दल्ली राजहरा रविवार 06 सितम्बर 2026 भोजराम साहू 9893 765541

 

👉 पेड़ के नीचे 5 बच्चों से शुरू किया था ‘खुशियों वाला स्कूल’।

 

👉गरीबी में फीस न भर पाने पर खुद स्कूल से निकाले गए, आज 8 कमरों का गुरुकुलम बनाकर दे रहे हैं मुफ्त शिक्षा, मुफ्त भोजन और माँ-बाप जैसा प्यार ।

👉आज शिक्षक दिवस पर पढ़िए उस युवा की कहानी जिसने डिग्री को दीवार पर नहीं, गरीब बच्चों के भविष्य पर टांगा है।

 

 

 प्रस्तावना – इस कहानी को क्यों पढ़ना जरूरी है ?

 

आज 6 सितंबर 2026, रविवार। आज पूरा देश डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती पर शिक्षक दिवस मना रहा है। संडे मेगा स्टोरी की 52वीं कड़ी में हम आपके सामने एक ऐसी कहानी ला रहे हैं जो गरीबों की उस अनसुलझी पहेली को सुलझाने का प्रयास है, जहां सबसे बड़ी विडंबना भूख है।
यह कहानी कंप्यूटर से बनाई गई नहीं है, न ही किसी फिल्म की स्क्रिप्ट है। इस कहानी में डाला गया वीडियो बहुत ही मार्मिक और सच्चाई पर आधारित है। जहां एक बच्चा थाली में पानी, रोटी और नमक मिलाकर खा रहा है, जहां एक बच्चा पंगत में रोटी खाते हुए एक रोटी अपनी माँ के लिए छुपा लेता है। यह वीडियो आंखों से आंसू निकाल देता है।
सवाल यही है कि वास्तव में दान और सहयोग की जरूरत किन्हें है? इस कहानी से आपको जरूर जवाब मिलेगा।

 

 कौन हैं उद्देश्य सचान ? – एक परिचय

 

कानपुर के उद्देश्य सचान कोई साधारण नाम नहीं, बल्कि एक मुहिम का नाम है। कानपुर के जाने-माने सामाजिक उद्यमी और शिक्षाविद हैं। वे गुरुकुलम – “खुशियों वाला स्कूल” नामक गैर-सरकारी संगठन (NGO) के संस्थापक हैं।
उद्देश्य का एक ही उद्देश्य है – आर्थिक रूप से कमजोर, अनाथ, झुग्गी बस्ती और सड़क पर भीख मांगने वाले बच्चों को मुफ्त शिक्षा देना। 

 

 उद्देश्य सचान का संघर्ष – पिता टेलर, माँ हाउस वाइफ
प्रारंभिक शिक्षा: सरस्वती शिशु मंदिर से हुई।
–  पारिवारिक पृष्ठभूमि: पिता सुरेंद्र सचान हंसपुरम में दर्जी की दुकान पर काम करते हैं। माता कलिन्द्री सचान हाउस वाइफ हैं। घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, घर में चूल्हे पर खाना बनता था।
खुद स्कूल से निकाले गए: एक समय था जब माँ की तबीयत खराब होने से फीस जमा नहीं हो पाई, तो उद्देश्य को स्कूल से निकाल दिया गया। इसी गरीबी से जूझते हुए किसी तरह कानपुर यूनिवर्सिटी से BA फिलॉसफी पूरा किया।

 

. नौकरी की तलाश और हताशा का दौर
ग्रेजुएशन के बाद पिता का हाथ बंटाने के लिए कई जगह नौकरी के लिए गए, लेकिन स्किल न होने के कारण ढंग की नौकरी नहीं मिली।– मजबूरी में एक कैफे में काम किया, फिर आइसक्रीम फैक्ट्री में काम शुरू किया।
काम के दौरान मन में एक ही ख्याल आता था – जब इतना पढ़ रहा हूं, लेकिन जीवन इस तरह चल रहा है, तो इस पढ़ाई का क्या फायदा? इसी सोच ने डिप्रेशन में डाल दिया।

 

. विचार का जन्म – ऐसा स्कूल जो प्रेशर हैंडल करना सिखाए ।
तमाम चीजें झेलने के बाद उद्देश्य को लगा कि ये सिर्फ उनके साथ नहीं, देश में ऐसे लाखों उद्देश्य हैं जो अच्छे से शिक्षित नहीं हैं, जिनके पास स्किल्स नहीं हैं।
उन्हें लगा कि स्कूल ऐसे हों जो लोगों को जीवन जीना सिखाएं, न कि बच्चों को कॉम्पिटिशन में भगाएं। उन्होंने सोचा ऐसा एक नहीं, बहुत सारे स्कूल होने चाहिए। मिडिल क्लास परिवार से होने के कारण परिवार का दबाव था कि पहले खुद नौकरी पर लग जाओ। लेकिन उन्होंने ठान लिया था।
. पेड़ के नीचे से 8 कमरों के गुरुकुलम तक का सफर

 

शुरुआत: गांव के एक पेड़ के नीचे 5 बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। शुरुआत यूं ही की थी, लेकिन आज यही काम जीने की वजह बन चुका है।
पहला कमरा: परिवार के सपोर्ट से एक किराए का कमरा लिया। धीरे-धीरे 5 बच्चों से 150 बच्चे हो गए।
– बड़ा झटका: मकान मालिक ने किराया बढ़ा दिया। किराया न दे पाने पर मकान खाली करने को कहा गया।
सोशल मीडिया बना संजीवनी: मकान खाली करने के प्रेशर में उद्देश्य ने एक वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाला। वीडियो इतना वायरल हुआ कि देश-विदेश के लोग जुड़ने लगे। डोनेशन आने लगा। उस बड़े अमाउंट और परिवार की मदद से आज पेड़ के नीचे शुरू हुआ स्कूल 8 कमरों वाले ‘गुरुकुलम’ में बदल चुका है

 

– आज की स्थिति: आज 5 बच्चों की जगह 410 बच्चे हैं। 28 साल के उद्देश्य आज 410 बच्चों के पिता की तरह ख्याल रख रहे हैं। एक चीज जो आज भी नहीं बदली है, वह है – हर बच्चे के लिए फ्री शिक्षा।

 

. कौन हैं गुरुकुलम के बच्चे ? – रूह कंपा देने वाली सच्चाई
यहां कुछ बच्चे ऐसे हैं जिनके माता-पिता नहीं हैं, कुछ झुग्गी बस्ती के हैं, कुछ रेलवे स्टेशन पर भीख मांगते थे।

 

 एक अनाथ बच्चा अपने डेढ़ साल के छोटे भाई को लेकर सड़कों पर भीख मांग रहा था।
एक बच्चे के माँ-बाप का साया उड़ गया, वह आने-जाने वालों के पैर पकड़ कर भोजन के लिए पैसे मांग रहा था।
एक बच्चा पैसा कमाने के लिए गाड़ियों से भारी बोरे अनलोड करने का हमाली का काम करता था, ईंट भट्टों में काम करता था।
एक बच्ची की माँ कैंसर से मर गई, वह भीगती बारिश में फूल बेच रही थी।
कई बच्चे पंचर की दुकानों में काम करते थे।
इन सभी को लाकर उद्देश्य अपने गुरुकुलम में पढ़ा रहे हैं। पढ़ाने के साथ उनकी भावनाओं को समझा जाता है, उनसे बातचीत की जाती है। पिछले 7 साल से वे बच्चों की केयर कर रहे हैं, कभी कपड़े दिला दिए, कभी जूते।

 

. गुरुकुलम – क्यों है यह खुशियों वाला स्कूल ?

उद्देश्य बताते हैं कि जब हम मैकाले की शिक्षा पद्धति पढ़ते हैं, तो उसमें बहुत कुछ बदलने की जरूरत है। गुरुकुल शिक्षा पद्धति वो थी जो शिक्षा के साथ संस्कार सिखाती है। इसलिए उन्होंने सोचा बच्चों को संस्कार के साथ मॉडर्न और एंशिएंट दोनों मिलाकर पढ़ाया जाए।

 

इसी सोच से ‘गुरुकुलम’ नाम आया, जहां गुरुकुल भी रहे और मॉडर्न कल्चर भी।

यहां किताबी ज्ञान के साथ टेक्निकल स्किल, मॉरल वैल्यू, बड़ों का सम्मान सिखाया जाता है।
लक्ष्य एक अच्छा इंसान बनाना है, जिसे बातचीत करनी आए।
– जो बच्चे लोअर क्लास से आते हैं, उनका इंटरेस्ट डेवलप करके पढ़ाया जाता है। कुछ माता-पिता पैसा देना चाहते हैं तो भी मना कर दिया जाता है।
9. गुरुकुलम के बच्चे क्या कहते हैं ?

शुभम यादव: बताते हैं वो एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ते थे, जहां फीस देने के बाद भी इम्पैक्ट नहीं था। कोरोना के टाइम पर दोस्त आलोक उन्हें उद्देश्य सर के पास लाया। सर से मिलने से पहले कई बुरी आदतें थीं। सर ने कहा यहां पढ़ने का एक ही नियम है – बुरी आदतें छोड़नी होंगी। शिवम ने सारी गलत आदतें छोड़कर गुरुकुलम जॉइन कर लिया।

 

शिवा गौतम: ने बताया जब हम सर को नहीं जानते थे तब दोस्त ने फ्री कोचिंग के बारे में बताया। तब सर से मुलाकात की और जुड़ गए। मेरा म्यूजिक में इंटरेस्ट था, सर ने ही सिखवाया।
10. समर्पित टीचर की तलाश – सबसे बड़ी चुनौती

 

उद्देश्य बताते हैं एक मित्र प्रांजुल है, दो घंटे का वक्त निकालकर पढ़ाते हैं। वे टीचर भी अपॉइंट करते हैं, उन्हें 8 से 10 हजार सैलरी देते हैं। असल में इस स्कूल के लिए वो टीचर चाहिए जो काम के लिए समर्पित हो, जिनकी प्राथमिकता शिक्षा हो, सैलरी नहीं। ऐसे टीचर मिलना बहुत मुश्किल है।

 

उद्देश्य अकेले लगभग सारे सब्जेक्ट पढ़ा लेते हैं। उनकी प्राइमरी टीम स्कूल के बड़े बच्चे हैं। उद्देश्य बड़े बच्चों को पढ़ाते हैं और बड़े बच्चे छोटे बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा देते हैं। उनका मानना है वॉलंटियर एक-दो दिन आ जाएगा, लेकिन बिना रेगुलरिटी के बदलाव नहीं आ सकता। इस साल पहली बार स्कूल के बच्चे 10वीं का पेपर देंगे।

. उपलब्धियां और आगे का रास्त

 

2019 में 21 साल की उम्र में शुरू किए गए गुरुकुलम ने अब तक 500 से अधिक छात्रों को प्रभावित किया है, 100 से अधिक लोगों को अपने साथ जोड़ा है।

 

रेडियो मिर्ची 93, रेड एफएम, कानपुर वार्षिक सम्मेलन और इंडिया की बेस्ट पॉपुलर द बेटर इंडिया टीवी सीरीज ने इस मुहिम की जमकर तारीफ की है।
कानपुर के एसीपी आनंद कुमार ओझा स्वयं गुरुकुलम देखने आए, गरीब बच्चों को निशुल्क विद्यालय देखकर बहुत खुश हुए और उद्देश्य को हौसला अफजाई कर बधाई दी। उन्होंने असहाय बच्चों के लिए निशुल्क क्रिकेट एंड स्पोर्ट्स अकादमी का उद्घाटन भी किया।
सिर्फ स्कूल ही नहीं, वे बीमार और गरीब लोगों का भी सहयोग कर रहे हैं। ग्वालटोली कानपुर की एक माँ, जिसका जवान बेटा बिजली करंट से असहाय हो गया और खुद कैंसर मरीज है, उनकी भी मदद के लिए उद्देश्य पहुंचे।
उद्देश्य कहते हैं, “हमारा लक्ष्य आने वाले कुछ वर्षों में स्मार्ट क्लास, रोबोटिक्स लैब, जीव विज्ञान प्रयोगशाला, खेल के मैदान जैसी बेहतरीन तकनीकों और बुनियादी ढांचे से लैस वंचितों के लिए सबसे बड़ा व्यावहारिक शिक्षण और कौशल विकास परिसर बनाना है।”

 

. संडे मेगा स्टोरी का निष्कर्ष
उद्देश्य कहते हैं – अगर दुनिया में परिवर्तन लाना है तो शिक्षा के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं। जब आप कुछ पाना चाहते हैं तो कुदरत खूब मदद करती है।
इस कहानी को पढ़ने के बाद वास्तव में लगता है कि सहयोग और दान की जरूरत किन्हें है। सरकार यदि हर बच्चे के लिए शिक्षा को निशुल्क भोजन के साथ कर दे तो बच्चे मन लगाकर पढ़ेंगे और भोजन के लिए उन्हें संघर्ष करने और गलत रास्ता चुनने की आवश्यकता नहीं होगी, जिससे भारत की दिशा कुछ और होगी।
यदि आप भी उद्देश्य सचान के मुहिम से जुड़ना चाहते हैं या सहयोग करना चाहते हैं तो कृपया इस नंबर पर सहयोग कर सकते हैं ।
फोन पे नंबर 6388023523

 

 

संडे मेगा स्टोरी में आज बस इतना ही आपके पास भी यदि कोई कहानी हो तो हमसे संपर्क करें आपकी कहानी लोगों तक निशुल्क पहुंचाई जाएगी ।

धन्यवाद 

 संपादक
भोजराम साहू
हमारा दल्ली राजहरा एक निष्पक्ष समाचार चैनल
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Bhojram Sahu

By Bhojram Sahu

प्रधान संपादक "हमारा दल्ली राजहरा: एक निष्पक्ष समाचार चैनल"

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