दल्ली राजहरा
शनिवार 30 मई 2026
भोजराम साहू 9893 765541
 हिंदुस्तानस्टील इंप्लाइज यूनियन (सीटू) के  56 वे स्थापना दिवस पर विशेष 

एक फैक्ट्री में दो मजदूर काम करते थे। पहला मजदूर कहता था, प्रबंधन जैसा चाहता है वैसा करना जरूरी है, लड़ाई-झगड़े से कुछ नहीं होगा`। दूसरा मजदूर मानता था, काम के समय प्रबंधन का साथ देना जरूरी है, लेकिन जहां हक और अधिकार की बात आए, जहां गलत हो रहा हो, वहां विरोध भी जरूरी है`। 
गलत का विरोध करने वाला ही आगे चलकर सीटू बना।
सीटू इस बात की जीती-जागती मिसाल है कि कई बार अलग होना, ज्यादा बेहतर तरीके से एकजुट होने के लिए अनिवार्य हो जाता है। 1970 में अगर सीटू नहीं बनाई गई होती तो बहुत मुमकिन है कि देश का श्रमिक आंदोलन अपनी धार ही नहीं, अस्तित्व भी खो बैठता।

जब अपने ही नेता बन गए मजदूर आंदोलन के दुश्मन  ।
जिस केंद्रीय संगठन एटक से अलग होकर सीटू बनी, उसका तबका नेतृत्व मानने लगा था कि लड़ाई-आंदोलन-संघर्ष की जरूरत नहीं है। रार-तकरार की आवश्यकता नहीं है, समझौतों से काम चलाया जाना चाहिए।
लेकिन ये समझौते वे नहीं थे जो मजदूर संघर्षों के बाद मालिकों और सरकारों को झुकाकर हासिल किए जाते हैं। ये समझौते वह समझौतावाद था जो संघर्षों को शुरू ही नहीं होने देना चाहता था।* यह एक गलत राजनीतिक समझ का नतीजा था।
समाजवाद बबुआ पूंजीवाद की कार में बैठकर आएगा”: डांगे का खतरनाक फॉर्मूला  

उस दौर में एटक के सबसे बड़े नेता थे एस.ए. डांगे , उनका मानना था कि समाजवाद पूंजीवाद की कार में बैठकर आएगा । इस गलत समझ ने मजदूरों की लड़ाइयां रोक दी थीं। अब इंसान कितना भी सद्भावना से काम क्यों न ले – भेड़िये कभी शाकाहारी नहीं होते। इधर मजदूरों पर हमले दर हमले हो रहे थे, उधर डांगे की जकड़ में फंसी एटक आंदोलनों-संघर्षों से परहेज कर रही थी।
इस पर कहीं कोई यूनियन हड़ताल या संघर्ष का फैसला ले ले और लड़ाई में उतर जाए तो मालिक और पुलिस बाद में आती थी, उससे पहले डांगे नमूदार होते थे। भले 99 फीसद मजदूर यूनियन के साथ हों, डांगे उस यूनियन को भंग करके अपने बंदे बिठा देते थे। यूनियन की बैठक में बोलने तक नहीं देते थे।

एटक के राष्ट्रीय सचिवों में एक थे कामरेड एम.के. पंधे। हालत यह थी कि दफ्तर में कोई उनसे बात तक नहीं करता था। कोई डाक उनके टेबल पर नहीं आती थी।
इस घुटन से बाहर आने का एक ही तरीका था: नया संगठन बनाना
  इस घुटन से बाहर न आते तो कहां होता मजदूर आंदोलन? इस घुटन से बाहर आने का एक ही तरीका था – नया संगठन बनाना ताकि ताजी सांस ली जा सके।
ज्यादा विस्तार में न जाते हुए सार रूप में इतना कि *9-10 अप्रैल 1970 को गोवा के वास्को डिगामा शहर में* एटक की जनरल कौंसिल के वे सारे सदस्य इकट्ठा हुए जिन्हें उनकी बात न सुने जाने पर गुंटूर में हुई एटक की जनरल कौंसिल से बाहर आने के लिए मजबूर होना पड़ा था। उनके साथ राज्य समितियों के भी कई सदस्य इस कन्वेंशन में पहुंचे। और तय पाया कि यदि देश के मजदूर आंदोलन को जिंदा रखना है, वर्ग संघर्ष को जारी रखना है तो अब उसके लायक नया संगठन बनाने के अलावा और कोई दूसरा चारा नहीं है।

30 मई 1970: कलकत्ता में जन्म हुआ CITU का  
इस कन्वेंशन ने 28 से 31 मई 1970 में कलकत्ता में एक नए ट्रेड यूनियन सेंटर का सम्मेलन करने का निर्णय लिया। और 30 मई को भारत के ट्रेड यूनियन आंदोलन में सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन्स यानी सीटू की आमद हो गई।

मगर बनते ही पहले ही सम्मेलन में उसने तुरंत मजदूर एकता के पक्ष में अभियान छेड़ा तथा “एकता और संघर्ष” का नारा व्यवहार में लाना शुरू किया। “संघर्ष के लिए एकता – एकता के लिए संघर्ष”। यह बड़ी बात थी। इसी सम्मेलन ने 16 सूत्री मांगों को लेकर देशव्यापी संयुक्त आंदोलन का आह्वान किया।

सीटू के लिए एकता का मतलब मजदूर हैं, नेता नहीं  
सीटू की स्थापना ही एक यूनियन से टूट कर हो रही थी। टूटन और अलगाव के अपने कलुष और आफ्टर इफेक्ट्स होते हैं।
सीटू के लिए एकता का मतलब बाकी यूनियनों के नेताओं की शक्ल और चाल-ढाल या उनकी वैचारिक संबद्धता देखना नहीं है। एकता का मतलब उनके पीछे चलने वाले मजदूर हैं, जिन्हें शामिल किए बिना समूचे मजदूर वर्ग की एकता कायम नहीं की जा सकती।
सीटू को पक्का विश्वास था:

_”अब हवाएँ ही करेंगी रौशनी का फ़ैसला  
जिस दिए में जान होगी वो दिया रह जाएगा”
जब यूनियनों में बोलचाल तक नहीं थी, तब सीटू ने शुरू की संयुक्त हड़ताल की परंपरा  
मजदूर आंदोलन जरूरत के हिसाब से कार्यनीति तय करता है। मंजिल को ध्यान में रखता है, उस तक पहुंचने के रास्ते तय करता है। ये रास्ते सुविधाजनक नहीं होते, कभी-कभार मनोनुकूल भी नहीं होते, अक़्सर टेढ़े-मेढ़े होते हैं। मगर वे होते हैं। सीटू ने अपने मकसद को, उद्देश्य को कभी आँखों से ओझल नहीं होने दिया – कार्यनीति को इसी हिसाब से लागू किया, छुआछूत नहीं की।

आज देश के सारे मजदूर-कर्मचारी एक साथ हड़ताल पर चले जाते हैं – आज यह बहुत सहज सी बात समझी जाती है। मगर इतना आसान नहीं था इसे हासिल करना।
सीटू के बनने के पहले भारत में संयुक्त आंदोलनों का कोई रिवाज ही नहीं था। साझी लड़ाइयां तो छोड़िए, यूनियनों के बीच बोलचाल भी कम ही थी। इस एकता को बनाने में सीटू का मुख्य योगदान है। जो कितने धीरज के साथ यह विकसित होते-होते यहां तक पहुंची 
एकता और संघर्ष की यात्रा: UCTU से लेकर 17 राष्ट्रीय हड़तालों तक

 

सीटू बनते ही पहला साझा मंच यूनाइटेड काउंसिल ऑफ ट्रेड यूनियन्स के रूप में बना। 1974 में रेल हड़ताल की अगुआई करने वाली एनसीसीआरएस बनी। 1981 में वह नेशनल कैंपेन कमेटी (एनसीसी), 1985 में पब्लिक सेक्टर के साझे मंच सीपीएसटीयू से होते हुए यह एकता नवउदार नीतियों के दौर में स्पांसरिंग कमेटी ऑफ ट्रेड यूनियन्स तक विकसित हुई।
यह था एकता और संघर्ष की नीति का पालन: एकता संघर्ष के लिए, संघर्ष और बड़ी एकता के लिए।
17 राष्ट्रीय हड़तालों के बाद, आज अखिल भारतीय संघर्ष और संयुक्त आह्वान की देशव्यापी हड़तालें जितनी आसान समझी जाती हैं ।एकता बनाने और उसे कायम रखने के अलावा सीटू की अनेक खासियतों में से एक यह है कि यह नेता की नहीं, मजदूरो की अपनी यूनियन है।

सैकड़ों कुर्बानियों से सींचा गया है लाल झंडा 
सीटू की इन सफलताओं, उसकी प्रतिष्ठा में सैकड़ों कार्यकर्ताओं- नेताओं की कुर्बानी का, अपनी जान तक गंवाकर भी लाल झण्डा उठाए रखने का योगदान है। यह झण्डा उनका है। वे अपनी फौरी मांगों के साथ-साथ शोषण की पूर्ण समाप्ति और समाजवाद की कायमी के लिए भी लड़े थे, जो उनके और सीटू दोनों के लक्ष्यों में है। यह लड़ाई कुछ अतिरिक्त काम और अत्यधिक परिश्रम की मांग करती है।

दल्ली राजहरा में सीटू की भूमिका” 
एक समय था जब दल्ली राजहरा में दूसरे यूनियनों का बोलबाला था । तब सीटू को कोई जानता नहीं था उस समय संघर्ष करके कामरेड के पी जी पाणिकर , कामरेड अन्तापन कामरेड नायर, कामरेड चौधरी जैसे कर्मठ कार्यकर्ताओं ने सीटू का अलख दल्ली राजहरा में जलाया ।
दल्ली राजहरा में सीटू एक मजदूर हितैषी यूनियन बन कर उभरा है । पिछले 4 साल का इतिहास देखे तो नियमित कर्मचारियों और ठेका श्रमिकों के हक और अधिकार के लिए जितनी लड़ाई लड़ी है उतना शायद ही कोई लड़ा होगा।

सीटू आज भी अपने स्थापना के समय बनाए गए नीति पर चलकर मजदूरों का हक और अधिकार के लिए लड़ रहा है। आज भी सीटू का मानना है कि चाहे कोई भी मजदूर हो चाहे हमारे संगठन से जुड़ा हो या ना हो उनके हक और अधिकार के लिए लड़ना हमारा कर्तव्य है। दल्ली राजहरा में कामरेड ज्ञानेंद्र सिंह,कामरेड प्रकाश क्षत्रिय , कामरेड पुरुषोत्तम सिमैया , कामरेड विनोद मिश्रा, कामरेड सुजीत मुखर्जी,कामरेड सुजीत मंडल, कामरेड चार्ली वर्गिस , कामरेड रामाधीन, कामरेड जे गुरुवुलु , कामरेड इंद्र दमन ठाकुर, कामरेड शशिकांत, कामरेड नकुल देवांगन एवं सीटू के सभी साथी संघर्षरत है ।
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Bhojram Sahu

By Bhojram Sahu

प्रधान संपादक "हमारा दल्ली राजहरा: एक निष्पक्ष समाचार चैनल"

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