दल्ली राजहरा रविवार 25 अक्टूबर 2026 भोजराम साहू 9893 7655416 माह और 15 दिन की बच्ची, 6 महीने इनक्यूबेटर, आंखों में रोशनी नहीं, फिर भी 2 गोल्ड। और मेडल जीतकर पति के पैर छू लिए।कहते हैं कि हर आदमी की सफलता के पीछे किसी औरत का हाथ होता है। लेकिन कभी-कभी किसी औरत की सफलता के पीछे आदमी का भी हाथ होता है। आदमी सिर्फ औरतों से प्यार ही नहीं करता, बल्कि उनके सपनों से भी प्यार करता है। आज बात कर रहे हैं एक ऐसी लड़की की, जिसका सफर आसान नहीं था, लेकिन उसने हार नहीं मानी। दृष्टिबाधित लड़की जो पैरा ओलंपिक की चैंपियन बनी, जिसका सपना पूरा करने के लिए उनके पति ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया।https://hamaradallirajhara.in/wp-content/uploads/2026/10/VID-20261025-WA0033.mp4फेसबुक पर इन दिनों दो वीडियो वायरल हो रहे हैं। पहले वीडियो में एक लड़की आंखों पर पट्टी जैसी रोशनी के साथ दौड़ रही है, और उसके बगल में एक लड़का रस्सी पकड़कर दौड़ रहा है। दूसरे वीडियो में वही लड़की 2 गोल्ड मेडल जीतकर मंच से उतरती है, और दोनों मेडल अपने पति के गले में पहना देती है, फिर उनके पैर छू लेती है। पति उसे उठाकर गले लगा लेते हैं। ये वीडियो देखने के बाद पूरा देश पूछ रहा है – ये लड़की कौन है?ये लड़की है सिमरन शर्मा। उम्र 26 साल। जन्म 9 नवंबर 1999, मोदीनगर, गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश। जन्म की कहानी – जहां डॉक्टरों ने भी उम्मीद छोड़ दी थीसिमरन के पिता मनोज शर्मा और मां सविता शर्मा आज भी वो दिन नहीं भूलते। सिमरन साढ़े छह महीने में ही पैदा हो गई थी। समय से पहले। वजन बहुत कम। सांस भी ठीक से नहीं आ रही थी। डॉक्टरों ने कहा – “बच्ची को इनक्यूबेटर में रखना पड़ेगा, बचना मुश्किल है।”6 महीने तक वो बच्ची इनक्यूबेटर में रही। 6 महीने! सोचिए, जिस उम्र में बच्चा मां की गोद में खेलता है, वो बच्ची मशीनों के बीच जिंदगी और मौत से लड़ रही थी।आखिर वो बच तो गई, लेकिन एक कमी के साथ। जन्म से ही आंखों से कम दिखाई देता था। दुनिया उसके लिए धुंधली थी। मोहल्ले के लोग कहते थे – “इस बच्ची का क्या होगा? ये तो देख भी नहीं सकती, पढ़ेगी कैसे, चलेगी कैसे?”लेकिन पिता मनोज शर्मा ने एक बात ठान ली थी – “मेरी बेटी कमजोर नहीं है, वो फाइटर है।”बचपन से ही सिमरन में एक अजीब सी जिद थी। गिरती थी, उठती थी, फिर दौड़ती थी। आंखों से कम दिखता था, पर हौसला सबसे ज्यादा दिखता था। वो मोदीनगर के रुक्मणि मोदी महिला इंटर कॉलेज में पढ़ती थी। पढ़ाई के साथ-साथ दौड़ में भी मन लगता था। टीचर कहते थे – “ये लड़की आंखों से कम देखती है, पर दौड़ती सबसे तेज है।”https://hamaradallirajhara.in/wp-content/uploads/2026/10/VID-20261025-WA0032.mp4 एक युवा सैनिक की एंट्री – जहां से असली कहानी शुरू होती है सिमरन की जिंदगी में असली मोड़ तब आया, जब उनकी मुलाकात नायक गजेंद्र सिंह से हुई। गजेंद्र सिंह भारतीय सेना में हैं। नई दिल्ली में आर्मी सर्विस कोर की 227 कंपनी में तैनात। उम्र में युवा, दिल से सैनिक, और सोच से कोच। गजेंद्र ने जब पहली बार सिमरन को दौड़ते देखा, तो उन्होंने वो देखा जो दुनिया नहीं देख पाई थी। उन्होंने देखा – इस लड़की की आंखों में रोशनी कम है, लेकिन पैरों में बिजली है।https://hamaradallirajhara.in/wp-content/uploads/2026/10/VID-20261025-WA0031.mp4उन्होंने सिमरन को कोचिंग देनी शुरू की। धीरे-धीरे कोचिंग, दोस्ती में बदली, और दोस्ती, 29 नवंबर 2017 को दोनों ने शादी कर ली। सिमरन शर्मा कहती हैं – _”गज्जू ने शादी से कुछ दिन पहले पूछा कि तुम्हारा सपना क्या है। मैंने कहा था कि मैं अपनी टी-शर्ट के पीछे INDIA लिखवाना चाहती हूं। शादी के दूसरे दिन ही मेरे हाथों में मेहंदी लगी थी, उन्होंने कहा चलो जिम चलते हैं। तो मैं शान से कहती हूं कि मुझे अपने पति पर नाज है। आज मैं अपने पति की वजह से खड़ी हूं। मुझे लगता है कि वह भारत के लिए एक उदाहरण है कि एक आदमी अपनी पत्नी को यहां तक पहुंचाने के लिए भी संघर्ष कर सकते हैं।”_सोचिए , जिस घर में नई दुल्हन को रसोई में भेजा जाता है, उस घर में गजेंद्र ने नई दुल्हन को मेहंदी लगे हाथों से जिम भेज दिया। यही तो फर्क है।https://hamaradallirajhara.in/wp-content/uploads/2026/10/VID-20261025-WA0030.mp4अब सोचिए, एक युवा सैनिक के लिए ये कितनी बड़ी जिम्मेदारी थी। एक तरफ देश की नौकरी, दूसरी तरफ एक दृष्टिबाधित पत्नी को वर्ल्ड चैंपियन बनाने का सपना।लोगों ने बहुत कहा – “गजेंद्र, तुम पागल हो गए हो? अपनी जिंदगी क्यों खराब कर रहे हो?”पर गजेंद्र नहीं रुके। उन्होंने पत्नी के लिए जमीन बेच दी। कर्ज लिया। अपनी यूनिट से छुट्टी लेकर पत्नी के साथ ट्रेनिंग में लगे रहे। गजेंद्र खुद कहते हैं – _”वो जन्म से ही फाइटर है। मैं अपनी खुशी शब्दों में बयां नहीं कर सकता। मुझे उसकी कामयाबी पर सच में गर्व है। मेरी यूनिट ने मुझे अपनी पत्नी की कोशिशों में मदद करने के लिए पूरी छूट दी।”_गजेंद्र ने पत्नी को बोझ नहीं समझा, जिम्मेदारी समझा। उन्होंने पत्नी की कमी को ताना नहीं बनाया, ताकत बना दिया। जिस समाज में लोग पत्नी की एक कमी पर उसे छोड़ देते हैं, उस समाज में गजेंद्र ने पत्नी के टैलेंट को उभारकर देश को स्वर्ण पदक दिलाने के लिए जमीन तक बेच दी, जी-जान लगा दी। यही असली पति है, यही असली सैनिक है।https://hamaradallirajhara.in/wp-content/uploads/2026/10/VID-20261025-WA0029.mp4एक सैनिक देश की रक्षा करता है, और इस सैनिक ने एक बेटी के सपने की रक्षा की। यही तो इस कहानी को सबसे बड़ी बनाता है।सिमरन T12 कैटेगरी की एथलीट हैं। मतलब दृष्टिबाधित। वो अकेले नहीं दौड़ सकतीं। उनके साथ एक गाइड रनर दौड़ता है, रस्सी से बंधकर। दोनों की सांस, दोनों के कदम एक साथ चलते हैं, तब जाकर रेस पूरी होती है। गाइड रनर बदलना सबसे मुश्किल काम था। पुराने गाइड रनर के जाने के बाद नया गाइड रनर ढूंढना, उसके साथ तालमेल बिठाना, ये महीनों की मेहनत थी।https://hamaradallirajhara.in/wp-content/uploads/2026/10/VID-20261025-WA0028.mp4पेरिस वर्ल्ड पैरा चैंपियनशिप से पहले जांघ की मांसपेशी में चोट लग गई। डॉक्टर ने कहा – आराम करो। सिमरन ने कहा – आराम करूंगा तो देश पीछे रह जाएगा। उन्होंने चोट के साथ ट्रेनिंग जारी रखी।टोक्यो पैरालिंपिक में क्वालिफाई किया, लेकिन मेडल नहीं मिला। पूरा देश निराश था, पर सिमरन नहीं। वो बोली – “मेडल नहीं मिला, तो क्या हुआ? मैं फिर आऊंगी।”जापान के नागोया में तो शाकाहारी खाना तक नहीं मिला। ट्रेनिंग के बाद रिकवरी के लिए खाना चाहिए था, वो भी नहीं मिला। फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। घर में 15 महीने के जुड़वां बच्चे – अकाय और अक्ष्वी। एक मां अपने दो छोटे बच्चों को छोड़कर जापान में देश के लिए लड़ रही थी। जीत के बाद उन्होंने वीडियो कॉल पर बच्चों से बात की।https://hamaradallirajhara.in/wp-content/uploads/2026/10/VID-20261025-WA0027.mp4 गोल्ड मेडल की कहानी – हार से जीत तक 2023, हांग्जो एशियन पैरा गेम्स:100 मीटर में 12.68 सेकंड और 200 मीटर में 26.12 सेकंड के साथ *2 सिल्वर मेडल*। भारत ने उस बार 111 मेडल जीतकर इतिहास रचा था, 29 गोल्ड, 31 सिल्वर, 51 ब्रॉन्ज। मई 2024, कोबे जापान विश्व पैरा चैंपियनशिप: गोल्ड मेडल – 200 मीटर T12 में। वर्ल्ड चैंपियन बनीं।https://hamaradallirajhara.in/wp-content/uploads/2026/10/VID-20261025-WA0026.mp47 सितंबर 2024, पेरिस पैरालिंपिक: 200 मीटर T12 फाइनल में ब्रॉन्ज मेडल। 100 मीटर में 12.31 सेकंड दौड़कर भी चौथे नंबर पर रहीं। और अब 2026, नागोया एशियन पैरा गेम्स: डबल गोल्ड। 100 मीटर T12 में 12.02 सेकंड – नया गेम्स रिकॉर्ड। और 200 मीटर में भी गोल्ड।सिमरन ने दोनों गोल्ड मेडल अपने पति गजेंद्र के गले में पहना दिए और उनके पैर छूकर आशीर्वाद लिया। गजेंद्र ने तुरंत उन्हें उठाया और गले लगा लिया।उस एक गले मिलने में बरसों का साथ, संघर्ष और एक-दूसरे पर भरोसा नजर आया। मेडल सिमरन ने जीते, लेकिन उस जीत के पीछे गजेंद्र का साथ भी था। क्योंकि कुछ जीतें सिर्फ एक खिलाड़ी की नहीं होतीं। वे उन दो लोगों की होती हैं, जो सपनों को अपना मानकर साथ चलते हैं। . कहानी का दूसरा पहलू – जिसे पढ़कर समाज को चिंतन करना चाहिए पहला पहलू एक कोच और पति की कहानी है, जिन्होंने पत्नी के टैलेंट को उभारकर देश को गोल्ड मेडल दिलाने में मदद की।दूसरा पहलू आप देखते हैं, समाज में थोड़ी सी पत्नी को कुछ दुर्घटना हो जाए, या कुछ खामियां निकल आएं, तो तुरंत तलाक देकर नया जीवन साथी ढूंढने लग जाते हैं।https://hamaradallirajhara.in/wp-content/uploads/2026/10/VID-20261025-WA0032-1.mp4आज समाज में पत्नियों को हीन दृष्टि से देखा जाता है। उनको अवहेलना करके नरकीय जिंदगी जीने के लिए मजबूर कर दिया जाता है। बेटी पैदा हो तो बोझ, बहू बीमार हो जाए तो बोझ, पत्नी कम कमाए तो बोझ, पत्नी को आंखों से कम दिखे तो बोझ। एक तरफ समाज का ये घटियापन है, तो दूसरी तरफ पत्नी के प्रति पति का प्रेम और लगाव है। गजेंद्र ने अपनी पत्नी को बेहतरीन सम्मान दिया। उन्होंने ये साबित कर दिया कि पत्नी बोझ नहीं, भाग्य होती है। पत्नी की कमी को गिनाने वाला पति छोटा होता है, और पत्नी की कमी को ताकत बनाने वाला पति ही सबसे बड़ा होता है। अगर हर घर में एक गजेंद्र हो जाए, तो कोई बेटी इनक्यूबेटर से निकलकर भी गोल्ड जीत सकती है, और कोई पत्नी नरकीय जिंदगी नहीं, सम्मान की जिंदगी जीएगी।संडे मेगा स्टोरी में आज बस इतना ही। आपके पास भी ऐसी कोई प्रेरणादायी कहानी हो, तो हमें अवश्य बताएं।भोज राम साहू, संपादक, हमारा दल्ली राजहरा निष्पक्ष समाचार चैनल, दल्ली राजहरा, जिला बालोद (छ.ग.) Spread the lovePost navigation“रामायण ग्रंथ नहीं, जीवन जीने की कला है।” :-पीयूष सोनी (विधायक प्रतिनिधि) 3 दिन में 3 मौत! बालोद- दल्ली मार्ग बना मौत का हाईवे, असली जिम्मेदार कौन..?