सोमवार को ब्रह्म मुहूर्त में सुबह 3 बजे से 6 बजे तक रुद्राभिषेक किया जाता है। दोपहर 12 बजे पार्थिव शिवलिंग बनाकर विधि-विधान से स्थापना की जाती है। इसके बाद गौरी-शंकर महिला मानस मंडली द्वारा 108 बार शिव चालीसा का पाठ किया जाता है। संध्या 4 बजे से प्रतिदिन रामचरित्र मानस का पाठ भी होता है।

गौरी-शंकर महिला मानस मंडली पूरे सावन मास में संध्या 4 बजे रामचरित्र मानस का पाठ कर रही है। मंदिर परिसर भजन, कीर्तन और मंत्रोच्चार से गुंजायमान हो रहा है। पुजारी गौतम गिरी गोस्वामी स्वयं शिव चालीसा पाठ और भगवान शिव का अभिषेक करा रहे हैं।

पूजा विधि के बारे में जानकारी देते हुए पुजारी ने बताया कि भगवान शिव भोले हैं और भक्त के भाव को सबसे अधिक महत्व देते हैं। फिर भी रुद्राभिषेक को विशेष महत्व दिया जाता है। विधि के अनुसार पहले शुद्ध जल से शिवलिंग का अभिषेक किया जाता है। इसके बाद क्रमशः गंगाजल, दूध, दही, शक्कर, घी और शहद अर्पित किए जाते हैं। फिर पुनः शुद्ध जल से स्नान कराकर पीले या सफेद चंदन का लेप लगाया जाता है। बेलपत्र, सफेद फूलों की माला और अक्षत चढ़ाने के बाद देसी घी का दीपक और धूप जलाई जाती है। अंत में ओम नमः शिवाय और महामृत्युंजय मंत्र का जाप कर आरती की जाती है और भोग अर्पित किया जाता है। पूजा में कोई त्रुटि रह गई हो तो क्षमा याचना कर भगवान से आशीर्वाद लिया जाता है।

हिंदू धर्म में सावन मास और महादेव का संबंध अत्यंत गहरा है। यह पूरा महीना भगवान शिव को समर्पित माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार सावन में ही समुद्र मंथन के दौरान निकले हलाहल विष को भगवान शिव ने अपने कंठ में धारण कर सृष्टि की रक्षा की थी। विष की उष्णता को शांत करने के लिए भक्त आज भी शिवलिंग पर जल अर्पित करते हैं। इसी कारण उन्हें नीलकंठ कहा जाता है।

एक अन्य कथा के अनुसार माता पार्वती ने शिव को पति रूप में पाने के लिए सावन मास में कठोर तपस्या की थी और इसी माह में उन्हें महादेव प्राप्त हुए। इसलिए यह महीना शिव को अत्यंत प्रिय है। मान्यता है कि देवशयनी एकादशी के बाद भगवान विष्णु चार माह के लिए योग निद्रा में चले जाते हैं और शिव रुद्र रूप में रहते हैं। रुद्र रूप में वे शीघ्र प्रसन्न भी होते हैं और रुष्ट भी। इसी कारण सावन में रुद्राभिषेक कर उन्हें शांत और प्रसन्न किया जाता है।

 

सावन में कांवड़ यात्रा का भी विशेष महत्व है। भक्त पवित्र नदियों से जल लाकर महादेव का अभिषेक करते हैं। पुराणों में लंकापति रावण को प्रथम कांवड़ यात्री माना जाता है। प्राकृतिक जल स्रोतों से लाया गया जल शिवलिंग पर चढ़ाना इस माह में सबसे शुभ माना गया है।

 

सावन के पहले सोमवार को दल्ली राजहरा के कोने-कोने में भक्ति का प्रवाह दिखा। लोग परिवार सहित मंदिर पहुंचे और शहर, प्रदेश और देश की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना की।
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Bhojram Sahu

By Bhojram Sahu

प्रधान संपादक "हमारा दल्ली राजहरा: एक निष्पक्ष समाचार चैनल"

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