दल्ली राजहरारविवार 14 जून 2026भोजराम साहू 9893 765541सन 1947 की 18 जुलाई। देश आजाद होने वाला था और छत्तीसगढ़ के बालोद जिले का गांव लिमतरा एक ऐसे सपूत को जन्म देने वाला था जिसकी कलम से आधी सदी तक छत्तीसगढ़ बोलेगा। नाम था परदेशी राम वर्मा। आज हम उन्हें डॉ. परदेशी राम वर्मा के नाम से जानते हैं, छत्तीसगढ़ की माटी के सबसे अनमोल चितेरे के रूप में। परदेशी राम का बचपन लिमतरा की धूल, खेत-खलिहान और लोकगीतों के बीच बीता। गांव का लड़का जब जवान हुआ तो उसने 1966 में 18 असम राइफल की वर्दी पहन ली। तीन साल तक उसने भारत माता की सरहद पर सेवा दी। फौज का अनुशासन और हर पल की कीमत को उसने दिल में उतार लिया। 1969 में उसने स्वेच्छा से वर्दी उतार दी और फिर किताबों की दुनिया में उतर गया। वो मानता था कि बंदूक से भी बड़ी ताकत कलम में होती है।वर्दी उतरते ही कलम चल पड़ी। उसने डबल एम.ए. किया, तीन विषयों में निपुणता हासिल की। भिलाई इस्पात संयंत्र में स्टेट इंस्पेक्टर की नौकरी मिली तो डेढ़ साल के भीतर ही अपनी लगन और जिम्मेदारी से उसने नेहरू पुरस्कार जीत लिया। लेकिन नौकरी उसकी मंजिल नहीं थी। मंजिल तो वो पन्ने थे जो उसके इंतजार में खाली पड़े थे। सुबह 5 बजे उठकर लेखन और रात 11 बजे के बाद सोना, यही उसका नियम बन गया। पिछले 50 सालों से यही नियम है।हिंदी हो या छत्तीसगढ़ी, परदेशी राम ने हर विधा को अपनी उंगलियों पर नचाया। कहानी लिखी तो `परड़` जैसी, जिसे साप्ताहिक हिंदुस्तान ने कथा विशेष में छापा और हिंदी का प्रतिनिधि चुन लिया। उपन्यास लिखा तो `आवा` जैसा, जो आज चार विश्वविद्यालयों में एम.ए. हिंदी का पाठ्यक्रम है। संस्मरण लिखा, नाटक लिखा, जीवनी लिखी, शोध किया। अब तक उनके नाम 7 कथा संग्रह, 3 उपन्यास, 10 संस्मरण और दर्जनों किताबें दर्ज हैं। उनकी आत्मकथा `सुरंग के उस पार` भी उतनी ही चर्चित है जितनी उनकी कहानियां। साहित्य में उनके इस अप्रतिम योगदान को देखकर पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय ने 2003 में उन्हें मानद डी. लिट. की उपाधि से नवाजा।परदेशी राम की कहानियां गांव की मिट्टी से सनी हैं। उनमें पसीने की गंध है, लोक-संस्कार की महक है। उनकी सबसे मार्मिक कहानी `विसर्जन` छत्तीसगढ़ के एक शांत गांव की त्रासदी है। चार दशक पहले सरकार ने नदी किनारे शराब का कारखाना खोल दिया। नदी का पानी जहरीला हुआ, गांव का माहौल जहरीला हुआ। युवा नशे में डूब गए, घर टूट गए, संस्कृति बिखर गई। विकास के नाम पर गांव की आत्मा का ही विसर्जन हो गया।उनकी दूसरी कहानी `औरत खेत नहीं` सीधे समाज की रीढ़ पर चोट करती है। किसान रमेसर मंडल अपनी बांझ पत्नी को छोड़कर जगेसरी को घर लाता है। जब जगेसरी के बेटे को जमीन देनी पड़ती है तो मंडल अपनी बंजर `भर्री` जमीन उसके नाम कर देता है। अंत में जगेसरी की आंखें लाल हो जाती हैं और वो कहती है, “बहुत जोत-बो लिए मंडल, पर समझ नहीं सके कि औरत खेत नहीं है।” यह एक लाइन पूरे पुरुष समाज के चेहरे से नकाब हटा देती है।डॉ. वर्मा मानते हैं कि कबीर छत्तीसगढ़ में विचार बनकर आए थे। अमरकंटक से छह किलोमीटर दूर कबीर चौरा पर आज भी वो कुंड है जहां कबीर और नानक मिले थे। कबीर का वो दोहा “सब काहू का लीजिए, साँचा शब्द निहार” छत्तीसगढ़ ने अपने आचरण में उतार लिया। हिंदू-मुस्लिम का सौहार्द हो या जातियों के बीच समरसता, छत्तीसगढ़ को यह संबल कबीर से मिला।उनकी कहानियों में जीवन के सारे रंग हैं। कहीं कमलनारायणी का अट्टहास है तो कहीं मुकरदमिन का रुदन। कहीं डॉ. मनराखनलाल की उदारता है तो कहीं दाऊ बिजलाल का स्वार्थ। वो एक कुशल सपेरे की तरह इन सभी पात्रों को एक ही झांपी में भर देते हैं और उस झांपी का नाम है छत्तीसगढ़। कमलेश्वर जी से लेकर राज नारायण मिश्रा तक ने उन्हें लिखने के लिए प्रेरित किया। अब वे निजीकरण और बदलते छत्तीसगढ़ समाज पर एक वृहद उपन्यास लिख रहे हैं। उनकी रचनावली नवंबर 2026 तक 6 खंडों में आएगी।डॉ परदेसी राम वर्मा की दो कहानी से समझ सकते हैं कि उनकी कलम में कितना धार है ।1. विसर्जन – जब नदी भी रो पड़ीएक समय था जब छत्तीसगढ़ का वो गाँव नदी की गोद में सोता था। नदी का पानी आईने जैसा साफ था। किनारे पर कदम्ब के पेड़ थे, और बच्चे वहीं कंचे खेलते, तैरते, हंसते थे। दादियां कहती थीं, “ये नदी माँ है बेटा, कभी गंदी मत करना”।फिर एक दिन सरकार का ट्रक आया। सरकारी लोग आए। नदी के किनारे ईंट-पत्थर जुड़ने लगे। गाँव वाले खुश थे कि विकास आ रहा है। कारखाना बना… शराब का कारखाना।धीरे-धीरे नदी का रंग बदल गया। साफ पानी में झाग आने लगा। कारखाने से निकलने वाला काला, बदबूदार पानी नदी में बहने लगा। मछलियां मर गईं। किनारे के पेड़ सूख गए। बच्चों का खेलना बंद हो गया।और सबसे बुरा हुआ युवाओं के साथ। कारखाने के पास शराब सस्ती मिलती थी। जो लड़के कभी नदी में तैरते थे, अब नशे में डूबने लगे। खेत बंजर हो गए, क्योंकि हाथ में हल की जगह बोतल आ गई। घरों की चूल्हें ठंडी पड़ गईं, क्योंकि कमाई सारी शराब में बह गई। माँएं दरवाजे पर बैठकर रोतीं।तब गाँव वालों को समझ आया। ये विकास नहीं था। ये `विसर्जन` था। विकास के नाम पर कारखाने ने गाँव की नदी का विसर्जन कर दिया, खेतों का विसर्जन कर दिया, संस्कृति का विसर्जन कर दिया… और सबसे बड़ी बात, आने वाली पीढ़ी के सपनों का विसर्जन कर दिया। नदी आज भी बहती है, पर वो अब माँ नहीं रही… वो एक गवाह है, एक त्रासदी की।`2. औरत खेत नहीं – जगेसरी का जवाब`रमेसर मंडल के पास दो तरह की जमीन थी। एक थी `धनहा`… काली, उपजाऊ, सोना उगलने वाली। और दूसरी थी `भर्री`… बंजर, पथरीली, जिसमें कुछ नहीं उगता था।मंडल की पहली पत्नी से कोई बच्चा नहीं हुआ। मंडल ने उसे छोड़ दिया। कारण? “खेत बंजर है”। हाँ, मंडल के लिए औरत भी खेत ही थी। जिसे उपज देनी है।फिर वो जगेसरी को ले आया। जगेसरी के साथ उसका बेटा समेलाल भी था। मंडल ने सोचा, चलो इस बार `धनहा` खेत मिल गया। और हुआ भी ऐसा ही। जगेसरी ने आते ही बेटी को जन्म दिया। मंडल का सीना फूल गया।लेकिन अब बारी आई समेलाल की जमीन की। रिवाज था कि 2 एकड़ देना पड़ेगा। मंडल का कलेजा काँप गया। अपनी `धनहा` जमीन? कभी नहीं! आखिर में उसने चालाकी की। जगेसरी के नाम अपनी वो बंजर `भर्री` जमीन कर दी।कुछ दिन बाद मंडल `भर्री` की तरफ गया। दूर से उसे एक जानी-पहचानी साड़ी दिखी। पास गया तो देखा… जगेसरी। मंडल ने पुचकारते हुए पूछा, “छोटी नोनी को किसके सहारे छोड़ आई?”जगेसरी की आंखें लाल थीं। उसने कहा, “समे के सहारे।”मंडल फिर बोला, “यहाँ `भर्री` में क्यों चली आई?”बस, फिर क्या था। जगेसरी आग बन गई। बोली, “तुम्हें शरम नहीं आई मंडल? मेरे बेटे को ये बंजर धरा दिया? धनहा खेत की तरह मैं तुम्हारे घर आई, बेटी दे दी… तुम्हारा मान बढ़ गया। पर तुम्हारा अंतस कितना काला है, ये इस काली चटियल माटी को देखकर पता चल गया। मेरे बेटे के मुँह में पैरा गोंज दिया तुमने।”https://hamaradallirajhara.in/wp-content/uploads/2026/06/VID-20260613-WA0116.mp4मंडल डर गया। उसने नरम होकर कहा, “समेलाल तो तुम्हारा बेटा है जगेसरी, मेरा तो नहीं। भर्री दे दी, यही बहुत है।”जगेसरी अब `अगिया बैताल` हो चुकी थी। उसने सीधे मंडल की आंखों में आंखें डालकर कहा, “सुनो मंडल… समे भी मेरा बेटा है और बेटी भी मेरी है। मैंने जन्माया है। मैं अब एक पल भी तुम्हारे घर नहीं रहूंगी। आज ही समे और बेटी को लेकर चली जाऊंगी। बहुत जोत-बो लिए तुमने… पर समझ नहीं सके कि औरत खेत नहीं है, मंडल।”सम्मान भी उनके पीछे-पीछे चले। राष्ट्रपति के हाथों पंडित सुंदरलाल शर्मा राज्य अलंकरण, अखिल भारतीय प्रेमचंद सम्मान, छत्तीसगढ़ प्राइड अवार्ड, मदारिया सम्मान। लेकिन परदेशी राम के लिए सबसे बड़ा सम्मान 31 जनवरी 2026 को भिलाई के अगासदिया परिसर में मिला। वहां उन्होंने अपनी सौजन्य प्रतियां भेंट कीं। उसी मंच पर नवापारा के दिनेश चौहान, दल्ली राजहरा की डॉ. शिरोमणि माथुर और गोंदिया के सतीश भाऊ पारधी भी सम्मानित हुए।परदेशी राम आज भी कहते हैं कि छत्तीसगढ़ के नाम पर राजनीति चमकाने वाले ठग्गू किस्म के लोगों से ज्यादा वो बाहरी है जो छत्तीसगढ़ के सम्मान के लिए समर्पित है। उनका मानना है कि सामंतवादी दौर में अंग्रेजों की चाकरी करने वाले ही आजादी के बाद सत्ता में छा गए। यह विडंबना है, और वो अपनी कलम से इसी विडंबना को उघाड़ते हैं।आखिर में वे खुद कहते हैं कि उन्हें एक ही महामंच मिला है – छत्तीसगढ़। उसी मंच पर प्राचीन, अर्वाचीन और भविष्य सब आकर अपनी कला दिखाते हैं। एक सैनिक से साहित्यकार तक का उनका सफर हमें यही सिखाता है कि माटी से जुड़ा हुआ आदमी चाहे वर्दी पहने या कलम, वो हमेशा अपने देश की रक्षा ही करता है। https://hamaradallirajhara.in/wp-content/uploads/2026/06/VID-20260613-WA0073.mp4क्योंकि कुछ लोग इतिहास पढ़ते हैं, और कुछ लोग इतिहास लिख देते हैं। डॉ. परदेशी राम वर्मा उन्हीं में से एक हैं।“संडे मेगा स्टोरी” में आज बस इतना ही। अगर आपके आसपास भी कोई ऐसा कलाकार है जिसकी कला को दुनिया तक पहुंचाना जरूरी है, तो हमसे संपर्क करें। ‘हमारा दल्ली राजहरा निष्पक्ष समाचार चैनल’ आपकी कला को आम जनता तक नि :शुल्क पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है। क्योंकि संस्कृति तभी बचेगी जब उसके वाहकों को सम्मान मिलेगा। भोजराम साहू संपादक (हमारा दल्ली राजहरा- एक निष्पक्ष समाचार चैनल)9893765541Spread the lovePost navigationमध्य प्रदेश से छत्तीसगढ़ आकर डीजल चोरी करने वाले अंतरराज्यीय गिरोह का पर्दाफाश : 5,51,000 रुपये का माल जब्त, 2 आरोपी को जेल । पीएम श्री शाला आड़ेझर में 10 दिवसीय समर कैंप संपन्न : बच्चों ने योग से लेकर मिट्टी कला तक दिखाया हुनर..!