दल्ली राजहरा शनिवार 17 अक्टूबर 2026 भोजराम साहू 9893 765541

लौह नगरी दल्ली राजहरा इन दिनों मां शक्ति की आराधना में पूरी तरह से डूबा हुआ है। भोर से लेकर देर रात तक जगह-जगह माता के सेवा गीत गूंज रहे हैं और पंडालों में दर्शन करने वालों की भारी भीड़ लगी हुई है। विभिन्न रूपों में विराजी मां दुर्गा के श्रृंगार का तो कोई मुकाबला ही नहीं है।
बालोद जिले का सबसे बड़ा शहर होने के साथ-साथ दल्ली राजहरा को सबसे अधिक दुर्गा स्थापना का भी गौरव प्राप्त है। इस उत्सव में नगरवासी करोड़ों रुपए मां की सेवा में व्यय करते हैं।

 

आइए जानते हैं दल्ली राजहरा के 5 सबसे प्रमुख और ऐतिहासिक दुर्गा पंडालों के बारे में –

 

🔱 प्रथम स्थान – 68 साल पुराना इतिहास

नगर में सर्वप्रथम मां दुर्गा स्थापना का श्रेय रविंद्र ग्रंथागार, बंगाली समाज के राजहरा सार्वजनिक दुर्गा उत्सव समिति को जाता है। इस बार ये अपना 68 वां स्थापना वर्ष मना रहे हैं। षष्ठी के दिन से यहां मां दुर्गा भगवान गणेश, कार्तिकेय, मां सरस्वती एवं रिद्धि-सिद्धि के साथ स्थापित होती हैं। इसकी स्थापना राजहरा की खदानों में काम करने आए बंगाली समाज द्वारा की गई थी। इसे देखने के लिए रिटायरमेंट के बाद शहर छोड़ चुके अधिकारी-कर्मचारी भी सपरिवार दर्शन करने आते हैं।

🔱 द्वितीय स्थान – साइडिंग का 54 साल पुराना उत्सव
दूसरे नंबर पर है वार्ड क्रमांक 20, साइडिंग का दुर्गा उत्सव जो अपना 54 वां स्थापना वर्ष मना रहा है। यहां मां दुर्गा की स्थापना भिलाई स्टील प्लांट के लिए मालगाड़ी में आयरन ओर भरने वाले कर्मचारियों द्वारा शुरू की गई थी। इन्हीं कर्मचारियों ने प्रतिवर्ष दशहरा उत्सव और 26 जनवरी की ऐतिहासिक मंडई की भी शुरुआत की थी, जिसे आज की पीढ़ी भी जारी रखे हुए है।

✨ आकर्षण का केंद्र – नौ कन्या भोज
वार्ड पार्षद रोशन पटेल ने बताया कि लोडिंग साइडिंग का नौ कन्या भोज आकर्षण का केंद्र रहता है। यहां श्रद्धालु और मन्नत मांगने वाले जमीन पर लेट जाते हैं और नौ कन्या भोज करने वाली कन्याएं उनके ऊपर से गुजरती हैं। यह अनोखी मान्यता यहां की विशेष पहचान है।

🔱 तीसरा स्थान – श्रमिकों की एकता का प्रतीक
तीसरे स्थान पर है श्री श्रमिक दुर्गा उत्सव समिति, कैम्प-1 जिनका यह 52 वां वर्ष है। यहां राजहरा की खदानों में काम करने वाले रेजा मजदूरों द्वारा मां की स्थापना कर पूजा-अर्चना की जा रही है। यह उत्सव श्रमिकों की एकता का परिचायक है। यहां हर वर्ष रावण दहन का भी आयोजन होता है और रामायण, महाभारत एवं ज्ञानवर्धक झांकियों का प्रदर्शन किया जाता है।

🔱 चौथा स्थान – जिले का सबसे बड़ा पंडाल
जिले का सबसे बड़ा पंडाल बनाने का श्रेय सार्वजनिक दुर्गा उत्सव समिति, पंडर दल्ली को जाता है। लगभग 100 फीट लंबा और 50 फीट से ज्यादा ऊंचा भव्य पंडाल मंदिर के आकार में बनाया गया है। इस आयोजन का यह 35 वां वर्ष है, जिसकी शुरुआत स्व. पी.एस. अहलूवालिया और स्व. रंजन घोष द्वारा की गई थी। दर्शकों के बैठने के लिए वाटरप्रूफ मंच और गर्मी से राहत के लिए कूलर की भी व्यवस्था की गई है।

🔱 पांचवा स्थान – आजाद दुर्गा उत्सव
पांचवे स्थान पर है आजाद दुर्गा उत्सव समिति, आजाद नगर चिखलाकसा जिनका यह 34 वां वर्ष है। इसका आयोजन निर्मला स्कूल के पास किया जाता है।

दल्ली राजहरा की दुर्गा उत्सव समितियो के द्वारा जहां कई रूपों में मां दुर्गा विराजमान है वैसे तो  मां की तुलना अद्भूति है फिर भी हमारा दल्ली राजहरा निष्पक्ष समाचार चैनल की ओर से नगर के विभिन्न दुर्गा उत्सव समितियां द्वारा स्थापित मां दुर्गा की  प्रतिमा को आपके समझ प्रस्तुत करने का प्रयास किया जा रहा है ।

 

वार्ड क्रमांक 2 गणेश चौक पंडर  दल्ली 

 

अनिल प्रिंटिंग प्रेस के पास स्थापित मां दुर्गा
हॉस्पिटल सेक्टर नारायण होटल के पीछे स्थापित मां दुर्गा की प्रतिमा
श्री बालाजी दुर्गा उत्सव समिति सब्जी मार्केट नया बाजार वार्ड क्रमांक 25
वार्ड क्रमांक 21 और 26 रेलवे सीआरपीएफ बैरक के पास स्थापित मां दर्गा
नवजागरण दुर्गा उत्सव समिति वार्ड क्रमांक 14 सहित चौक
सर्कस मैदान में स्थापित मां दुर्गा की प्रतिमा
गुप्ता चौक दल्ली राजहरा  में स्थापित मां दुर्गा की प्रतिमा 

 

नवदुर्गा उत्सव समिति मोगरा दफाई वार्ड क्रमांक 18
 गाडर पुल के पास  वार्ड क्रमांक 19 में स्थापित मां दुर्गा
सार्वजनिक दुर्गा उत्सव समिति वार्ड क्रमांक 9 डी ए व्ही स्कूल के पास
समय के साथ बदला स्वरूप

 

समय के साथ बहुत कुछ बदल गया है। एक समय था जब लोग शाम से ही पैदल मां दुर्गा के दर्शन के लिए निकलते थे और पूरे रास्ते में भीड़ रहती थी। आसपास के गांव वाले भी दर्शन के लिए दल्ली राजहरा आते थे। अब गांव-गांव में स्थापना होने से शहर में भीड़ थोड़ी कम हुई है।

 

बदलाव का एक और पहलू रामलीला है। एक समय था जब 6 नंबर स्कूल प्रांगण में आसपास की प्रसिद्ध मंडलियों द्वारा रामलीला का मंचन होता था और लोग मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की लीला – बचपन, सीता स्वयंवर, भरत मिलाप, रावण वध देखकर भाव विभोर होते थे। लेकिन अब यह परंपरा लगभग समाप्त हो चुकी है।

 

जो आज भी नहीं बदला

 

जो आज भी नहीं बदला है वो है माता के सेवा गीत गाने वालों की शैली। आज भी जगह-जगह पंडालों में शुद्ध छत्तीसगढ़ी और हिंदी में गाए गए सेवा गीत सुनकर मन ठहर जाता है। वहीं दूसरा बड़ा बदलाव गरबा का क्रेज है। गुजरात का प्रसिद्ध नृत्य अब दल्ली राजहरा में भी छा गया है।

 

सबसे पुराना गरबा आयोजन गुजराती समाज द्वारा चिखलाकसा के आरा मिल, उत्तम टिम्बर में वर्षों से हो रहा है। वहीं वर्तमान में सबसे बड़ा गरबा आयोजन 6 नंबर स्कूल मैदान में राजहरा यूथ वेलफेयर एसोसिएशन द्वारा किया जा रहा है। इसका यह 8 वां वर्ष है। कल 16 अक्टूबर से शुरू हुई इस गरबा प्रतियोगिता में  सैंकड़ों लोग एक साथ गरबा कर रहे हैं, जिसे बालोद जिले का सबसे बड़ा गरबा आयोजन कहा जा सकता है।
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Bhojram Sahu

By Bhojram Sahu

प्रधान संपादक "हमारा दल्ली राजहरा: एक निष्पक्ष समाचार चैनल"

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