दल्ली राजहरा रविवार 27 सितम्बर 2026 भोजराम साहू 9893 765541

 

अगर आज वे होते तो शायद दल्ली राजहरा नहीं उजड़ता !

अमर शहीद कॉमरेड शंकर गुहा नियोगी के 34वें शहादत दिवस 28 सितंबर 2026 पर विशेष
बंगाल से आकर बालक धीरेंद्र छत्तीसगढ़िया लोगों को हक और अधिकार के लिए लड़ना सिखाया । उन्होंने स्वाभिमान से जीना सिखाया बुराइयों को छोड़कर परिवार को आगे स्वालंबन की दिशा में बढ़ने का रास्ता दिखाया । बदले में उन्होंने कुछ नहीं मांगा ।  इनके लिये बल्कि हक और अधिकार के लिए लड़ते-लड़ते अपना जीवन भी किसान और मजदूरों के लिए बलिदान कर दिया । छत्तीसगढ़ हमेशा हमेशा के लिए उनका ऋणी रहेगा । नियोगी जी का कर्ज छत्तीसगढ़ तभी उतार सकता है जब उनके बताए हुए रास्ते पर चल सकेगा ।
    (संपादकीय)

 

 शहीदों की चिताओं पर 
लगेंगे हर बरस मेले,
 वतन पर मरने वालों का यही
 बाकी निशां होगा।
कभी वह दिन भी आएगा 
जब अपना राज देखेंगे,
 जब अपनी ही जमीं होगी
 और अपना आसमां होगा।

 

 

शहीद स्थल पर लिखी ये पंक्तियां हर बार मन को द्रवित कर देती हैं। और जब बात आती है छत्तीसगढ़ के मजदूर आंदोलन की, तो एक ही नाम जुबान पर आता है – अमर शहीद शंकर गुहा नियोगी।

छत्तीसगढ़ के मजदूर आंदोलन के इतिहास में नियोगी जी का नाम अमर हो गया है। मजदूरों ने तो उन्हें भगवान के समकक्ष मानकर आज भी पूजा जाता है। आज भी दल्ली राजहरा के बुजुर्ग मजदूर एक ही बात कहते हैं – “यदि आज नियोगी जी होते तो राजहरा नहीं उजड़ता।”

बड़े बुजुर्गों की वो कहावत आज सच लगती है ।

 

कहा जाता है कि यदि परिवार में किसी युवा की मृत्यु हो जाती है तो जरूरत के समय कहा जाता है कि आज अमुक रहता तो मेरी यह स्थिति नहीं होती। ठीक यही बात आज राजहरा के पुराने मजदूर कहते हैं। कारण साफ है – नियोगी जी की प्रबंधन क्षमता बहुत ही प्रबल थी। वे दूर की सोचते थे। मजदूरों के आने वाले भविष्य के बारे में सोचकर कार्य करते थे, ताकि भविष्य में मजदूरों को कोई समस्या न हो।

आज दल्ली राजहरा में मजदूर हित की बात करने के लिए कई संगठन कार्यरत हैं। लेकिन हकीकत क्या है यह तो तह में जाने पर ही पता चलता है। एक तरफ मजदूर संगठनों के नेता चौक-चौराहों पर जाकर लुभावने भाषण देते हैं और कहते हैं कि राजहरा में हमसे बड़ा हितैषी कोई नहीं है। आपकी कोई भी परेशानी हो, आप किसी भी यूनियन के सदस्य हों, हमारे पास आइए। हम आपकी समस्याओं का निराकरण करेंगे। हम आपके हक और अधिकार के लिए मैनेजमेंट और ठेकेदारों से लड़ने के लिए तैयार हैं।

लेकिन वास्तविकता तभी पता चलती है जब ये लोग ठेकेदारों और प्रबंधकों से लड़ना तो दूर, उन्हीं के साथ मिलकर समझौता करके मजदूरों का ही दोहन करने लगते हैं। जबकि मजदूर इन्हें अपना भगवान मानकर इनके बताए कदम पर चलते हैं। दल्ली राजहरा में श्रमिक संगठन उजड़ते हुए राजहरा के बारे में न सोचकर हमेशा अपने पार्टी और स्वार्थ साधने में ही लगे रहे, यही कारण भी राजहरा को उजड़ने की दिशा में ले जा रहा है।

 

कौन थे शंकर गुहा नियोगी …?

 

नियोगी जी का जन्म 19 फरवरी 1943 को हुआ था। बचपन का नाम था धीरेंद्र। उनकी शिक्षा जलपाईगुड़ी, पश्चिम बंगाल में हुई। छात्र जीवन से ही नियोगी जी आक्रामक और संघर्षशील रहे। वे ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन की स्थानीय इकाई के संयुक्त सचिव रहे।

60 के दशक में दुर्ग जिले में भिलाई में एशिया के सबसे बड़े स्टील प्लांट की नींव रखी जा चुकी थी। स्टील प्लांट के लिए दल्ली राजहरा की कई खदानों में लौह अयस्क की नई खदानें प्रारंभ हो गई थीं। देश के कोने-कोने से कुशल कामगार छत्तीसगढ़ पहुंच रहे थे।

इसी 60 के दशक में धीरेंद्र भिलाई आ गए। उन्हें प्लांट में काम कर रहे मामा जी के सहयोग से कोक ओवन में काम करने का अवसर मिला। कुछ ही समय में वे मजदूरों के हित में काम करते हुए काफी लोकप्रिय हो गए। उन्होंने मजदूरों को संगठित करना शुरू कर दिया और मजदूरों को हक और अधिकार के लिए लड़ना सिखाया।

पहली बड़ी हड़ताल और नौकरी से निकाले गए ।

 

1967 में मजदूरों को एकजुट कर प्रबंधक के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और हड़ताल की शुरुआत हुई। यह सरकारी उपक्रम में मजदूरों की सबसे बड़ी हड़ताल थी। प्रबंधक को झुकना पड़ा और उनकी मांगें माननी पड़ीं। दोबारा ऐसी स्थिति न बने इसलिए प्रबंधक ने इन्हें नौकरी से निकाल दिया। लेकिन मजदूरों ने नियोगी जी से प्रेरणा पाकर आंदोलन को जारी रखा।
5 पैसे की चाय ने खोली ठेकेदारों की पोल

 

नौकरी से निकाले जाने के बाद धीरेंद्र अब दानीटोला माइंस में काम करने पहुंचे। वहां 1973-74 में दहिया गांव में एक तालाब की खुदाई के दौरान शासन के भ्रष्ट अधिकारियों के भ्रष्टाचार को गांव वालों के समक्ष उजागर किया और धरना देकर शासन से उन्हें मजदूरी दिलवाई।

दानीटोला माइंस में उस समय एक कप चाय 15 पैसे में मिलती थी। नियोगी जी ने 5 पैसे में दूध की एक कप चाय बेचकर ठेकेदार की मुनाफाखोरी को लोगों के सामने उजागर कर दिया। उनकी निर्भीकता और मजदूरों के समक्ष सच्चाई प्रकट करने की क्षमता ने उन्हें और लोकप्रिय बना दिया।

धीरेंद्र से बने शंकर गुहा नियोगी और राजहरा आगमन 

 

दल्ली राजहरा में उस समय मजदूरों की दो यूनियन थीं, जो मजदूरों से उनकी हक और अधिकार की लड़ाई के लिए चंदा तो लेती थीं, लेकिन मजदूरों का फायदा करने के बजाय ठेकेदारों का फायदा करती थीं। जिससे मजदूर आक्रोशित हो गए और अपनी बातें धीरेंद्र के पास रखकर उन्हें दल्ली राजहरा आने का आमंत्रण दिया।

धीरेंद्र इसके बाद नए नाम शंकर गुहा नियोगी के नाम से दल्ली राजहरा पहुंचे। अब वे बीएसपी कर्मचारी से श्रमिक नेता बन गए थे। दल्ली राजहरा में स्थित बीएसपी की खदानों में मजदूरों की दशा बहुत ही खराब थी। उस समय ठेकेदारों द्वारा 14 से 15 घंटे उनसे काम लिया जाता था, उसके एवज में उन्हें मात्र 2 रुपये की मजदूरी दी जाती थी। इन मजदूरों का कोई ट्रेड यूनियन नहीं था।

तब नियोगी जी ने इनके बीच पहुंचकर उन्हें संगठित किया और 1976-77 में नया संगठन छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ के बैनर तले मजदूरों के हक में काम करना शुरू किया। 2 महीने में ही 10 हजार से ज्यादा मजदूर आंदोलन से जुड़ गए। परिणाम स्वरूप मजदूरों ने एक बड़ी हड़ताल कर दी। मजदूरों को यह लाभ हुआ कि जो पहले 2 रुपये की मजदूरी मिलती थी, वह बढ़कर 272 रुपये हो गई।

2-3 जून 1977 का वो खूनी गोलीकांड

 

एक आंदोलन के दौरान 2-3 जून 1977 की मध्य रात्रि को हुए गोलीकांड में 11 मजदूर शहीद हो गए थे। आंदोलन का कारण कोई बहुत बड़ा नहीं था। मजदूर चाहते थे कि उन्हें ठेकेदार झुग्गी-झोपड़ी मरम्मत के नाम पर राशि दें। इस पर ठेकेदार, प्रबंधन और सरकार के बीच समझौता भी हुआ, लेकिन ठेकेदार के समझौते से पलट जाने पर मजदूरों ने आंदोलन किया था।

 

मजदूरों के साथ-साथ समाज सुधारक भी ।

 

नियोगी जी का उद्देश्य था कि जल, जंगल और जमीन पर यहां के रहने वाले मूल निवासियों का ही अधिकार है तथा उनके दोहन में इनको भी हिस्सा मिलना चाहिए। मजदूर के साथ-साथ किसानों के हक के लिए भी लड़ाई लड़ना उनके आंदोलन का हिस्सा था।

नियोगी जी एक समाज सुधारक भी थे। उन्होंने समाज में हो रही बुराइयों जैसे शराब और सिनेमा से मजदूरों को दूर करने के लिए कई प्रयत्न किए, ताकि इनसे बचे पैसों को मजदूर अपने परिवारों पर खर्च करे और बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त कर अच्छे पद पर नौकरी कर सकें। नियोगी जी ने मजदूरों की बचत के लिए बैंक में खाता भी खुलवाया ताकि थोड़ी-थोड़ी बचत कर वे अपनी भविष्य के लिए एक बड़ी पूंजी बचा सकें।

नियोगी जी मजदूर नेता के साथ-साथ अच्छे लेखक भी थे। उन्होंने मजदूरों की दशा सुधारने और मजदूर आंदोलन से संबंधित विभिन्न प्रकार की पुस्तकें भी लिखी हैं, जो आज भी छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ द्वारा संचालित शहीद अस्पताल की लाइब्रेरी में पढ़ी जा सकती हैं।

उनका जीवन पारदर्शी था। नियोगी जी सीधे-सादे और सरल व्यक्तित्व के धनी थे। वे हमेशा मजदूरों के बीच प्रिय रहे। आज के वर्तमान युग में श्रमिक नेता करोड़ों की बिल्डिंग खड़ा कर रहे हैं, उसके विपरीत वे एक झोपड़ी में अपने परिवार के साथ रहते थे। उनका जीवन मजदूरों को समर्पित था। वे हर कीमत पर मजदूरों की हक और अधिकार की लड़ाई में मजदूरों की जीत चाहते थे। वे निस्वार्थ भाव से मजदूरों की सेवा करते थे। इसीलिए उन्होंने अपने बेटे और बेटियों का नाम भी क्रांति, जीत और मुक्ति रखा। उनका एक-एक कदम आदर्श से भरा था। वह जो कहते थे वही करते थे।

 

1990 के बाद पूंजीपतियों से सीधी टक्कर और वो काली रात

 

 

 (शाहिद कामरेड शंकर गुहा नियोगी जी के बेटे जीत गुहा नियोगी)
1990 से राजहरा के साथ अन्य निजी कंपनियों के मजदूर भी नियोगी जी के संगठन से जुड़ते गए। राजहरा से लेकर भिलाई तक मजदूरों के हक में वे सतत आवाज उठाते थे। उन्होंने पूंजीपतियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। बड़े-बड़े उद्योगपति इनकी ताकत से घबराने लगे। लिहाजा नियोगी जी को धमकाने की भी कोशिश की गई। यहां तक कि उन्हें जान से मारने के लिए कई बार कोशिश की गई। इन सबसे वे बेखबर रहते थे।

(सोमनाथ उइके अध्यक्ष छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ )
लेकिन 1991 की 27 सितंबर की वो काली रात, जो मजदूर आंदोलन के इतिहास में धब्बा बनकर रह गई। नियोगी जी किसी काम से रायपुर गए थे। रात्रि में देर तक वे हुडको, भिलाई स्थित अपने निवास पहुंचे। रात्रि करीब 3:45 बजे उद्योगपतियों द्वारा भेजे गए पलटन मल्लाह ने सोते हुए नियोगी जी को गोली मार दी। नियोगी जी ‘मां गो’ की आवाज के साथ हमेशा-हमेशा के लिए शांत हो गए।

जनक लाल ठाकुर पूर्व विधायक
नियोगी जी की हत्या की खबर सुनते ही पूरे मजदूर और किसान स्तब्ध रह गए। सबकी आंखों में आंसू और इन उद्योगपतियों के खिलाफ आक्रोश था।

डॉक्टर जाना मुख्य चिकित्सा अधिकारी शहीद अस्पताल 

 

वो अंतिम विदाई जो राजहरा कभी नहीं भूल पाया
वह 28 सितंबर की सुबह शायद राजहरा कभी नहीं भूल पाएगा। जब नियोगी जी का पार्थिव शरीर राजहरा लाया जा रहा था, रास्ते में हजारों आंखों में आंसुओं की धारा थी। लोग फूलों की वर्षा कर रहे थे। दल्ली राजहरा के छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ स्थित उनके कार्यस्थल में लाखों मजदूर और उनके परिवारों से भर गया था। नियोगी जी को श्रद्धांजलि देने वालों की भीड़ लग गई थी।

 

नियोगी जी द्वारा स्थापित शहीद अस्पताल
भीड़ का अनुमान इसी से लगा सकते हैं कि जब नियोगी जी को अंतिम विदाई देने के लिए नगर भ्रमण कराया जा रहा था, तो उनकी अंतिम यात्रा की लाइन 4 किलोमीटर से भी लंबी थी। लोग पैदल चल रहे थे। “नियोगी जी अमर रहें” के नारे से पूरा दल्ली राजहरा गूंज रहा था।

रामचरण नेताम छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा
“संघर्ष के लिए निर्माण और निर्माण के लिए संघर्ष” – यही नियोगी जी का नारा था।
शहीद अस्पताल – उनके सपनों की सबसे बड़ी इमारत

ईश्वर लाल निर्मलकर कामरेड जन मुक्ति मोर्चा
खदान में काम करने वाली श्रमिक नेता कुसुम बाई की डिलीवरी केस में मृत्यु हो जाने से आहत मजदूरों ने नियोगी जी के नेतृत्व में अपना स्वयं का अस्पताल – शहीद अस्पताल का निर्माण किया। जो आज बालोद जिले का सबसे बड़ा अस्पताल है। जहां बस्तर, मानपुर-मोहला, धमतरी एवं महाराष्ट्र के सीमावर्ती इलाकों से लोग गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए आते हैं। अस्पताल में विभिन्न विभागों से संबंधित बच्चों को ट्रेनिंग भी दी जाती है। अस्पताल को संवारने के लिए नियोगी जी के साथ काम करने वाले डॉक्टर शैबाल जाना की विशेष भूमिका रही है।

बसंत रावटे अध्यक्ष जन  मुक्ति मोर्चा
आज दल्ली राजहरा में नियोगी जी के सपने को पूरा करने के लिए एक ओर उनका बेटा जीत गुहा नियोगी जन मुक्ति मोर्चा के माध्यम से जन-जन तक उनका संदेश पहुंचा रहा है,  दूसरी ओर छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा अपने पूर्व की भांति आज भी नियोगी जी के सपने को पूरा करने में लगा हुआ है।

 

स्वर्गीय गणेश राम चौधरी, पूर्व विधायक श्री जनक लाल ठाकुर, सोमनाथ उइके, रामचरण नेताम, राजाराम बरगद, शैलेश बम्बोड़े, मोहित, नारद, नासिक यादव, जनक साहू, नवाब जलानी, प्रेमलाल वर्मा, शेख अंसार, बसंत साहू, वाय. के. सिंह, भेखदास वैष्णव एवं बिसेलाल निषाद जो कि नियोगी जी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर सहयोग करते थे, आज भी उनका सपना पूरा करने के लिए संघर्षरत हैं।

 

राजहरा आज उजड़ रहा है राजहरा को बचाने के लिए जरूरी है  सही नेतृत्व की वह भी निस्वार्थ । जिस तरह नियोगी जी ने किसानों  और मजदूरों की दशा और दशा सुधारने के लिए अथक प्रयास किया ऐसी ही महामानव  कीआज फिर से आवश्यकता है ।
संडे मेगा स्टोरी बस आज इतना ही ..!

 भोजराम साहू
संपादक
हमारा दल्ली राजहरा एक निष्पक्ष समाचार चैनल 
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 समाचार के लिए फोटो विभिन्न मीडिया के माध्य से प्राप्त किया गया है 
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Bhojram Sahu

By Bhojram Sahu

प्रधान संपादक "हमारा दल्ली राजहरा: एक निष्पक्ष समाचार चैनल"

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