दल्ली राजहरा शनिवार 29 अगस्त 2026 भोजराम साहू 9893 765541

 

 बस्तर में नक्सलवाद के खत्म होने की उम्मीद के बीच लोगों को भरोसा था कि अब जल, जंगल, जमीन, वन संपदा और खनिज संसाधनों का उपयोग बस्तर वासियों के विकास के लिए होगा। लेकिन छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा / छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ दल्ली राजहरा ने आरोप लगाया है कि सरकार एक तरफ बस्तर के उत्थान की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर कॉर्पोरेट घरानों के लिए बस्तर को खोलने की तैयारी की जा रही है।

 

मोर्चा का कहना है कि बस्तर क्षेत्र में बड़े पैमाने पर जमीन और प्राकृतिक संसाधनों को लेकर सर्वे की प्रक्रिया सरकार की ओर से कराई जा रही है। इससे आशंका है कि विकास और उद्योग के नाम पर बस्तर की जमीन बड़े कॉर्पोरेट समूहों को सौंपने का रास्ता तैयार किया जा रहा है। संगठन ने सवाल उठाया कि यदि विकास का केंद्र बस्तर की जनता है तो फैसलों में स्थानीय आदिवासियों और ग्राम सभाओं की भूमिका निर्णायक क्यों नहीं है?

 

खनिज कानून में बदलाव को लेकर भी सवाल

छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष जनक लाल ठाकुर ने केंद्र सरकार की खनिज नीति पर गंभीर सवाल उठाए। संगठन का कहना है कि खनिज विकास से जुड़े अधिकारों को राज्यों से दूर कर केंद्र के अधीन करने की कोशिश संघीय ढांचे और खनिज संपदा वाले राज्यों के हितों के लिए चिंता का विषय है।

 

मोर्चा के अनुसार यदि खनिज विकास विनियमन अधिनियम, 1957 में ऐसा बदलाव किया जाता है जिससे खनिजों से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय केंद्र के हाथों में अधिक केंद्रीकृत हो जाएं, तो इसका सीधा असर छत्तीसगढ़ और विशेषकर बस्तर पर पड़ेगा। संगठन का आरोप है कि केंद्र खनिजों से जुड़े फैसले दिल्ली में केंद्रीकृत कर बड़े उद्योग समूहों के लिए संसाधनों तक पहुंच आसान बनाने की दिशा में बढ़ रहा है।

 

अरबों का राजस्व, फिर भी खनिज नगर दल्ली राजहरा बदहाल

छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ के अध्यक्ष सोमनाथ उइके ने कहा कि 2006 से 2012 तक 6 अरब की राशि जिला खनिज न्यास निधि (DMF) बालोद में दल्ली राजहरा और आस-पास के क्षेत्रों के विकास के लिए आई थी, जिसका 1% भी विकास कार्य में नहीं लगा। डौंडी ब्लॉक की 67 ग्राम पंचायतों ने इस पर संज्ञान लिया और जिला स्तर पर चर्चा भी हुई, लेकिन प्रशासन ने ध्यान नहीं दिया।

उन्होंने कहा कि दल्ली राजहरा से लेकर बस्तर के कई कोनों तक कुकुरमुत्ते की तरह संसाधनों का दोहन शुरू हो गया है। अनुमान के अनुसार 180 जगहें चिन्हांकित की गई हैं जहां से संसाधन निकाले जाने हैं, जिनमें से 50% जगहों पर उत्खनन शुरू हो चुका है, लेकिन उन क्षेत्रों का विकास जस का तस है।

संगठन ने कहा कि राज्य सरकारों के पास खनिज विकास से जुड़े अधिकार रहने के बावजूद अनेक खनिज और औद्योगिक क्षेत्रों में आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सड़क, बिजली, पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं की स्थिति संतोषजनक नहीं है।

 

बस्तर का विकास चाहिए, संसाधनों की नीलामी नहीं

 

छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा ने कहा कि बस्तर में विकास का मतलब केवल उद्योग और खनन नहीं हो सकता। विकास का पहला अधिकार उस जमीन के लोगों का होना चाहिए, जहां से संसाधन निकाले जा रहे हैं।

मोर्चा ने मांग की कि बस्तर में जमीन, जंगल और खनिज संसाधनों से जुड़े किसी भी बड़े निर्णय से पहले ग्राम सभाओं, आदिवासी समाज और स्थानीय जनता के अधिकारों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।

 

संगठन ने कहा कि “बस्तर का जल, जंगल, जमीन और खनिज संपदा किसी कॉर्पोरेट घराने की संपत्ति नहीं, बल्कि वहां की जनता की प्राकृतिक विरासत है।”
Spread the love
Bhojram Sahu

By Bhojram Sahu

प्रधान संपादक "हमारा दल्ली राजहरा: एक निष्पक्ष समाचार चैनल"

You missed

error: Content is protected !!