दल्ली राजहरा रविवार 18 अक्टूबर 2026 भोजराम साहू 9893 765541मर्यादा रावण से भी सीख लें तो हम इंसान हो जाएं…!नवरात्रि के 9 दिनों तक जनमानस माँ शक्ति की आराधना करता है। माँ की सेवा में कोसों दूर तक पदयात्रा करता है और नवें दिन कन्याओं को भोजन कराकर, उन्हें माँ का स्वरूप मानकर शीश झुकाकर साष्टांग प्रणाम कर आशीर्वाद लेता है। और दसवें दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम द्वारा अधर्म और अशांति के प्रतीक रावण का वध कर हम दशहरा मनाते हैं। यह परम्परा उसी काल से चली आ रही है, जब से मर्यादा पुरुषोत्तम ने रावण का वध किया था। क्या केवल पुतला जलाने से दशहरा सार्थक हो जाता है ..? इसी प्रश्न को लेकर हमारा दल्ली राजहरा का यह छोटा सा प्रयास है –नारी के सम्मान और मर्यादा के नाम।इसी विषय पर हमने समाज के प्रबुद्धजनों से विचार आमंत्रित किए थे। जिसमें अंतरराष्ट्रीय लेखिका एवं अनगिनत सम्मानों से सम्मानित डॉ. शिरोमणि माथुर, शिक्षिका राजेश्वरी साहू समाजसेवी द्रौपदी साहू और वरिष्ठ कवि एवं समाज प्रमुख घनश्याम पारकर ने अपने अमूल्य विचार भेजे। कुछ विचार ऐसे भी थे जो आम जनता के सम्मुख रखने योग्य नहीं थे, इसलिए हम प्रमुख तीन विचार आपके समक्ष रख रहे हैं।“जिस दिन अपने भीतर का रावण पराजित हो जाएगा, उसी दिन विजयदशमी का वास्तविक अर्थ साकार हो जाएगा।” – डॉ. शिरोमणि माथुर, अंतरराष्ट्रीय लेखिका विजयदशमी पर हम हर वर्ष रावण, कुंभकरण और मेघनाद के पुतले जलाते हैं और श्रीराम की जयकारे लगाते हैं। न तो रावण मरता है और न ही श्रीराम के आदर्श हमारे जीवन में आ पाते हैं। यह केवल एक परम्परा बन गई है। आज आवश्यकता है इस त्योहार में छिपे आदर्श और संदेश को धारण करने की।9 दिन की देवी आराधना के बाद यह पर्व आता है। लगभग हर घर में शक्ति की आराधना होती है, फिर दशहरा पर रावण दहन होता है। लेकिन इतना सब होने के बाद भी हमारे मन का रावण नहीं मरता, वह अहंकार के रूप में जिंदा रहता है। संसार में सबसे बड़ा विकार अहंकार है, वही मानव को गलत काम की ओर प्रेरित करता है। ईर्ष्या, लोभ, मोह, काम, क्रोध सब अहंकार के कारण ही उत्पन्न होते हैं। इसलिए सबसे पहले हमें अपने अहंकार को मारने की जरूरत है। इसी अहंकार के कारण पुरुष का अहम जागता है और वह शक्ति प्रदर्शन के साथ अनैतिक कार्य करता है, जिस कारण आज हमारी बेटियाँ सुरक्षित नहीं हैं।9 दिन पूजा करने के बाद भी नैतिकता हमारे मन में टिक नहीं पाती और रावण दहन के बाद राम की मर्यादा और आदर्श भी शरीर में स्थायी रूप से नहीं टिकते। क्योंकि अभी तक हमने अपने मन के रावण को मारा ही नहीं है। बच्चों को दशहरा दिखाना, रावण को मरते दिखाना तो ठीक है, लेकिन उत्सव और इसके पीछे छिपे संदेश को, नैतिक मूल्यों को अपने जीवन में उतारना और उन पर चलना हमारे जीवन का लक्ष्य होना चाहिए, तभी भारत में रामराज्य की कल्पना साकार होगी। आवश्यकता है उन मूल्यों को सबके जीवन में लाने की। जहाँ कहीं अन्याय हो रहा हो, उसका विरोध करना है। कुंभकरण की तरह हमें सोए नहीं रहना है। आलस और आलोचना को छोड़कर हमें सक्रिय रहना है, ताकि समाज में नारियों का सम्मान बना रहे। तभी हम, हमारा परिवार और देश सुखी रह सकेगा। क्योंकि भारतीय दर्शन की मान्यता रही है – “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता:” अर्थात जहाँ नारी की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं। पूजा का अर्थ ही सम्मान देना है।इस विजयदशमी पर हम केवल पुतलों का ही दहन न करें, अपने भीतर के विकारों को पहचानें और उन्हें दूर करने का संकल्प लें। आसपास हो रहे अन्याय के विरुद्ध खड़े होना अपनी जिम्मेदारी समझें। नारियों का सम्मान करें और ईमानदारी अपनाते हुए मानवीय मूल्यों की रक्षा करें। “धर्म की पहचान हमारे माथे से नहीं, हमारे व्यवहार से होनी चाहिए।” – राजेश्वरी साहू, शिक्षिका माथे पर बड़ा तिलक लगाकर, गले में जनेऊ धारण करके हम स्वयं को बड़ा हिंदू दिखाने की कोशिश करते हैं। पूजा-पाठ करते हैं, धर्म की बातें करते हैं, लेकिन अगर हमारे मन में दूसरों के लिए नफरत, घृणा और द्वेष भरा है, तो हमें स्वयं से पूछना चाहिए – क्या यही हिंदुत्व है? कोहिंदुत्व केवल माथे के तिलक, गले के जनेऊ या बाहरी वेशभूषा में नहीं है। हिंदुत्व की असली परिभाषा तो यही है कि दीन-दुखी की मदद करो, महिलाओं का सम्मान करो और धर्म की रक्षा करो। यह हमारे विचारों, संस्कारों, व्यवहार और कर्मों में दिखाई देना चाहिए।जिस धर्म की सीख करुणा, सत्य, सहिष्णुता और मानवता है, उसी धर्म के नाम पर अगर हमारे मन में किसी के प्रति नफरत पैदा हो जाए, तो दूसरों को धर्म सिखाने से पहले अपने भीतर झाँकना चाहिए। तिलक माथे पर हो, लेकिन मन में प्रेम न हो, तो वह केवल दिखावा है।जनेऊ गले में हो, लेकिन विचारों में मानवता न हो, तो वह केवल बाहरी पहचान है। सच्चा हिंदुत्व किसी से नफरत करना नहीं, बल्कि हर प्राणी में ईश्वर का अंश देखना और मानवता का सम्मान करना है। इसलिए सवाल यह नहीं कि हम कितने बड़े हिंदू दिखाई देते हैं, सवाल यह है कि हमारे आचरण में हिंदुत्व कितना दिखाई देता है।“जिस घर में बेटी का सम्मान होता है, वहाँ माँ लक्ष्मी और दुर्गा की सदैव कृपा बनी रहती है।” – द्रौपदी साहू, समाजसेवीबेटियाँ देवी का रूप हैं। सनातन संस्कृति और शास्त्रों में माना गया है कि हर स्त्री और बेटी में देवी माँ विराजमान हैं, इसलिए नवरात्रि में कन्यापूजन के माध्यम से छोटी बच्चियों को माँ दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों, नौ देवियों का रूप मानकर पूजा की जाती है, जो इस बात का प्रतीक है कि बालिकाएँ पूजनीय हैं।वास्तविक जीवन में हम सभी बेटियों को समान अधिकार, सुरक्षा, शिक्षा और आदर तो देते हैं, ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा भी देते हैं, पर अभी भी बेटियाँ सुरक्षित नहीं हैं। बेटियाँ बाहर तो बाहर, अपने घर में भी सुरक्षित नहीं हैं। हम नौ दिन बेटी में माँ दुर्गा का रूप देखते हैं, ऐसा क्यों? हम हमेशा बेटियों को देवी क्यों नहीं मानते? ये नौ दिन ही क्यों? हर पुरुष जैसे अपनी खुद की बेटी, माँ, बहन की इज्जत करता है, वैसे ही दूसरे की बेटी, माँ और बहन को अपना समझे, तो बालिकाओं का शोषण कभी हो ही नहीं सकता। स्त्री को सिर्फ महिला दिवस पर ही क्यों सम्मानित किया जाए, हर दिन उसको सम्मान मिलना चाहिए।“देवी की पूजा तभी सार्थक है जब हमारे विचारों और आचरण में भी धर्म दिखाई दे … । “:– घनश्याम पारकर कवि एवं अध्यक्ष निषाद समाज दशहरा हमें केवल रावण के पुतले जलाने का नहीं, बल्कि अपने भीतर के अहंकार, नफरत, लालच और बुराइयों को समाप्त करने का संदेश देता है। माथे पर तिलक, गले में जनेऊ और नौ दिनों तक देवी की पूजा करना तभी सार्थक है, जब हमारे विचारों और आचरण में भी धर्म दिखाई दे।सनातन धर्म का सच्चा अनुयायी वही है, जो नारी का सम्मान करे, निर्बल की सहायता करे और सभी के प्रति करुणा रखे। भगवान श्रीराम के आदर्शों को अपनाना ही सच्ची रामभक्ति है।https://hamaradallirajhara.in/wp-content/uploads/2026/10/VID-20261018-WA0076.mp4 हमारी बेटियां तब सुरक्षित होंगी, जब घरों में बेटों को महिलाओं का सम्मान करना सिखाया जाएगा, अपराधियों को त्वरित और निष्पक्ष न्याय मिलेगा तथा समाज पीड़िता को दोष देने के बजाय उसका साथ देगा। बेटियों की सुरक्षा केवल कानून या सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।आइए, इस दशहरे पर एक संकल्प लें—पुतले के रावण के साथ मन के रावण को भी जलाएंगे। जिस दिन हमारी बेटियां बिना भय के घर से निकल सकेंगी, उसी दिन हमारा दशहरा और हमारी सनातन संस्कृति वास्तव में सार्थक होगी।पुतला जलता देख कर, मत समझो त्योहार।मन की बुराई जल उठे, तभी जीत हर बार॥पुतले के संग आज, मन का रावण मार।बेटी का सम्मान हो, यही धर्म का सार॥ आज के युग की आवश्यकता भगवान राम को शक्ति का प्रतीक माना जाता है, मर्यादा से बंधे होने के कारण उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है। उन्होंने हमेशा आदर्शों का पालन किया। गुरु वशिष्ठ का सम्मान किया, पिता दशरथ की आज्ञा से वनवास स्वीकार किया, भाई भरत को राजसिंहासन सौंप दिया।तो वहीं रावण भी महाज्ञानी, वेदों का ज्ञाता, महादेव का परम भक्त और महायोद्धा था। उसकी सबसे बड़ी कमजोरी थी उसका अहंकार और अभिमान, इसी अहंकार के कारण उसका पतन हुआ, जो हमें सिखाता है कि शक्ति और ज्ञान के साथ-साथ नम्रता और विनम्रता भी आवश्यक है।रावण अपनी बहन शूर्पणखा से अत्यंत प्रेम करता था, लेकिन प्रेम का अंधत्व ही उसकी कमजोरी बन गया। आज का युग ढकोसला और दिखावे का युग हो गया है। लोग किसी को आगे बढ़ता नहीं देखना चाहते।एक कहानी याद आती है – एक जुगनू के पीछे एक बाज पड़ गया। जुगनू ने पूछा, मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है, मुझे खाकर भी तुम्हारा पेट नहीं भरेगा। बाज बोला, “तेरी चमक मुझसे देखी नहीं जाती।” याद रखिए, कुछ लोगों को आपका बुरा नहीं, आपका अच्छा होना ही चुभता है।सनातन धर्म जिसकी परम्परा न जाने कितने वर्षों से चली आ रही है, आज कुछ लोगों के दिखावे के कारण धूमिल हो रही है। लोग माथे पर तिलक और जनेऊ धारण कर यह दिखाने का प्रयास कर रहे हैं कि सनातन की रक्षा करने वाले हम ही हैं, लेकिन सनातन तो त्याग, बलिदान, प्रेम और सुरक्षा सिखाता है – अपने हित के लिए नहीं, दूसरों के हित के लिए त्याग करना, मानव हो या जीव-जंतु, सभी से प्रेम करना और निर्बल की रक्षा करना।अंत में दो प्रसंग रामायण का एक प्रसंग हमें भारतीय संस्कृति और मर्यादा की ओर ले जाता है। जब रावण मृत्यु शैय्या पर था, तब मंदोदरी राम से मिलने आई। जैसे ही मंदोदरी की छाया राम की पीठ पर पड़ी, वे उठ खड़े हुए और बोले, “माता, आप यहाँ कैसे?” मंदोदरी ने कहा, मैं तुझे कोसने नहीं आई, मैं देखने आई हूँ कि जिसने पूरी दुनिया को पराजित कर दिया, उस महापराक्रमी को हराने वाले में ऐसा क्या है जो मेरे पति में नहीं था। राम ने पूछा, माता आपको पता चला क्या अंतर है? मंदोदरी ने कहा, पता चल गया। एक मेरा पति था जो मेरी जैसी सुंदरी होते हुए भी तेरी पत्नी को चाहता था, और एक तू है कि पीठ पर भी परस्त्री की छाया पड़ी तो उठकर खड़ा हो गया, यही अंतर है उसमें और तुझमें।इसीलिए तो भगवान राम ने भाई लक्ष्मण को मृत्यु शैय्या पर पड़े रावण से ज्ञान सीखने के लिए भेजा था। रावण में अहंकार था तो ज्ञान भी था। रावण में माँ सीता का हरण करने की शक्ति थी, तो बिना अनुमति के स्पर्श न करने की मर्यादा भी थी। रावण के दस सिर हमारे भीतर की दस बुराइयों के प्रतीक हैं – काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या, आलस्य, मद, मत्सर और हिंसा। रावण रूपी पुतला दहन करने से पहले हमें अपने अंदर की इन बुराइयों को जलाकर नकारात्मकता को समाप्त करना है।यह पर्व हमें सिखाता है कि ज्ञान, बल और शक्ति कितनी भी हो, अहंकार के साथ उसका पतन तय है। दशहरा हमें धर्म, सत्य और सदाचार का पालन करने की प्रेरणा देता है। जीवन में विजय तभी मिलती है, जब हम अपने भीतर के रावण को हराते हैं।इसलिए कहा गया है – मर्यादा हम रावण से भी सीख लें तो हम इंसान हो जाएं, भले राम बनें या न बनें।आपका – भोजराम साहू, संपादक, हमारा दल्ली राजहरा – एक निष्पक्ष समाचार चैनलSpread the lovePost navigationकोहरे की चादर में लिपटी लौह नगरी, पर्वतीय स्थल सा दिखा दल्ली राजहरा; भीष्म रथ की दुर्दशा से पर्यटक मायूस, सप्तगिरि पार्क में दिखा मनोरम नजारा । आस्था और प्रकृति का संगम – माँ झरन मैय्या मंदिर, उपेक्षा की मार झेल रहा दल्ली राजहरा का सबसे प्राचीन धरोहर ।