दल्ली राजहरा बुध वार 02 सितंबर 2026 भोजराम साहू 9893 765541

 

 ये सिर्फ एक तस्वीर नहीं है, ये हमारे विकास के दावों पर एक करारा तमाचा है। जिला मुख्यालय बालोद की सड़क किनारे की एक तस्वीर वायरल हो रही है, जो कई कहानियों को समेटे हुए है।

 

तस्वीर में आसमान से झमाझम बारिश बरस रही है, सड़क पर कीचड़ है और किनारे एक बुजुर्ग महिला छाता थामे बैठी है। सामने दो टोकरी में कुछ सब्जियां रखी हैं जिन्हें बेचकर वो अपने पेट की आग बुझाने को मजबूर है। चेहरे पर उम्र की थकान साफ दिखाई देती है, लेकिन हाथ अब भी मेहनत करने को मजबूर हैं। ये दृश्य किसी सरकारी विज्ञापन का हिस्सा नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की जमीनी तस्वीर है जो गरीबों और बुजुर्गों के कल्याण के बड़े-बड़े दावे करती है।

मेहनत पर नहीं, व्यवस्था पर सवाल

 

सवाल ये नहीं कि महिला मेहनत क्यों कर रही है। मेहनत करना तो सम्मान की बात है। सवाल ये है कि बुढ़ापे की इस उम्र में उसे बारिश, कीचड़ और सड़क किनारे बैठकर अपनी रोजी क्यों तलाशनी पड़ रही है? क्या यही है हमारी सामाजिक सुरक्षा…?

 

बालोद जिले में पेंशन, राशन, आवास और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी अनेक योजनाएं संचालित होने का दावा है। कलेक्टर से लेकर जनपद तक रोज समीक्षा बैठकों में लक्ष्य, प्रगति, प्रतिशत और उपलब्धियों के आंकड़े पेश होते हैं। रिपोर्ट तैयार होती हैं और योजनाओं की सफलता के दावे किए जाते हैं। लेकिन सड़क किनारे बैठी यह बुजुर्ग महिला उन तमाम आंकड़ों से बाहर खड़ी दिखाई देती है।

 

महतारी वंदन की चमक के पीछे का अंधेरा ।

महतारी वंदन के नाम पर लाखों विवाहित महिलाओं को सरकार की ओर से 1000 रुपये की राशि  स सम्मान  दी जा रही है, जो स्वागत योग्य है। लेकिन सरकार की सबसे बड़ी त्रुटि वहां उजागर होती है जहां अविवाहित बहनें आज भी इस योजना का लाभ लेने के लिए चकोर पक्षी की तरह सरकार की ओर मुंह ताक रही हैं। जिले में कई ऐसी बहनें हैं जो शारीरिक रूप से कमजोर हैं या किसी कारण से जिनका विवाह नहीं हो पाया, उन्हें आज तक इस योजना का लाभ नहीं मिल पाया है। इस संबंध में क्षेत्र के सांसद भोजराज नाग से चर्चा भी की गई थी, उन्होंने कहा था कि इस संबंध में उच्च अधिकारियों से बात कर लागू करने का प्रयास किया जाएगा, लेकिन आश्वासन आज भी फाइलों में कैद है।

कागजों में व्यस्त तंत्र, जमीनी हकीकत से दूर

 

ऐसा प्रतीत होता है कि सरकारी तंत्र कई बार कागजों की दुनिया में इतना व्यस्त हो जाता है कि सामने खड़ी जिंदगी दिखाई देना बंद हो जाती है। फाइलें चलती रहती हैं, बैठकें होती रहती हैं, आंकड़े बढ़ते रहते हैं, लेकिन गरीब की परेशानी वहीं की वहीं पड़ी रहती है।

 

 किसी अधिकारी ने कभी यह जानने की कोशिश की कि जिले में कितने बुजुर्ग आर्थिक क्या मजबूरी में आज भी सड़क किनारे बैठकर जीवन चला रहे हैं..? कितने पात्र लोग जानकारी, दस्तावेज या सरकारी प्रक्रिया के कारण योजनाओं से दूर हैं…? यदि प्रशासन के पास योजनाओं का आंकड़ा है, तो जरूरतमंद नागरिकों की वास्तविक स्थिति का डाटा क्यों नहीं..?

राष्ट्रीय स्तर पर उपलब्धियों का प्रदर्शन और पुरस्कार हासिल करना प्रशासनिक प्रतिष्ठा का विषय हो सकता है, लेकिन जिले की असली सफलता किसी ट्रॉफी या प्रमाणपत्र में नहीं, बल्कि उस बुजुर्ग के चेहरे पर दिखनी चाहिए जिसे शासन से सहारे की उम्मीद है।

 

जिम्मेदारी किसकी…?

 

जिले के सबसे बड़े प्रशासनिक अधिकारी जिला कलेक्टर से लेकर स्थानीय अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों तक की जिम्मेदारी है कि वे केवल आवेदन का इंतजार न करें, बल्कि जरूरतमंदों तक पहुंचें। बारिश में बैठी यह महिला प्रशासन के दरवाजे तक नहीं पहुंची, लेकिन उसकी तस्वीर व्यवस्था तक जरूर पहुंच गई है।

 

अब सवाल है – कुंभकरणीय नींद में सोया सरकारी तंत्र जागेगा या इस तस्वीर को भी सामान्य दृश्य मानकर आगे बढ़ जाएगा? क्योंकि योजनाओं की असली सफलता सरकारी रिपोर्ट नहीं, जरूरतमंद व्यक्ति के जीवन में आया बदलाव है। सरकार की योजनाएं तभी सार्थक होंगी जब अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति तक उनका लाभ पहुंचेगा, यह सिर्फ कागज के आंकड़ों तक ही सीमित न रहे।

 

प्रशासन को पुरस्कारों की नहीं, संवेदना की भी जरूरत है।

 

(सहयोग के पी चंद्राकर)
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Bhojram Sahu

By Bhojram Sahu

प्रधान संपादक "हमारा दल्ली राजहरा: एक निष्पक्ष समाचार चैनल"

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