दल्ली राजहरा रविवार 20 सितम्बर 2026 भोजराम साहू 9893 765541 हमारा दल्ली राजहरा निष्पक्ष समचार चैनल की ओर से संडे मेगा स्टोरी के माध्यम से किसी ना किसी मुद्दा को लेकर आपकेसामने रखा जाता है । आज 53 वीं कहानी में सड़कों पर भटकते निरीह गौ वंश की कहानी।हमारा भारत विविधताओं का देश है। यहाँ हर 25-30 किलोमीटर पर बोली, रहन-सहन और रीति- रिवाज बदल जाते हैं। जम्मू-कश्मीर से कन्याकुमारी तक अनेक जाति, धर्म और संस्कृति के लोग रहते हैं। विदेशी जब भारत आते हैं तो यहाँ की संस्कृति देखकर आश्चर्यचकित रह जाते हैं, क्योंकि यह वो देश है जहाँ पेड़-पौधों से लेकर पत्थरों तक की पूजा होती है और जीव-जंतुओं में भी भगवान का रूप देखा जाता है। इसमें सबसे प्रमुख है गोवंश, जहाँ गाय को माँ का दर्जा और बैल-नंदी को भगवान शिव की सवारी मानकर पूजा की जाती है। कभी हर गाँव में एक सांड भगवान शिव के सवारी नंदी के प्रतीक के रूप में होता था, आज वही गोवंश सड़कों पर बेसहारा भटक रहा है। आज की संडे मेगा स्टोरी इसी पर।1. वो दौर जब गोवंश घर का सदस्य होता था ।एक समय था जब गाँव के हर घर में गोवंश पाला जाता था। गाय दूध देने के साथ वंश वृद्धि का आधार थी। बछिया बड़ी होकर गाय बनती और बछड़े बड़े होकर किसान के सच्चे मित्र बनते थे। खेत जोतने से लेकर बैलगाड़ी में सामान ढोने और यात्री परिवहन तक सब बैलों के भरोसे था। बैलों के माध्यम से ही धान, उड़द, सोयाबीन, अलसी जैसे फसलों से बीज निकालने यानी मिंजाई का काम होता था। व्यापारी भी एक गाँव से दूसरे गाँव तक सामान ले जाने के लिए बैलगाड़ी का ही उपयोग करते थे।गोवंश से मिलने वाला गोबर किसानों के लिए सर्वोत्तम खाद था और कंडे (छेना) से बने चूल्हे के भोजन में स्वाद और पौष्टिकता दोनों बरकरार रहती थी। लोग निरोगी और दीर्घायु रहते थे। तब खेतों में सिर्फ दो ही फसलें – धान और रवि में गेहूं, तिल व दलहन उगाई जाती थीं, यही पौराणिक भारत दर्शन था।https://hamaradallirajhara.in/wp-content/uploads/2026/08/VID-20260820-WA0070.mp42. बदलाव की आँधी और बिछड़ता मित्र:धीरे-धीरे समय बदला। कम समय और कम लागत में अधिक फसल की होड़ शुरू हुई। जहाँ पहले दलहन-तिलहन और अनाज उगाया जाता था, वहाँ डबल धान की फसल ने जगह ले ली। मशीनीकरण वरदान बनकर आया। जैविक खाद की जगह रासायनिक खाद ने ले ली। किसान का परम मित्र बैल धीरे-धीरे दूर होता गया और उसकी जगह ट्रैक्टर ने ले ली।फायदा यह हुआ कि जहाँ एक एकड़ में 16 क्विंटल उत्पादन होता था, वह अब 48 क्विंटल तक पहुँच गया। किसान सिंगल से डबल फसल उगाने लगा, लेकिन इसी भागदौड़ में उसके चेहरे की सुकून भरी खुशी कहीं खो गई। जो बैल और गाय 25 से 30 हजार रुपये में बिकते थे, आज उन्हें मुफ्त में भी कोई रखने को तैयार नहीं है। घरों के सामने बना कोठा और बड़े लोगों के घर का परसार, जहाँ गोवंश बंधा करता था, अब आधुनिक घरों में तब्दील हो गया है जहाँ उनके लिए जगह ही नहीं बची। 3. सड़कों पर मौत बनकर घूमती हमारी संस्कृति:नतीजा आज सड़कों पर दिख रहा है। दल्लीराजहरा जैसे शहर में ही पिछले 4-5 महीनों में गोवंश की संख्या बेतहाशा बढ़ी है। दिन हो या रात, टाउनशिप की सड़कें, बाजार का व्यस्त इलाका, हर जगह गोवंश बैठे या खड़े मिल जाएंगे। रात में सामने से आ रही गाड़ियों की तेज हेडलाइट में ये दिखते नहीं, जिससे दोपहिया और चारपहिया वाहनों से टकराकर इनकी अकाल मृत्यु हो रही है और वाहन चालक भी असंतुलित होकर गंभीर रूप से घायल हो रहे हैं, कई बार जान भी गंवा रहे हैं। सुबह सड़कें गोबर से पटी मिलती हैं। क्या यही हमारी भारतीय संस्कृति है?4. सरकार को क्या करना चाहिए? – मेगा स्टोरी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा गो-संरक्षण के लिए सिर्फ भावना नहीं, ठोस नीति की जरूरत है। सरकार को इन बिंदुओं पर काम करना चाहिए: . हर पंचायत में आदर्श गौशाला: पूर्व सरकार की गौठान योजना को बेहतर क्रियान्वयन के साथ फिर शुरू किया जाए। गौशाला सिर्फ चारदीवारी न हो, वहाँ चारा, पानी, पशु चिकित्सक और भूसा संग्रहण केंद्र की पूरी व्यवस्था हो। भूसा बैंक और फसल अवशेष प्रबंधन: किसानों को धान की पराली या फसल अवशेष जलाने से रोकने के लिए हर ब्लॉक में भूसा संग्रहण केंद्र बनाया जाए। इससे पराली जलने से प्रदूषण भी रुकेगा और गोवंश को साल भर चारा मिलेगा। नस्ल सुधार और डेयरी को बढ़ावा: उन्नत नस्ल के बछड़ों के लिए कृत्रिम गर्भाधान और स्थानीय नस्ल सुधार पर सब्सिडी दी जाए, ताकि पशु पालक और किसान फिर से गोपालन की ओर आकर्षित हों। दूध उत्पादक सहकारी समितियों को मजबूत किया जाए। गोबर से समृद्धि योजना: गोबर से जैविक खाद, बायो गैस और कंडे बनाने वाली महिला स्व-सहायता समूहों को बाजार और अनुदान दिया जाए। गोबर की खरीदी की योजना को पारदर्शी बनाया जाए। सड़क सुरक्षा और टैगिंग: शहरों में बेसहारा गोवंश की पहचान के लिए टैगिंग और रात में दिखने वाले रेडियम बेल्ट लगाए जाएं। बड़े शहरों की तर्ज पर गोवंश को पकड़ने के लिए विशेष वाहन और टीम नगरपालिका को दी जाए। किसान को सीधा लाभ: जो किसान अपने घर में गोवंश रखे, उसे ट्रैक्टर लोन की तरह ही गोवंश पालन पर ब्याज मुक्त लोन, बीमा और चारा अनुदान दिया जाए।“जन्म से मृत्यु तक – गोवंश है कामधेनु” जन्म से मृत्यु तक गोवंश के फायदे – एक नजर में. जीवित अवस्था में मिलने वाले पंच-लाभ (पंचगव्य): – दूध: अमृत के समान, बच्चों से बड़ों तक के लिए सम्पूर्ण आहार। इससे दही, घी, मक्खन, छाछ, पनीर, खोया बनता है।– गोबर: दुनिया की सबसे उत्तम जैविक खाद। एक गाय साल में लगभग 10 टन गोबर देती है। इससे उपजाऊ खेत, बायोगैस, कंडे (उपले) बनते हैं जो ईंधन का काम करते हैं।गौमूत्र: आयुर्वेद में औषधि माना जाता है। कीट-नाशक, जैविक दवा और कई दवाइयों में उपयोगी।– श्रम (बैलों से): खेत जोतना, बैलगाड़ी से सामान ढोना, कुएं से पानी निकालना – किसान का ट्रैक्टर ही था।वंश वृद्धि: गाय से बछिया (भविष्य की गाय) और बैल (किसान का मित्र) प्राप्त होते हैं।. मृत्यु के बाद भी अनुपयोगी नहीं: चमड़ा: जूता, चप्पल, बैग, बेल्ट, ढोल-नगाड़ा (बाजा) बनाने में उपयोग।हड्डी और सींग: बटन, कंघी, खाद (बोन मील), चूना और औषधियों में उपयोग।. धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व: पूजा-पाठ, हवन, गृह प्रवेश में गाय के घी का ही उपयोग होता है। गोबर से घर-आंगन लीपने से पवित्रता और कीटाणुओं से सुरक्षा मानी जाती है। “कानून क्या कहता है”। छत्तीसगढ़ में गोवंश संरक्षण का कानून बहुत सख्त है। छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ कृषि पशु परिरक्षण अधिनियम 2004 (संशोधन 2011) लागू है। इस कानून के तहत प्रदेश में गाय, बैल, बछड़ा, बछिया, भैंस, पाड़ा-पाड़ी सहित समस्त कृषि पशु वंश का वध करना पूरी तरह प्रतिबंधित है। इस अधिनियम की प्रमुख बातें:. क्या-क्या अपराध है।– कृषि पशुओं का वध करना या करवाना।– उनका गोमांस (बीफ) रखना।– वध के उद्देश्य से उनका विक्रय या परिवहन करना, चाहे वह प्रदेश के अंदर हो या बाहर। https://hamaradallirajhara.in/wp-content/uploads/2026/08/VID-20260820-WA0070.mp4. सजा कितनी है:इस कानून का उल्लंघन करने पर 7 साल तक की कठोर कैद और 50,000 रुपये तक का जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।मूल अधिनियम में 3 साल की सजा थी, जिसे 2011 के संशोधन के बाद बढ़ाकर 7 साल कर दिया गया है। कानून की सबसे सख्त बातें:– यह अपराध संज्ञेय और गैर-जमानतीय है।– इसमें सबूत का भार आरोपी पर होता है, यानी आरोपी को ही साबित करना होगा कि उसने कानून का उल्लंघन नहीं किया है।– पकड़े गए पशुओं को नजदीकी पंजीकृत गौशाला में रखा जाता है और जब्त वाहन को राजसात (जब्त) भी किया जा सकता है। “कानून तो सख्त है, लेकिन सड़कों पर भटकते हजारों गोवंश इस बात की गवाही दे रहे हैं कि कानून के पालन के साथ-साथ संरक्षण की ठोस नीति भी उतनी ही जरूरी है।”अंत में:“जो पशु जन्म से लेकर मृत्यु तक सिर्फ देता ही देता है, आज वही सड़कों पर दो रोटी के लिए भटक रहा है। क्या इसे ही हम अपनी संस्कृति कहते हैं?”यदि सरकार आधुनिकीकरण के साथ-साथ गोवंश संरक्षण की ऐसी समग्र नीति बनाती है, तभी हम सही मायने में खुद को गौपुत्र कहलाने के हकदार होंगे। वरना सड़कों पर भटकती गौमाता हमसे एक ही सवाल पूछेगी – क्या समय निकल जाने पर पहचान भूल जाना ही हमारी संस्कृति है? हमारा दल्ली राजहरा एक निष्पक्ष समाचार चैनल के संडे मेगा स्टोरी मेंआज बस इतना ही ।आपके पास भी कोई ज्वलंत समस्या या विशेष व्यक्तित्व के ध्यान कोई व्यक्ति हो तो हमें अवश्य बताएं उनकी कहानी संडे मेगा स्टोरी में निशुल्क लोगों तक पहुंचाई जाएगी । धन्यवाद भोज राम साहू संपादक हमारा दल्ली राजहरा एक निष्पक्ष समाचार चैनल 9893765541 Spread the lovePost navigationखल्लारी में विश्वकर्मा जयंती कार्यक्रम में बोले विधायक प्रतिनिधि पीयूष सोनी – बच्चों की शिक्षा पर दें विशेष ध्यान दल्लीराजहरा में साहू समाज का भव्य तीज मिलन : संस्कृति, संस्कार और शिक्षा का दिया संदेश, खेलों से बिखरी खुशियां ।