चीन में एक बार फिर लहर की तरफ बढ़ते कोरोना ने करीबी देशों में परेशानियां बढ़ा दी हैं। कोविड-19 में लगभग ढाई साल में कोरोना की तीन लहरों में से पहले और दूसरी लहर में ऑक्सीजन की कमी मौतों का बड़ा कारण बनी थी।

छत्तीसगढ़ में इसी दौरान ऑक्सीजन प्लांट सरकारी तौर पर बड़ी संख्या में लगाने का प्लान बना और उस पर अमल भी हुआ। तकरीबन दो सौ करोड़ रुपए खर्च कर प्रदेश में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर सरकारी और मेडिकल काॅलेज अस्पतालों में 115 से ज्यादा ऑक्सीजन प्लांट लगाए गए।

आने वाली जरूरतों को ध्यान में रखकर इन ऑक्सीजन प्लांटों की अभी क्या स्थिति है, भास्कर टीम ने इसे लेकर आधा दर्जन प्लांट की पड़ताल की तो चौंकाने वाले खुलासे हुए।

राजधानी की डीकेएस अस्पताल परिसर में लिक्विड ऑक्सीजन प्लांट दो साल पहले लगा लेकिन इसकी ऑक्सीजन अस्पताल में उपयोगी नहीं क्योंकि पाइपलाइन ही कनेक्ट नहीं हो पाई है।

यही नहीं, रायपुर के 7 प्लांट में मेंटेनेंस के नाम पर सिर्फ तीन लोग हैं, जबकि डाक्टरों ने ही माना कि हर प्लांट में एक इंजीनियर, एक इलेक्ट्रीशियन और एक सफाईकर्मी को मिल 3 स्टाफ होना चाहिए। इस कमी का नतीजा यह हुआ है कि कई ऑक्सीजन प्लांट अब खराब होने की कगार पर पहुंच रहे हैं।

कोरोना की दूसरी लहर के दौरान केंद्र और राज्य सरकार दोनों ही तात्कालिक तौर पर ऑक्सीजन की कमी को ध्यान में रखते हुए एलर्ट हुए थे और देशभर में आनन-फानन में आक्सीजन प्लांट लगवाए गए थे। उस दौरान छत्तीसगढ़ में भी करीब 200 करोड़ रुपए खर्च कर 100 से ज्यादा प्लांट लगाए गए। भास्कर टीम की ने कुछ प्लांट की जमीनी पड़ताल में चौंकाने वाले बातें सामने आई है।

दरअसल, आक्सीजन प्लांट को बनाए हुए करीब दो साल बीत रहे हैं। लेकिन अब तक प्रदेश के किसी भी जिले में इनके रखरखाव और संचालन के लिए स्टाफ ही नहीं रखा गया है। 24 घंटे सातों दिन की तर्ज पर आक्सीजन प्लांट चलाने और रखरखाव के लिए करीब दो सौ लोगों के तकनीकी स्टाफ की जरूरत है।

यानी हर प्लांट में करीब दो लोग चाहिए। इसमें एक इंजीनियर, एक इलेक्ट्रिशियन जरूरी है। साथ ही प्लांट में साफ सफाई रहे इसके लिए अलग से एक सफाई कर्मी को जोड़ दिया जाए। तो हर जगह न्यूनतम तीन लोगों की जरूरत होगी। ये स्टाफ नहीं है, इसलिए रखरखाव की कमी है और इसके कारण ऑक्सीजन प्लांटों के खराब होने की शिकायतें आ रही हैं।

ग्राउंड रिपोर्ट – 2

लिक्विड आक्सीजन प्लांट से सालभर में पाइप कनेक्शन नहीं

प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल डीकेएस में पीएम केयर फंड से लिक्विड आक्सीजन प्लांट साल भर पहले ही लगाया गया है। जिसको बनाने में 50 लाख से अधिक की लागत आ चुकी है। भास्कर टीम जब यहां पहुंची तो यहां प्लांट के आसपास ही झाडिय़ां लग गई है। प्लांट का प्लेटफॉर्म भी टूट-फूट रहा है। इसमें मरीजों-परिजनों के कपड़े सुखाए जा रहे हैं।

कारण सिर्फ यही है कि प्लांट बनने के बाद से अब तक पाइपलाइन कनेक्शन का काम नहीं हुआ है। पड़ताल में पता चला है कि सरकारी दवा क्रेता और निर्माण एजेंसी सीजीएमएससी ने जिस कंपनी को इसका ठेका सौंपा है, उसने कनेक्शन लगाने से मना कर दिया है। डीकेएस अस्पताल प्रबंधन की ओर से कई बार पत्र भी लिखे गए हैं।

अफसरों का कहना है कि अस्पताल खुद करीब 4 लाख खर्च कर पाइप लगाने जा रहा है। क्योंकि एक साल बाद भी एजेंसी ये काम नहीं कर पाई है। गौरतलब है, लिक्विड आक्सीजन प्लांट में आक्सीजन रिफिल कर स्टोर करने के बाद पाइप लाइन से मरीजों तक पहुंचाई जाती है।

अलग-अलग फंड से प्लांट

  • पीएम केयर फंड से – 49
  • राज्य के फंड से – 46
  • सीएसआर फंड से – 20
  • कुल – 115 प्लस

अस्पताल अब खुद ही आक्सीजन प्लांट से पाइप लाइन कनेक्शन बिछाने का काम शुरु करने जा रहा है। जल्द ही इसके लिए टेंडर निकाल रहे हैं। क्योंकि संबंधित विभागों को बार-बार पत्र लिखने के बाद भी अब तक कनेक्शन नहीं हो पाया है।

हेमंत शर्मा, उप-अधीक्षक, डीकेएस अस्पताल

ड्यूटी हफ्ते में दो दिन, इसलिए अक्सर ताला बंद

भास्कर टीम जब आयुर्वेदिक कॉलेज के ऑक्सीजन प्लांट में पहुंची तो वहां ताला लगा हुआ मिला। अस्पताल में मौजूद कर्मचारियों से पूछताछ में हैरान करने वाली सच्चाई सामने आई। कर्मचारियों ने बताया कि यहां जिस इंजीनियर को प्लांट के रखरखाव और संचालन के लिए रखा गया है, वो जरूरत पड़ने पर ही बुलाया जाता है। क्योंकि ऑक्सीजन की जरूरत वाले मरीज कभार ही आते हैं। वैसे हफ्ते में उसको सिर्फ दो दिन सोमवार और बुधवार की ड्यूटी दी गई है।

भास्कर की इसकी और गहराई से छानबीन की तो पता चला कि सीएमएचओ रायपुर कार्यालय की ओर से इस साल 12 सितंबर को रायपुर जिले के आयुर्वेदिक कॉलेज, माना सिविल अस्पताल, उपरवारा, तिल्दा, नवापारा, अभनपुर और धरसीवां के सात ऑक्सीजन प्लांट के लिए एक इंजीनियर और दो इलेक्ट्रिशियन की नियुक्ति कांट्रेक्ट पर की गई है। नियुक्ति की शर्त के मुताबिक सातों लोकेशन पर इनको बारी-बारी से हफ्ते में केवल दो बार ही जाना है। जबकि ऑक्सीजन प्लांट में 24 घंटे सातों दिन स्टाफ रहना चाहिए।

नियुक्तियां भी हुई

कोरोना के दौरान बनाए गए आक्सीजन प्लांट या किसी भी तरह की व्यवस्था की समुचित देख रेख के लिए पहले ही स्वास्थ्य विभाग ने नीति बनाई है, जिसका जिलों से पालन करवा रहे हैं। जिलों में स्थानीय स्तर पर नियुक्तियां भी की गई है।
डॉ. सुभाष मिश्रा, डायरेक्टर, महामारी नियंत्रण विभाग

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