दल्ली राजहरा मंगलवार 29 सितंबर 2026 भोजराम साहू 9893 765541

 

साहित्य जगत की महान विभूति, दल्ली-राजहरा की शान, जिनकी गिनती राष्ट्रीय ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होती है… शांत और मधुर आवाज, 81 वर्ष की उम्र और आज भी साहित्य के प्रति उतनी ही रुचि और लगाव जितना लड़कपन में होता है। साहित्य जगत हो या समाजसेवा, कभी पीछे नहीं रहीं। कॉलेज की पूर्व प्रोफेसर, आंगनबाड़ी की शुरुआत करने वाली, प्रौढ़ शिक्षा में उल्लेखनीय योगदान देने वाली महान विभूति का नाम है डॉ. शिरोमणि माथुर।

आज उनके 81वें जन्मदिन पर हमारा दल्ली राजहरा निष्पक्ष समाचार ने उन्हें बधाई दी और उनके जीवन के अविस्मरणीय पलों पर चर्चा की।

प्रश्न 1 – माताजी, आज आपका 81वां जन्मदिन है। जीवन की इस गौरवमयी यात्रा को आप कैसे देखती हैं? इस पड़ाव पर कैसा महसूस कर रही हैं? जीवन की संतुष्टि को लेकर क्या कहेंगी..?
उत्तर – जीवन के इस अंतिम पड़ाव में मुझे किसी भी चीज की चिंता नहीं है। मुझे लगता है कि मैंने जो चाहा वह मुझे मिला, चाहे मेरा व्यक्तिगत जीवन हो या मेरी सामाजिक जीवन हो या साहित्य जीवन हो, मुझे हर तरफ से संतुष्टि है। मैं अपने जीवन से संतुष्ट हूं, जो कर पाई। और अपेक्षाएं तो इतनी है कि आदमी कभी संतुष्ट नहीं हो सकता, लेकिन समाज में जो मुझे जरूरत से ज्यादा दिया, उसके लिए मैं आभारी हूं।

 

प्रश्न 2 – माताजी, आपका एक लेखिका से अंतर्राष्ट्रीय लेखिका तक का सफर… सबसे बड़ी चुनौती क्या रही? और आपको विश्व स्तर पर पहचान कैसे मिली …?
उत्तर – एक तो मैं इसे चुनौती के रूप में कभी स्वीकार नहीं किया। मन के भावनाओं को लिख लेना मेरी मजबूरी थी। बचपन में शुरू से मैं लिखती थी, बंगाली क्लब के पुस्तक में हर वर्ष नवरात्रि में मेरा लेख छपता था। गगन सर मुझे प्रेरणा देते थे लेकिन मैं नजरअंदाज कर देती थी। बड़े बेटे के निधन के बाद मैं टूट गई और अपने आप को तन्हाई से दूर करने के लिए साहित्य को अपना लिया। ‘अर्पण’ पुस्तक के नाम से लेख को प्रकाशित किया। उसके बाद कुछ युवाओं के आग्रह पर राजहरा के इतिहास को लिपिबद्ध तरीके से लिखी। ट्रेड यूनियन, राजहरा का निर्माण, व्यापारी वर्ग, राजहरा कैसे बना, विकास कैसे हुआ, राजहरा की स्थापना के बारे में जिसे बहुत सारे लोगों से मिली। इसे मैं शोध ग्रंथ के रूप में लिखी। यहां के आदिवासी संस्कृति से प्रभावित हुई, यहां के ट्रेड यूनियन की शुरुआत, शिक्षा की जानकारी पूरी लिपिबद्ध कर लिखी। मैंने माइंस उत्खनन के बाद जो जलवायु प्रभावित होता है, आदिवासी कल्चर से छेड़छाड़ होता है, विकास अपने साथ बहुत कुछ अच्छाइयां लाता है तो कमियां भी लाता है, उन सब को लिपिबद्ध किया। इसलिए यह पुस्तक अपने आप में अंतर्राष्ट्रीय स्तर के खनिज पदार्थ और उत्खनन के लिए बहुत महत्वपूर्ण मानी गई और इसी पुस्तक पर मुझे गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड और वर्ल्ड वाइड बुक के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

 

प्रश्न 3 – माताजी, आपके जीवन की प्रथम पुस्तक कौन सी थी और अब तक की सबसे प्रिय पुस्तक या रचना कौन सी है, जो आपके दिल के सबसे करीब है..?
उत्तर – उन्होंने बताया कि मेरा प्रिय पुस्तक जिस पर मैंने मेहनत की है, वह ‘मेरा दल्ली राजहरा’ है। इसके साथ-साथ मैं आपको बताती हूं, मेरी रुचि आध्यात्मिक है, इसलिए मैंने दोहों पर लिखना चालू किया। अब तक 16,000 दोहे लिख चुकी हूं, जिनमें से 13,500 दोहे प्रकाशित हो चुके हैं, 2500 दोहे प्रकाशित होना बाकी है। आत्म संतुष्टि की दृष्टि से देखा जाए तो मेरे आध्यात्मिक दोहे हैं। ऐसी भावना तो मैं राजहरा को अपना घर समझती हूं, जिस तरह एक महिला अपने घर को सजाती है, वैसे ही शुरू से मेरी इच्छा रही कि राजहरा मेरा घर है। यहां के बच्चों के लिए आंगनबाड़ी नहीं थी, तब यहां के बच्चों को आंगनबाड़ी बनाकर ज्ञान दिया, प्रौढ़ शिक्षा के समय बहुत सारी सेवाएं दी, नगर के विकास में भी सेवाएं दी, जिससे ‘मेरा दल्ली राजहरा’ मुझे बहुत पसंद है।

 

प्रश्न 4 – माताजी, महिला सशक्तिकरण को लेकर आपके क्या विचार हैं? आज की महिलाओं को, हमारी बहन-बेटियों को आप क्या संदेश देना चाहेंगी?
उत्तर – हमने जिस जमाने में पढ़ाई की, उस जमाने में महिलाओं को नहीं पढ़ाते थे, लड़कों को ही पढ़ाते थे, लड़कियों को नहीं पढ़ाते थे। मेरा जन्म ग्रामीण परिवेश में हुआ, मां की रुचि थी, उसने हमें पढ़ाया और हम लोगों ने भी दिल लगाकर पढ़ाई की। तब और आज के परिवेश में बहुत अंतर है। 1964 में मैंने ग्रेजुएशन की, उस समय मानसिक सोच अलग थी। आज के परिवेश में लड़कियां और उनके परिवार की मानसिकताएं अलग हैं और इसी का कारण है ज्यादा भौतिकता के चक्कर में हम परिवार के बीच में संतुलन नहीं बना पा रहे हैं और परिवार असंतुलित हो रहे हैं। मेरा मानना है, महिलाओं को अपना घर सजाना चाहिए। पढ़ाई और संस्कार बहुत जरूरी हैं। शिक्षा के क्षेत्र में सब कुछ अधूरा है। हमारी बहन और बेटियों को अपने घरों में संतुलन बनाना चाहिए, अपने पति, अपने बच्चे, अपने घर परिवार सबके बीच संतुलित व्यवहार रखें, सबसे प्यार करें, प्यार के बिना सब कुछ अधूरा है।

 

प्रश्न 5 – माताजी, अब तक आपकी कितनी पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं? लेखन के किन-किन क्षेत्रों में आपने काम किया है?
उत्तर -अब तक मैंने कई क्षेत्र में, लिखने के हर क्षेत्र में प्रयास किया है। कविताएं, कहानी, अब तक मेरे 7 दोहे संग्रह प्रकाशित हो चुकी हैं, दो कहानी संग्रह, ‘मेरा दल्ली राजहरा’ और ‘अर्पण’ जैसे कई पुस्तक प्रकाशित हो चुकी हैं और 100 से अधिक पुस्तकों में मैं सह-लेखिका हूं और कई अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं छपती हैं।

 

प्रश्न 6 – माताजी, आपकी रचनाओं में मैंने पढ़ा कि युवा वर्ग नशा की ओर दौड़ रहा है, अपनी दिशा से भटक रहा है। इस पर आप क्या संदेश देना चाहेंगी, ताकि युवा वर्ग अपने देश और अपने परिवार की जिम्मेदारी की ओर वापस लौट चले..?
उत्तर – मेरी कविता में चिंतन किया जाए तो मेरा पूरा साहित्य इसी क्षेत्र में है। हम जब तक इंसान ना बन जाएं, तब तक हमारा जीवन सफल नहीं होगा। अति भौतिकता और अति फैशन के चक्कर में हम और हमारे युवा पीढ़ी भटक रही है। मेरा बेटों और बेटियों से यही निवेदन है कि अपना घर, अपना परिवार पहले देखो और अपनी जिम्मेदारी समझो। अति भौतिकता और अति मित्रता के साथ दौड़ना और गलत लोगों की संगति का परिणाम बहुत ज्यादा खराब होता है। आज समाज भटक रहा है, हत्याएं, आत्महत्याएं हो रही हैं, लड़ाई-झगड़ा बढ़ रहे हैं, आपसी क्लेश बढ़ रहा है, यह शुभ संकेत नहीं है। मैं चाहती हूं कि लोग आपस में प्रेम से रहें, यही देखकर मेरा मन कभी-कभी बहुत दुखी हो जाता है।

 

प्रश्न 7 – माताजी, आज आपके जन्मदिन पर पूरा साहित्य जगत आपको बधाई दे रहा है। आप अपने पाठकों, चाहने वालों और परिवार को क्या आशीर्वाद और संदेश देना चाहेंगी?
उत्तर – मैं चाहती हूं कि लोग सब आपस में मिलजुल कर रहें। राजहरा की पहचान खनिज से तो है ही, लेकिन यहां का प्रेम, यहां की वाणी, संदेश लोगों को खींचता रहा है। आज भी दल्ली राजहरा के लड़के यहां से बाहर जाते हैं तो दल्ली राजहरा से प्रेम करते हैं, वह अपने घरों की फोटो और यादों को मंगवाते हैं। आज राजहरा में जो प्रेम मिलता है, वह कहीं और नहीं मिलता।

 

_सदा दुआएं दीजिए, काम दुआएं आए,_
_पैसे से  मिलती दुआ, दुआ ना हाट बिकाय।_

 

मैं यही चाहती हूं कि हमारे बेटा-बिटिया, भाई-बहन आपस में प्रेम से रहें।

 

प्रश्न 8 – माताजी, एक कहावत है, जो लोग बाहर से दल्ली राजहरा आते हैं, वह कहते हैं कि राजहरा एक ऐसी नगरी है, जो एक बार राजहरा आ गया, वह दोबारा यहां से जाना नहीं चाहता, क्योंकि दल्ली राजहरा में अपनापन और प्रेम मिलता है। राजहरा के बारे में आप क्या कहना चाहेंगी?
उत्तर – बिल्कुल सच कहा आपने, लोग बिल्कुल सही बोलते हैं। मैं राजहरा से बहुत प्रभावित हूं। लोग कहते हैं कि ‘शिरोमणि माथुर है तो राजहरा है और राजहरा है तो शिरोमणि माथुर है।’ मेरी हर रचनाओं में दल्ली राजहरा जुड़ा है, मेरी हर कहानी में आपको दल्ली राजहरा का जिक्र अवश्य मिलेगा। मैं जीती हूं तो दल्ली राजहरा के लिए और मेरी हर सांसों में दल्ली राजहरा बसी है।
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Bhojram Sahu

By Bhojram Sahu

प्रधान संपादक "हमारा दल्ली राजहरा: एक निष्पक्ष समाचार चैनल"

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